Mann Ki Baat में PM मोदी ने की सीतामढ़ी के प्लास्टिक मॉडल की तारीफ
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने Mann Ki Baat में बिहार के सीतामढ़ी प्लास्टिक रीसाइक्लिंग मॉडल की तारीफ की. यहां सिंगल यूज प्लास्टिक को रीसाइकिल कर स्कूलों, पार्कों और सार्वजनिक जगहों के लिए बेंच बनाई जा रही हैं. एक बेंच में करीब 40 किलो प्लास्टिक कचरे का इस्तेमाल होता है.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Prime Minister Narendra Modi) ने बिहार (Bihar) के सीतामढ़ी (Sitamarhi) जिले में चल रहे प्लास्टिक रीसाइक्लिंग मॉडल (plastic recycling model) की तारीफ की है. उन्होंने इसे कचरे से संपदा बनाने यानी वेस्ट टू वेल्थ (Waste to Wealth) का शानदार उदाहरण बताया है.
रविवार, 26 जुलाई 2026 को अपने मासिक रेडियो कार्यक्रम ‘मन की बात’ (Mann Ki Baat) के 136वें एपिसोड में प्रधानमंत्री ने सीतामढ़ी की इस पहल का जिक्र किया. यहां सिंगल यूज प्लास्टिक के कचरे को रीसाइकिल करके बेंच बनाई जा रही हैं.
प्रधानमंत्री ने बताया कि एक बेंच बनाने में करीब 40 किलो सिंगल यूज प्लास्टिक (single use plastic) का इस्तेमाल होता है. तैयार बेंचों को सरकारी स्कूलों, पार्कों और सार्वजनिक जगहों पर लगाया जा रहा है.
यह पहल इसलिए भी खास है क्योंकि जिस प्लास्टिक को अक्सर बेकार समझकर फेंक दिया जाता है, वही अब सार्वजनिक इस्तेमाल की चीजों में बदल रहा है. इससे प्लास्टिक कचरे के निपटारे के साथ स्थानीय स्तर पर उपयोगी उत्पाद भी तैयार हो रहे हैं.
भारत में हर साल निकलता है 39 लाख टन प्लास्टिक कचरा
भारत के लिए प्लास्टिक कचरा लंबे समय से बड़ी चुनौती बना हुआ है. Central Pollution Control Board की 2022 से 2023 की वार्षिक रिपोर्ट के मुताबिक, देश में एक साल में करीब 39 लाख टन प्लास्टिक कचरा पैदा हुआ. यानी हर दिन करीब 10,700 टन प्लास्टिक कचरा निकलता है.
भारत सरकार ने 1 जुलाई 2022 से पहचान किए गए कई सिंगल यूज प्लास्टिक उत्पादों पर प्रतिबंध लगा दिया था. इसके बावजूद प्लास्टिक कचरे को इकट्ठा करना और उसका सही तरीके से निपटारा करना आसान नहीं है.
खास तौर पर छोटे जिलों में यह चुनौती ज्यादा बड़ी है. वहां बड़े शहरों की तरह औपचारिक कचरा प्रबंधन व्यवस्था और पर्याप्त प्रोसेसिंग सुविधाएं हर जगह मौजूद नहीं होती हैं.
सीतामढ़ी ने इसी समस्या का समाधान स्थानीय स्तर पर तलाशने की कोशिश की. प्लास्टिक कचरे को प्रोसेसिंग के लिए दूसरे इलाकों में भेजने के बजाय जिले में ही उसे प्रोसेस करने की क्षमता तैयार की गई.
सीतामढ़ी में चल रही हैं 4 प्लास्टिक वेस्ट मैनेजमेंट यूनिट
सीतामढ़ी जिले में चार Plastic Waste Management Units चल रही हैं. इनमें बाजपट्टी की यूनिट एक प्रमुख प्रोसेसिंग सेंटर के रूप में काम कर रही है.
आसपास के ब्लॉकों से प्लास्टिक कचरा इकट्ठा करके इन यूनिट तक पहुंचाया जाता है. यहां प्लास्टिक की सफाई और छंटाई होती है. इसके बाद उसे छोटे टुकड़ों में काटा जाता है और प्रोसेस करके बेंच का आकार दिया जाता है.
जिला प्रबंधक राघव झा ने समाचार एजेंसी IANS को बताया कि बाजपट्टी की PWMU एक तय प्रोसेसिंग सेंटर है. यह तीन से चार दूसरे ब्लॉकों से जुड़ी हुई है और इस नेटवर्क के जरिए पूरे सीतामढ़ी जिले को कवर किया जाता है.
इस व्यवस्था का मकसद प्लास्टिक कचरे के लिए स्थानीय स्तर पर एक पूरी सप्लाई चेन तैयार करना है. इसमें कचरा इकट्ठा करने से लेकर उसकी छंटाई, परिवहन, प्रोसेसिंग और फिर उपयोगी उत्पाद तैयार करने तक की प्रक्रिया शामिल है.

8000 किलो प्लास्टिक हुआ इकट्ठा, 4000 किलो से बनीं 85 बेंच
जिले से जुड़े आंकड़े इस मॉडल के असर को समझने में मदद करते हैं. रिपोर्ट्स के मुताबिक, एक चरण में डुमरा, रीगा, बाजपट्टी और रुन्नीसैदपुर ब्लॉकों से करीब 8,000 किलो सिंगल यूज प्लास्टिक इकट्ठा किया गया था. इसमें से करीब 4,000 किलो प्लास्टिक को रीसाइकिल करके 85 बेंच तैयार की गईं.
इस पहल की एक और अहम बात इसका आर्थिक मॉडल है. उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, यूनिट जिला प्रशासन और एक औद्योगिक साझेदार के बीच रेवेन्यू शेयरिंग व्यवस्था पर काम करती हैं.
इस प्रक्रिया से स्थानीय स्तर पर काम के अवसर भी पैदा होते हैं. प्लास्टिक कचरा इकट्ठा करने, उसकी छंटाई करने, परिवहन और प्रोसेसिंग जैसे अलग अलग चरणों में लोगों की जरूरत पड़ती है.
यह पहल सिर्फ कचरे को रीसाइकिल करने तक सीमित नहीं है. इसकी असली परीक्षा यह है कि क्या प्लास्टिक कचरे को ऐसी आर्थिक व्यवस्था से जोड़ा जा सकता है, जो लंबे समय तक अपने दम पर चल सके.
भारत में नगरपालिका स्तर पर प्लास्टिक रिकवरी की कई व्यवस्थाएं सब्सिडी पर निर्भर रहती हैं. कम कीमत वाले प्लास्टिक कचरे से इतनी आर्थिक वैल्यू पैदा करना कि उसके संग्रह और प्रोसेसिंग की लागत निकल सके, ज्यादा मुश्किल काम है.
किसी भी ऐसी योजना की लंबी सफलता इसी बात पर निर्भर करती है. मॉडल आर्थिक रूप से टिकाऊ होगा तो किसी अधिकारी के बदलने के बाद भी उसके जारी रहने की संभावना बढ़ जाती है.
40 किलो प्लास्टिक से कैसे बनती है एक बेंच
सीतामढ़ी के इस मॉडल में जिस प्लास्टिक का इस्तेमाल हो रहा है, उसका बड़ा हिस्सा कम आर्थिक मूल्य वाली श्रेणी में आता है.
कैरी बैग, रैपर और मल्टीलेयर पैकेजिंग जैसे प्लास्टिक उत्पाद हल्के होते हैं. इस्तेमाल के बाद इनमें गंदगी भी मिल जाती है और अलग अलग तरह का प्लास्टिक एक साथ जमा हो जाता है.
इस वजह से इन्हें इकट्ठा करने और प्रोसेस करने की लागत बढ़ जाती है. कई रीसाइक्लर्स के लिए ऐसे प्लास्टिक को दोबारा पैकेजिंग सामग्री में बदलना आर्थिक रूप से फायदेमंद नहीं होता.
सीतामढ़ी में इस प्लास्टिक को वापस उसी तरह की पैकेजिंग में बदलने के बजाय दूसरे उपयोग में लाया जा रहा है.
सबसे पहले प्लास्टिक कचरे को धोया जाता है. फिर उसकी छंटाई की जाती है. इसके बाद उसे छोटे टुकड़ों में काटकर फ्लेक्स तैयार किए जाते हैं. इन टुकड़ों को गर्म करके मोटे और ठोस आकार में ढाला जाता है. इन्हीं हिस्सों को जोड़कर आखिर में बेंच तैयार होती है. तैयार उत्पाद मोटा और मजबूत होता है. इस वजह से एक बेंच बनाने में बड़ी मात्रा में प्लास्टिक कचरे का इस्तेमाल हो जाता है.
यही कारण है कि एक बेंच में करीब 40 किलो सिंगल यूज प्लास्टिक खपाने का आंकड़ा महत्वपूर्ण है.
दूसरे शब्दों में कहें तो यह बेंच प्लास्टिक कचरे को लंबे समय तक उपयोगी रूप में रखने का जरिया बन जाती है. वही प्लास्टिक, जो खुले में फेंके जाने पर नालियों, जमीन और आसपास के पर्यावरण में वर्षों तक पड़ा रह सकता था, अब सार्वजनिक इस्तेमाल की चीज में बदल जाता है.
स्कूलों, पार्कों और सार्वजनिक जगहों पर पहुंच रही बेंच
इस मॉडल की खासियत यह भी है कि रीसाइकिल प्लास्टिक से ऐसा उत्पाद बनाया जा रहा है, जिसकी स्थानीय स्तर पर जरूरत है.
बेंचों का इस्तेमाल सरकारी स्कूलों, पार्कों और दूसरी सार्वजनिक जगहों पर किया जा रहा है. इससे प्लास्टिक कचरे के निपटारे और सार्वजनिक सुविधाओं के निर्माण को एक ही व्यवस्था में जोड़ा जा रहा है.
इस तरह जिला प्रशासन सिर्फ प्लास्टिक कचरे को हटाने का काम नहीं कर रहा है. उसी कचरे को ऐसी वस्तु में बदला जा रहा है, जिसे जिले में ही इस्तेमाल किया जा सकता है.
EPR व्यवस्था से भी जुड़ता है यह मॉडल
सीतामढ़ी का प्रयोग भारत के बड़े प्लास्टिक वेस्ट मैनेजमेंट सिस्टम के लिहाज से भी महत्वपूर्ण है.
देश में Extended Producer Responsibility यानी EPR की व्यवस्था पहले से लागू है. इसके तहत प्लास्टिक पैकेजिंग से जुड़े उत्पादकों और ब्रांड मालिकों पर प्लास्टिक कचरे की रिकवरी और प्रबंधन की जिम्मेदारी डाली गई है.
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, वित्त वर्ष 2022 से 2023 में यह जिम्मेदारी करीब 30 लाख टन प्लास्टिक पैकेजिंग से जुड़ी थी.
EPR व्यवस्था का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि बाजार में प्लास्टिक पैकेजिंग लाने वाली कंपनियां उसके इस्तेमाल के बाद पैदा होने वाले कचरे की जिम्मेदारी भी लें.
लेकिन सिर्फ प्लास्टिक कचरा इकट्ठा करना पर्याप्त नहीं है. उसके बाद ऐसी प्रोसेसिंग क्षमता भी जरूरी है, जहां इस कचरे को वास्तविक रूप से इस्तेमाल या रीसाइकिल किया जा सके.
सीतामढ़ी जैसा मॉडल इसी कड़ी में अहम हो सकता है. यहां इकट्ठा किए गए कम मूल्य वाले प्लास्टिक को एक उपयोगी और बिक्री योग्य उत्पाद में बदला जा रहा है.
सर्कुलर इकोनॉमी, पर्यावरण और कारोबार
सीतामढ़ी की पहल सर्कुलर इकोनॉमी (Circular Economy) से जुड़े उद्यमों के लिए भी एक संकेत देती है.
अगर प्लास्टिक कचरे से तैयार उत्पादों की खरीद जिला प्रशासन, सरकारी संस्थान और स्थानीय निकाय करते हैं तो रीसाइक्लिंग के लिए स्थानीय बाजार तैयार हो सकता है.
इस मॉडल में प्रशासन सिर्फ नियम बनाने वाली संस्था नहीं रहता. वह रीसाइकिल सामग्री से बने उत्पादों का खरीदार भी बन सकता है.
यही बदलाव प्लास्टिक रीसाइक्लिंग को केवल पर्यावरण संरक्षण की पहल से आगे ले जाकर आर्थिक गतिविधि में बदल सकता है.
अगर तैयार उत्पाद से मिलने वाली वैल्यू कच्चे माल यानी प्लास्टिक कचरे के संग्रह, छंटाई, परिवहन और प्रोसेसिंग की लागत को संभाल सके तो मॉडल की सब्सिडी पर निर्भरता कम हो सकती है.
ऐसी स्थिति में रीसाइक्लिंग केवल एक पायलट प्रोजेक्ट नहीं रहती. वह स्थानीय स्तर पर चलने वाला कारोबार बन सकती है.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का Mann Ki Baat में सीतामढ़ी मॉडल का जिक्र इस पहल को राष्ट्रीय पहचान देता है. साथ ही यह सवाल भी सामने रखता है कि क्या देश के दूसरे छोटे जिले भी अपने प्लास्टिक कचरे को स्थानीय संसाधन में बदलने के लिए ऐसा मॉडल अपना सकते हैं.
सीतामढ़ी का प्रयोग फिलहाल एक सरल विचार दिखाता है. जिस प्लास्टिक को समस्या माना जाता है, वही सही संग्रह, प्रोसेसिंग और बाजार मिलने पर स्कूल की बेंच, पार्क की सुविधा और स्थानीय रोजगार का जरिया बन सकता है.





