घर के पीछे 100 वर्ग फीट के आंगन से हुई थी निरमा की शुरुआत, यूं बना सबकी पसंद

By Ritika Singh
December 25, 2022, Updated on : Wed Jan 04 2023 12:22:57 GMT+0000
घर के पीछे 100 वर्ग फीट के आंगन से हुई थी निरमा की शुरुआत, यूं बना सबकी पसंद
निरमा केवल एक प्रॉडक्ट नहीं है, बल्कि मिसाल है एक पिता के अपनी बेटी के लिए प्यार की...
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डिटर्जेंट का जिक्र होते ही बड़ी-बड़ी फैक्ट्रियों की तस्वीर आंखों के आगे घूम जाती है. लेकिन हर डिटर्जेंट की शुरुआत फैक्ट्री से नहीं होती. एक भारतीय डिटर्जेंट ऐसा भी है, जिसकी शुरुआत घर के पीछे के 100 वर्ग फीट के आंगन से हुई थी और इसे शुरू किया था करसनभाई पटेल (Karsanbhai Patel) ने. हम बात कर रहे हैं निरमा (Nirma) की. आज निरमा नाम केवल डिटर्जेंट भर तक सीमित नहीं है.


यह एक ग्रुप के तौर पर जाना जाता है और इसके तहत आने वाली कंपनियां कंज्यूमर और इंडस्ट्रियल दोनों तरह के प्रॉडक्ट बनाती हैं. निरमा केवल एक प्रॉडक्ट नहीं है, बल्कि मिसाल है एक पिता के अपनी बेटी के लिए प्यार की...

आखिर कौन हैं करसनभाई

करसनभाई पटेल का जन्म 1945 में गुजरात के मेहसाणा के एक किसान परिवार में हुआ. करसनभाई ने अपनी शुरुआती शिक्षा मेहसाणा के ही एक स्थानीय स्कूल से पाई और केमिस्ट्री में बीएससी किया. इसके बाद वह बिजनेस करना चाहते थे लेकिन परिवार की स्थिति ऐसी नहीं थी कि वह खुद का कोई काम शुरू कर सकें. इसलिए करसनभाई पढ़ाई पूरी करने के बाद न्यू कॉटन मिल्स, अहमदाबाद में लैब टेक्नीशियन बन गए. कुछ वक्त बाद उन्हें गुजरात सरकार के खनन और भूविज्ञान विभाग में सरकारी नौकरी मिल गई.

फिर एक हादसे ने बदलकर रख दिया सब कुछ

करसनभाई की जिंदगी सरकारी नौकरी करते-करते कट रही थी. फिर एक दर्दनाक हादसा हुआ और करसनभाई की जिंदगी में उथल-पुथल मच गई. हुआ यूं कि स्कूल में पढ़ने वाली उनकी लाडली बेटी की एक हादसे में मौत हो गई. करसनभाई अपनी बेटी से बेहद प्यार करते थे और चाहते थे कि उनकी बेटी पढ़ लिख कर कुछ ऐसा करे कि पूरा देश उसे जाने. लेकिन उसकी मौत ने करसनभाई को अंदर तक तोड़ दिया. फिर एक सुबह, करसनभाई की जिंदगी की एक नई सुबह बनकर आई. करसनभाई की बेटी का नाम निरूपमा था लेकिन प्यार से सब उसे निरमा कहते थे. इसी नाम से करसनभाई ने वॉशिंग पाउडर बनाने का सोचा. उनका मकसद अपनी इस कोशिश से अपनी बेटी के नाम को हमेशा जिंदा रखना था.

1969 में डाली निरमा की नींव

1969 में उन्होंने अपने मकसद की ओर कदम बढ़ाया. करसनभाई अहमदाबाद में अपने घर के पीछे 100 वर्ग फीट के आंगन में सोडा ऐश के साथ कुछ अन्य सामग्रियां मिलाकर वॉशिंग पाउडर बनाने की कोशिश करने लगे. करसनभाई सरकारी लैब में जूनियर केमिस्ट के तौर पर काम कर रहे थे. मूनला​इटिंग के तौर पर घर के पिछवाड़े में डिटर्जेंट बना रहे थे.


एक दिन उनकी कोशिश कामयाब हुई और पीले रंग का डिटर्जेंट बनकर तैयार हो गया. यह फॉस्फेट फ्री सिंथेटिक डिटर्जेंट पाउडर था. उस वक्त भारत में आम लोगों के पास वॉशिंग पाउडर को लेकर ज्यादा विकल्प उपलब्ध नहीं थे. उस दौर में पूरे देश में हिंदुस्तान लीवर लिमिटेड (अब हिंदुस्तान यूनिलीवर) के ब्रांड, ‘सर्फ’ का डिटर्जेंट बाजार में एकाधिकार हुआ करता था. दाम ज्यादा होने के कारण यह मध्यवर्गीय और निम्न मध्यवर्गीय परिवार की पहुंच से दूर था. ऐसे में लोग साबुन का इस्तेमाल करते थे, जिससे हाथ खराब होने का डर रहता था.


करसनभाई ने इस कमी को अवसर माना और इसे भुनाने में जुट गए. वह काम से लौटकर पॉलीथीन बैग में पैक्ड अपने डिटर्जेंट को घर-घर जाकर अपना बेचने लगे. वह अपनी साइकिल पर रखकर इसे घर-घर बेचा करते थे. इतना ही नहीं यह गारंटी भी देते थे कि अगर डिटर्जेंट पाउडर सही नहीं निकला तो पैसे वापस कर देंगे.

सस्ते में किया ऑफर

लोगों के घरों और बाजार में अपनी पैठ बनाने के लिए करसनभाई ने निरमा की कीमत कम रखी. निरमा उन दिनों सबसे सस्ता डिटर्जेंट था. सर्फ की कीमत जहां 10-15 रुपये प्रति किलो थी, वहीं करसन भाई केवल 3 रुपये प्रति किलो पर निरमा ऑफर करते थे. इसका नतीजा यह हुआ कि निरमा, मध्यवर्गीय और निम्न मध्यवर्गीय परिवारों में अपनी जगह बनाने में कामयाब होने लगा. करसनभाई पटेल का कार्यालय उनके घर से 15 किमी दूर था. वह कार्यालय जाते हुए साइकिल पर एक दिन में डिटर्जेंट के 15-20 पैकेट बेच लिया करते थे. निरमा की अच्छी क्वालिटी और कम दाम ने इसे जल्द ही लोगों के बीच पॉपुलर कर दिया.


निरमा की शुरुआत के 3 साल बाद करसनभाई ने नौकरी छोड़ दी. उन्होंने अहमदाबाद सबअर्ब में एक छोटी वर्कशॉप में दुुकान भी खोली थी. शुरुआत के 10 सालों के अंदर ही निरमा भारत में सबसे ज्यादा बिकने वाला डिटर्जेंट बन गया.

बिक्री बढ़ाने की खास स्ट्रैटेजी

पूरे ​देश में हर किसी तक निरमा की पहुंच हो, इसके लिए करसनभाई ने विज्ञापनों और जिंगल्स की भी मदद ली. 'हेमा, रेखा, जया और सुषमा...' या फिर 'वॉशिंग पाउडर निरमा, वॉशिंग पाउडर निरमा...' ये जिंगल्स तो आपने सुनी ही होंगी. निरमा ब्रांड को देश भर में प्रसिद्धि दिलाने में ‘सबकी पसंद निरमा’ जैसे टेलीविजन विज्ञापन का बहुत बड़ा योगदान माना जाता है. बिक्री बढ़ाने के लिए करसनभाई ने एक अलग तरह की स्ट्रैटेजी का भी सहारा लिया. जब निरमा की मांग बढ़ी तो करसनभाई ने बाजार से प्रॉडक्ट के 90% स्टॉक वापस ले लिए लेकिन टीवी पर विज्ञापन जारी रहे. एक महीने तक ग्राहक केवल निरमा को टीवी विज्ञापन में ही देख पाए. जब वह बाजार में इसे खरीदने जाते तो उन्हें कहीं भी ये न मिलता.


फिर जब निरमा की बंपर मांग को देखकर खुदरा विक्रेताओं ने आपूर्ति के लिए करसनभाई से अनुरोध किया, तब जा कर एक महीने बाद निरमा फिर से मार्केट में दिखने लगा. करसनभाई की इस स्ट्रैटेजी का असर यह हुआ कि बाजार में आते ही निरमा ने बड़े अंतर से डिटर्जेंट के अन्य ब्रांड्स को पीछे छोड़ दिया. उस वर्ष निरमा भारत में सबसे अधिक बिकने वाला वाशिंग पाउडर था.

निरमा इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी

करसनभाई अपनी मेहनत, अलग सोच व स्ट्रैटेजी की बदौलत 1980 के दशक की शुरुआत में पूरे देश का ध्यान खींचने और बाजार में बड़े नामों से आगे निकलने में सफल रहे थे. 1985 तक निरमा वॉशिंग पाउडर देश के कई हिस्सों में सबसे ज्यादा पॉपुलर, हाउसहोल्ड डिटर्जेंट्स में अपनी जगह बना चुका था. 1980 के दशक के दौरान निरमा की परफॉरमेंस को एक युग के 'मार्केटिंग चमत्कार' के रूप में चिह्नित किया गया है.


कंपनी शेयर बाजारों में साल 1994 में लिस्ट हुई. साल 1999 तक Nirma एक बड़ा कंज्यूमर ब्रांड था. 1995 में करसनभाई ने अहमदाबाद में निरमा इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी को शुरू किया. साल 2003 में उन्होंने इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट और निरमा यूनिवर्सिटी ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी को शुरू किया.

क्या-क्या बनाता है निरमा ग्रुप

निरमा ग्रुप का हेडक्वार्टर अहमदाबाद में है. कंज्यूमर प्रॉडक्ट्स में निरमा बाथ सोप, नीमा सोप, निरमा डिटर्जेंट व बार प्रॉडक्ट, शुद्ध नमक, निरमा क्लीन डिशवॉश बार, निरमा बर्तन बार शामिल हैं. इसके अलावा यह ग्रुप सीमेंट, कॉस्मेटिक्स, नमक, सोडा ऐश, LAB और injectables बनाता है. निरमा ग्रुप इस वक्त पूरी दुनिया में सोडा ऐश का सबसे ज्यादा मात्रा में उत्पादन करता है. इसके शैंपू और टूथपेस्ट सफल नहीं रहे.


साल 2007 में निरमा ने अमेरिका की रॉ मैटेरियल कंपनी Searles Valley Minerals Inc का अधिग्रहण कर लिया. इस डील से निरमा दुनिया के टॉप 7 सोडा ऐश मैन्युफैक्चरर्स में शामिल हो गई. करसनभाई और उनके परिवार ने साल 2011 में निरमा को डीलिस्ट कर एक प्राइवेट कंपनी में बदलने का फैसला किया. ग्रुप ओनर्स ने भारी डिस्काउंट पर निरमा के शेयर बायबैक किए. साल 2014 में ग्रुप ने निंबोल में एक प्लांट के माध्यम से सीमेंट बनाना शुरू किया. 2016 में ग्रुप ने लफार्ज इंडिया के सीमेंट एसेट्स को 1.4 अरब डॉलर में खरीद लिया. फरवरी 2020 में इसे इमामी सीमेंट को 5500 करोड़ रुपये में खरीद लिया.

पद्मश्री से सम्मानित हैं करसनभाई

पटेल को कई प्रतिष्ठित पुरस्कारों के साथ सम्मानित किया जा चुका है, जैसे कि..

- साल 1990: फेडरेशन ऑफ एसोसिएशन ऑफ स्मॉल स्केल इंडस्ट्री ऑफ इंडिया ने उद्योग रत्न अवॉर्ड से नवाजा

- साल 2010: पद्मश्री से नवाजा गया

-साल 2017: फोर्ब्स ने करसनभाई को भारत के सबसे अमीर लोगों की सूची में 38वें नंबर पर रखा

- साल 2019: भारत के सबसे अमीर लोगों की लिस्ट में 30वां स्थान मिला


फोर्ब्स के मुताबिक, इस वक्त करसनभाई पटेल की दौलत 2.9 अरब डॉलर है. वह भारत के अमीर लोगों की 2021 की लिस्ट में 46वें नंबर पर थे.