किराए की साइकिल ने गांव की लड़कियों को दिए पंख, स्कूल जाने का रास्ता हुआ आसान

By जय प्रकाश जय
January 29, 2019, Updated on : Thu Sep 05 2019 07:20:58 GMT+0000
किराए की साइकिल ने गांव की लड़कियों को दिए पंख, स्कूल जाने का रास्ता हुआ आसान
  • +0
    Clap Icon
Share on
close
  • +0
    Clap Icon
Share on
close
Share on
close

सांकेतिक तस्वीर

किसी भी कीमत पर लड़कियों को स्कूल भेजने की अभिभावकों की पहल रंग ला रही है। देश के कई राज्यों में स्कूल-कॉलेज जाने वाली लड़कियों की संख्या का अनुपात लड़कों से ज्यादा हो चुका है। नबीला एक ऐसी ही लड़की है, जो रोजाना आठ किलो मीटर 'उधार' की साइकिल से कॉलेज जाकर अपनी पढ़ाई पूरी करने में जुटी है। 


यूपी में छेड़छाड़ के डर, आर्थिक बदहाली, आवागमन के सुरक्षित साधनों के अभाव में किशोर वय की लगभग पांच लाख लड़कियां बीच में ही पढ़ाई छोड़कर घर बैठ जाती हैं। यह कोई अनुमान नहीं, बल्कि महिला एवं बाल विकास मंत्रालय की एक रिपोर्ट में बताया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक, 14 साल की उम्र तक पढ़ने वाले 95.3 प्रतिशत लड़कों और 94.3 लड़कियों की संख्या में मामूली सा अंतर होता है लेकिन उसके बाद यह आकड़ों का फासला चार प्रतिशत के आसपास हो जाता है। अठारह वर्ष की आयु तक लड़कों का 71.6 और लड़कियों का 67.4 प्रतिशत रह जाता है। ऐसे में इंटर की छात्रा नबीला एक मिसाल की तरह सामने आती है।


लखनऊ से सटे बाराबंकी के गांव चंदवारा में रहने वाली राजकीय बालिका इंटर कॉलेज की इंटरमीडिएट की छात्रा नबीला को रोजाना आठ किलो मीटर 'उधार' की साइकिल से इसलिए जिला मुख्यालय तक का सफर करना पड़ता है कि उसके गांव के पास सिर्फ आठवीं तक की स्कूली सुविधा उपलब्ध है। नबीला के पिता सिराज बताते हैं कि पहले स्कूल जाने के नाम पर वह आए दिन कोई न कोई बहाना बना देती थी। जब से उसको साइकिल मिली है, एक भी दिन नागा नहीं करती है।


हमारे देश में अभावग्रस्त परिवारों की लड़कियों की पढ़ाई की राह में कोई एक ही तरह की बाधा नहीं। एक तिहाई सरकारी स्कूलों में लड़कियों के लिए शौचालय तक नहीं है। आकड़ों का हाल ये है कि देश के 61 लाख बच्चे अब भी प्राइमरी स्कूल तक भी नहीं पहुंच पा रहे हैं, जिसमें लड़कियों की स्थिति तो और भी खराब है। लगभग 22 लाख से भी ज्यादा लड़कियों की शादी कम उम्र में हो जाती है, जिससे उनका स्कूल और आगे की पढ़ाई भी छूट जाती है।


नबीला रोज साइकिल से स्कूल जाती है और आराम से अपनी पढ़ाई पूरी कर पा रही है। यह साइकिल उसको बहुत प्रिय है लेकिन ये साइकिल उसकी नहीं है। ये उसको अपने गांव के साइकिल बैंक से उधार मिली है, इस शर्त के साथ कि पढ़ाई पूरी होने पर वो इसे चालू हालत में साइकिल बैंक में जमा कर देगी। जिला मुख्यालय तक जाने के परिवहन के अन्य माध्यमों की स्थिति दुखद है। खटारा वाहन एक तो समय से नहीं चलते, सवारियों के भर जाने के इंतजार में खड़े रहते हैं, दूसरे ऐसे वाहनों में मनचली सवारियों द्वारा छेड़छाड़ का डर रहता है। रास्ते की ऐसी आपबीती घर वालों को बताने से लड़कियां इसलिए डरती हैं कि परिवार के लोग उनका स्कूल जाना रोक देंगे।

 

लड़कियों के लिए जहां तक आवासीय विद्यालयों की बात है, एक तो ऐसे स्कूल हर शहर, कस्बे में उपलब्ध नहीं, दूसरे उनका भुगतान हर माता-पिता के वश का नहीं होता है। ऐसे स्कूलों में बच्चों की काउंसलिंग की भी कोई व्यवस्था नहीं होती है। नतीजा होता है कि ऐसे स्कूलों के एक क्लास से मुश्किल से एक बच्चा आगे अपना भविष्य बना पाता है। वैसे आवासीय विद्यालयों में लड़कियों के शोषण की बात भी अब आम हो चुकी है। नबीला अपने पिता से पहले बहाना कर दिया करती थी कि पढ़ाई में दिल नहीं लग रहा है। उसके पिता टीवी रिपेयरिंग की दुकान पर काम करते हैं। बहाने कर-करके उसकी पढ़ाई छूटने ही वाली थी कि साइकिल उसका सहारा बन गई।


नबीला के गांव की प्रधान प्रकाशिनी जायसवाल ने भी बहुत अच्छा काम किया है, जिसका गांव की सभी लड़कियों को फायदा मिला है। इस गांव की नबीला समेत और भी कई लड़कियां शशि, लक्ष्मी, आफरीन, बेबी आदि साइकिल से स्कूल जा रही हैं। बताते हैं कि ग्राम प्रधान ने अपने पति के सहयोग से पैसे इकट्ठे कर बीस साइकिलें खरीदीं। नाम रखा गया 'साइकिल बैंक'। इसके बाद तो गांव और आसपास की लड़कियों का स्कूली सफर आसान हो चला। जिन लड़कियों की पढ़ाई पूरी हो जाती है, वे उसे साइकिल बैंक को लौटा देती है। इसके लिए मामूली सा भुगतान करना पड़ता है। एक तरह से साइकिल बैंक जेंडर समानता की ओर एक पहल जैसा है। इससे लड़कियों को अपनी शिक्षा और अन्य कारण के लिए आने जाने की सुविधा उपलब्ध हो जाती है। 


अब वक्त भी बदल रहा है। भारत में बीते पांच साल के दौरान जहां उच्च शिक्षा हासिल करने वाले लड़कों की तादाद कमोबेश समान रही है, वहीं लड़कियों की तादाद लगातार बढ़ रही है। एक ताजा सर्वेक्षण के मुताबिक वर्ष 2016-17 के दौरान लैंगिक समानता सूचकांक (जीपीआई) पर बीते सात वर्षों का सबसे बेहतर प्रदर्शन किया। वर्ष 2010-11 में जहां यह सूचकांक 0.86 था वहीं अब 0.94 तक पहुंच गया है। गोवा, हिमाचल प्रदेश, मेघालय, जम्मू-कश्मीर, सिक्किम व केरल जैसे राज्यों में पढ़ी-लिखी महिलाओं की तादाद पुरुषों, के मुकाबले ज्यादा है। इस सर्वेक्षण में कहा गया है कि उक्त अवधि के दौरान देश में विश्वविद्यालयों की तादाद भी 799 से बढ़ कर 864 तक पहुंच गई है। उच्च-शिक्षा हासिल करने वाले 3.57 करोड़ छात्रों में 1.9 करोड़ लड़के हैं और 1.67 करोड़ लड़कियां। बीते पांच वर्षों के दौरान दोनों के बीच का यह अंतर नौ लाख से ज्यादा घटा है यानी इस दौरान लड़कों की तादाद तो कमबेश समान रही है लेकिन उच्च-शिक्षा के लिए विभिन्न संस्थानों में दाखिला लेने वाली लड़कियों की तादाद नौ लाख से ज्यादा हो चुकी है। 


यह भी पढ़ें: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ योरस्टोरी का एक्सक्लूसिव इंटरव्यू