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ऐतिहासिक विरासत को बचाने के साथ-साथ कलाकारों को उनका 'असली हक़' दिला रहा यह स्टार्टअप

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16th Apr 2019
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समर्थ चतुर्वेदी

समर्थ चतुर्वेदी द्वारा शुरू किया गया स्टार्टअप मैत्रेय इंक कलाकारों को मुफ़्त में अपने डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म पर आने और अपने उत्पाद बेचने का मौक़ा देता है। इसके लिए कंपनी कलाकारों से मात्र 2 प्रतिशत कमीशन चार्ज करती है। मैत्रेय के ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्म पर 700 से ज़्यादा नायाब उत्पाद और 2000 से अधिक आर्टवर्क्स मौजूद हैं।


दशकों से भारतीय कलाकारों और चित्रकारों के साथ अपनी कला को आर्थिक रूप से भुनाने की चुनौती रही है। जो एजेंसियां और आर्ट डीलर्स उनके उत्पाद बाज़ार तक पहुंचाते हैं, वे कलाकारों से भारी कमीशन चार्ज करते हैं और उनका शोषण करते हैं। इतना ही नहीं, कई बार ये बिचौलिए नवीन उत्पादों को भी ऐंटीक या प्राचीन बताकर ग्राहकों को ठगते हैं और कलाकारों का श्रेय और हक़ उनको नहीं मिल पाता।


समर्थ चतुर्वेदी ने इस परिदृश्य को बदलने के उद्देश्य के साथ मैत्रेय नाम से अपने स्टार्टअप की शुरुआत की। समर्थ, योर स्टोरी के ब्रैंड्स ऑफ़ इंडिया 2019 कार्यक्रम के विजेता हैं। 28 वर्षीय समर्थ की परवरिश मथुरा में हुई और उनके पिता भी कलाकारों और चित्रकारों के साथ काम करते थे। उन्होंने पाया कि उनके पिता कलाकारों को उनकी कला की सही क़ीमत दिलाने में मदद करते थे। समर्थ का फ़ैमिली बिज़नेस भी इस बाज़ार से ही जुड़ा था और उनका परिवार पत्थर, तांबे और टेराकोटा से बने उत्पादों को बनाते थे और उन्हें सीधे म्यूज़ियम्स (संग्रहालयों) या प्राइवेट कलेक्टर्स को बेचते थे। इस तरह के बिज़नेस मॉडल से बिचौलियों की भूमिका समाप्त हो जाती थी और कलाकारों को फ़ायदा होता था।


समर्थ के पारिवारिक व्यवसाय को बड़ा नुकसान पहुंचने लगा और उन्हें यह बिज़नेस बंद करना पड़ा। इसके बाद समर्थ ने फ़ैसला लिया के वह अपनी मार्केटिंग की नौकरी छोड़कर, अपने फ़ैमिली बिज़नेस को फिर से खड़ा करने का प्रयास करेंगे। वह कहते हैं, "मुझे अभी तक याद है कि मेरे पिता काफ़ी तनाव में थे, जब उन्हें बिज़नेस बंद करना पड़ा। इस दौरान ही मुझे लगा कि अपने इकनॉमिक्स, बिज़नेस डिवेलपमेंट, रिसर्च और डिजिटल मार्केटिंग के स्किल्स और अनुभव का इस्तेमाल करके अपने फ़ैमिली बिज़नेस को फिर से स्थापित कर सकता हूं।"


कलाकृति बनाता कारीगर


इस उद्देश्य के साथ ही, 2010 में उन्होंने मैत्रेय इंक की शुरुआत की और देशभर के 145 चित्रकारों और 70 मूर्तिकारों को अपने स्टार्टअप से जोड़ा। अपने पिता बिरेंद्र नाथ चतुर्वेदी की मदद से उन्होंने 700 से अधिक नायाब मूर्तियों और 2000 कलात्मक उत्पादों का कलेक्शन तैयार किया।


समर्थ और उनके पिता ने बिना किसी बाहरी निवेश की मदद के यह कलेक्शन तैयार किया। समर्थ कहते हैं कि उन्होंने बाहरी निवेश के लिए इसलिए कोशिश नहीं की क्योंकि यह मार्केट अभी उतना तैयार नहीं था और बड़े निवेशकों को इसमें ख़ास आकर्षण भी नहीं था। उन्होंने बताया कि इसके विपरीत अंतरराष्ट्रीय बिज़नेस समर्थ के पास आते रहते हैं और उनके काम से जुड़ने की इच्छा ज़ाहिर करते हैं।


अपने बिज़नेस मॉडल के बारे में जानकारी देते हुए समर्थ बताते हैं कि उनके स्टार्टअप ने कलाकारों को बिना किसी फ़ीस के अपने ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्म पर आने का मौक़ा दिया और अधिक से अधिक कलाकारों तक पहुंचने के लिए उन्होंने सरकार की मदद ली। फ़िलहाल मैत्रेय के पास 35 लोगों की टीम है और हाल ही में, कंपनी को चीन और थाइलैंड से 5 करोड़ रुपए का ऑर्डर मिला है।


समर्थ ने बताया कि एक समय पर उनकी कंपनी का 36 करोड़ रुपए सालाना टर्नओवर था, लेकिन किसी वजह से उन्हें अचानक काम बंद करना पड़ा, लेकिन अब धीरे-धीरे कंपनी का काम फिर से लय में आ रहा था और फ़िलहाल उनका सालाना टर्नओवर 1.4 करोड़ रुपए तक है।


मार्केट की स्थिति के बारे में बात करते हुए समर्थ बताते हैं, "ज़्यादातर डीलर्स कलाकारों से उनके उत्पादों को प्रदर्शित करने के लिए बहुत अधिक फ़ीस चार्ज करते हैं और उत्पाद की बिक्री होने पर 70 प्रतिशत तक हिस्सा कलाकारों को मिल पाता है। जबकि अगर डीलर्स मुफ़्त में कलाकारों को अपने प्लेटफ़ॉर्म पर उत्पाद प्रदर्शित करने देते हैं तो बिके हुए माल का 60 प्रतिशत तक हिस्सा वे ख़ुद रख लेते हैं। इन डीलर्स और एजेंसियों से इतर मैत्रेय कलाकारों को मुफ़्त में अपने उत्पाद ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्म पर प्रदर्शित करने की छूट देता है और माल की बिक्री होने पर सिर्फ़ 2 प्रतिशत तक ही कमीशन चार्ज करता है और 98 प्रतिशत हिस्सा कलाकारों को जाता है।"


मैत्रेय न सिर्फ़ कलात्मक उत्पादों की बिक्री करता है, बल्कि कला के संरक्षण की दिशा में भी काम करता है। मैत्रेय ने साइंस और आर्ट्स के बारे में पढ़ाने के लिए एक शिक्षण संस्थान भी शुरू किया है। मैत्रेय की कोशिश है कि मथुरा स्कूल ऑफ़ आर्ट्स को रीक्रिएट किया जाए। कंपनी इस तरह से ऐतिहासिक विरासतों और लुप्त होती कलाओं को बचाने के लिए तरह-तरह के प्रयास करती रहती है।

समर्थ कहते हैं, "वह चाहते हैं कि नज़रअंदाज़ करने की वजह से पूरी तरह से ख़त्म हो चुकीं ऐतिहासिक कलाओं को फिर से मुख्यधारा में लाया जाए। हम कला को उनके सही कद्रदानों तक पहुंचाना चाहते हैं। हम जल्द ही बाहरी निवेश के लिए प्रयास शुरू करेंगे और अपने बिज़नेस को तेज़ी के आगे ले जाने की कोशिश करेंगे।"


यह भी पढ़ें: MBBS की पढ़ाई के बाद UPSC: 82वीं रैंक लाकर बन गईं आईएएस

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