आतंकी बारूद में बह गई पुलवामा के केसर की ख़ुशबू

By जय प्रकाश जय
February 20, 2019, Updated on : Thu Sep 05 2019 07:31:24 GMT+0000
आतंकी बारूद में बह गई पुलवामा के केसर की ख़ुशबू
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पुलवामा में केसर की खेती

अपनी अदभुत प्राकृतिक रमणीयता में केसर की खेती से महमहाता, सेब, बादाम, अखरोट, चेरी से खिलखिलाता पुलवामा का आज बारूद की गंध से दम घुट रहा है। ये वही पुलवामा है, जहां का इतिहास राजा हर्ष देव कालीन प्राचीन कवि कल्हण के महाकाव्य 'राज तरंगिणी' के पौने आठ हजार श्लोकों में संचित है। आतंकवाद और भूमाफिया ने पुलवामा के विश्वव्यापी केसर कारोबार की कमर तोड़कर रख दी है।


कश्मीर का, जो पुलवामा इलाका आजकल बारूद से नहाया हुआ है, उसकी फिजाएं केसर की क्यारियों से उठने वाली ख़ुशबू से महमहाती रही हैं। झरनों गीत गुनगुनाती यहां की बेइंतहा खूबसूरत वादियों की बस्ती में केसर की खेती को भूमाफिया और आतंकवादियों की नज़र लग गई, जो वहां का दर्दनाक नज़ारा कब्रिस्तान के सन्नाटे में डूब गया है। दक्षिण कश्मीर के पुलवामा ज़िले में दोहरी दहशतगर्दी, फौजी बूटों की धमक से सेब, बादाम, अखरोट, चेरी और चावल की खेती भी कुम्हलाती जा रही है। यहां की लगभग सत्तर प्रतिशत आबादी इन्हीं उत्पादों पर निर्भर है।


इसके अलावा दूध उत्पाद के लिए भी पुलवामा 'कश्मीर का आनंद' नाम से लोकख्यात है। राजा अवंतिवर्मन और लाल्ता दित्य के स्मारकों के लिए दर्शनीय यहां की अहरबिल, तसर और मर्सार जैसी झीलें अपने थर्राए हालात पर आठ-आठ आंसू रो रही हैं। उत्तर में श्रीनगर-बडगाम, पश्चिम में पुंछ, दक्षिण-पूर्व में अनंतनाग से घिरा कश्मीर का यह अशांत क्षेत्र हमेशा से ऐसा नहीं रहा है। आज अपने माथे पर आतंकवाद का कलंक लिए पुलवामा पूरी दुनिया में केसर कारोबार लिए जाना जाता है। वास्तुरवान पहाड़ की तलहटी में स्थित इसके अवंतिपोरा शहर (प्राचीन नाम अवंतिपुरा) से जुड़े यहां के जम्मू-श्रीनगर राजमार्ग के साथ दूर-दूर तक नयनाभिराम झेलम की खूबसूरती बिछी हुई है।


पुलवामा क्षेत्र में राजा हर्ष देव के शासन काल में प्राचीन कवि कल्हण ने अपने महाकाव्य 'राज तरंगिणी' में इसी अवंतिपुरा का वर्णन किया है। दरअसल, 'राज तरंगिणी' पुलवामा के प्राचीन इतिहास का एक अदद साहित्यिक दस्तावेज भी है। राजा हर्ष देव के राजपाट के वक्त (1150) में कवि कल्हण कश्मीर के ढाई हजार वर्षों का इतिहास 'राज तरंगिणी' में समेट गए हैं। 'राज तरंगिणी' के लगभग पौने आठ हजार श्लोकों में चार सौ वर्षों का इतिहास है, जिसमें कश्मीर का राजनीतिक और सांस्कृतिक इतिहास काव्यात्मक विधा में वर्णित है। 'राज तरंगिणी' को संस्कृत महाकाव्यों का मुकुटमणि भी कहा जाता है। इस महाग्रंथ से पता चलता है कि कला-वास्तुकला-शिक्षा में गहरी रुचि रखने वाले शांतिप्रिय शासक अवन्तिवर्मन के नाम पर स्थापित आज का अवंतिपुरा शहर आतंकवाद से पहले इतिहास में कभी सैन्य जरूरतों के लिए इस्तेमाल नहीं किया गया। 'राज तरंगिणी' में लिखा गया है कि अवन्तिवर्मन अपनी पूरी सामर्थ्य से अपनी प्रजा के कल्याण और इस क्षेत्र की आर्थिक सम्प्रभुता कायम करने में जुटे रहे।


पुलवामा को कुदरत ने खूबसूरती के साथ साथ फलों और फूलों से भी सराबोर कर रखा है। इन्हीं फूलों में से एक फूल केसर का है जिसे अंग्रेज़ी में सैफरन, उर्दू में ज़ाफरान और कश्मीरी में कोंग कहा जाता है। यह कोई मामूली फूल नहीं है। इसकी अंदरूनी पंखुड़ियां बाजार में केसर के नाम से बेची जाती हैं, जिसे दुनिया के सबसे महंगे मसालों में से एक माना जाता है। औषधीय गुणों से भरपूर केसर की कीमत बाजार में साढ़े तीन सौ रुपए प्रति ग्राम है। हर देश में इत्र और पान मसाला इंडस्ट्री में यहां की केसर की खास मांग रहती है। केसर खेती मुख्यतः पुलवामा ज़िले के पंपोर और इसके आसपास के गांवों में होती है।जब से आतंकवाद ने सिर उठाया है, पिछले कुछ वर्षों से यहां की केसर की खेती पर खतरे के बादल मंडरा रहे हैं। केसर की कृषि योग्य भूमि लगातार सिकुड़ती जा रही है। इसके अलावा बेलगाम भूमाफिया भी केसर की खेती को चौपट करने में लगे हुए हैं। इसका नतीजा ये हुआ है कि, कभी इस इलाके की सात हजार हेक्टेयर जमीन पर होती रही केसर खेती आतंक के साये में आज मात्र ढाई-तीन हजार हेक्टेयर में सिमट कर रह गई है। पंपोर में केसर उगाने वाले खेतों पर भूमाफिया कॉलोनी बना रहे हैं। भूमाफिया की करतूतें केसर की खेती पर भारी पड़ रही हैं।


केसर के खेतों पर किसी भी तरह का निर्माण कार्य अथवा उनकी मिट्टी का इस्तेमाल गैरकानूनी है। दस साल पहले जब इस इलाके को रेलवे लाइन से जोड़ा जा रहा था, पटरी पर मिट्टी की जरूरत पूरी करने में भी केसर के खेत खोद-खोद कर वीरान कर दिए गए। ठेकेदारों की उस मनमानी पर जब तक प्रशासन की नजर जाती, बहुत देर हो चुकी थी।


एक ओर पुलवामा में केसर की उपज कम हो रही है, दूसरी तरफ विश्व बाजार में इसकी मांग दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही है। अब तो आतंकवाद के साए में सांस ले रहे यहां के व्यापारी चुपचाप ईरान और स्पेन का केसर सप्लाई करने लगे हैं। वजह ये भी है कि पुलवामा के केसर से सस्ता होने के कारण ईरानी केसर के कारोबार में व्यापारियों को अच्छी कमाई हो जाती है। पुलवामा का केसर थोक में 1.5 लाख से लेकर 2.5 लाख रुपए प्रति किलो बिकता है, जबकि ईरानी केसर 90 हजार रुपए प्रति किलो। केसर उत्पादकों का कहना है कि मुनाफाखोर व्यापारी धोखाधड़ी कर पुलवामा के केसर का नाम बदनाम कर रहे हैं। पुलवामा के केसर उत्पादन और कारोबार को मजबूत करने के लिए तत्कालीन प्रधानंत्री मनमोहन सिंह ने कश्मीर के कृषि मंत्रालय और वैज्ञानिकों के सुझाव पर जिस 'नेशनल सैफरन मिशन' का वर्ष 2011 में ऐलान किया था, केसर की सिंचाई के लिए एक व्यापक योजना बनाई थी, मार्केटिंग के मोर्चे पर व्यापारियों की मदद, बीज कायाकल्प, किसानों के लिए जागरूकता कार्यक्रम और डी-वीडिंग के लिए मशीनें देने जैसी कवायदें की थीं, आतंकवाद के हमले में वह सब कब की ठंडी की जा चुकी हैं।


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