ग्रीनहाउस सेटअप के ज़रिए किसानों के लिए पानी की समस्या को सुलझा रहा हैदराबाद का यह स्टार्टअप

ग्रीनहाउस सेटअप के ज़रिए किसानों के लिए पानी की समस्या को सुलझा रहा हैदराबाद का यह स्टार्टअप

Wednesday July 17, 2019,

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"भूमिगत जल पर भारत की कुल पानी की सप्लाई का 40 प्रतिशत हिस्सा निर्भर करता है। भूमिगत जल का स्तर लगातार गिरता जा रहा है और इसकी गुणवत्ता भी लगातार ख़राब होती जा रही है, जिससे विभिन्न प्रकार की बीमारियां फैल रही हैं और मौतें भी हो रही हैं। लेकिन पानी की कमी और गुणवत्ता के ख़राब होने का सबसे बुरा प्रभाव किसानों पर पड़ रहा है।"


Greenhouse

ग्रीनहाउस सेटअप


आज की तारीख़ में, करीब 60 करोड़ लोग पानी की किल्लत से जूझ रहे हैं। पानी की कमी ने पूरे देश में किसानों की कमर तोड़ रखी है। हैदराबाद का 'खेती' स्टार्टअप ऐसे हालात में मदद करने के प्रयास में लगा हुआ है। 


हाल ही में, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ट्वीट के माध्यम से गन्ने की खेती के लिए स्प्रिंकलर और ड्रिप इरिगेशन सिस्टम का इस्तेमाल करके जल संरक्षण की पद्धति को अपनाने का संदेश दिया था।


देश के विभिन्न हिस्सों और विशेषरूप में तमिलनाडु में पानी की भारी कमी है और इस संदर्भ में ही माननीय प्रधानमंत्री द्वारा यह ट्वीट कर जल संरक्षण का संदेश दिया गया था। नीति आयोग द्वारा हाल ही में कराए गए एक अध्ययन के मुताबिक़, पीने के साफ़ पानी की उपलब्धता में कमी की वजह से हर साल 2 लाख लोगों की मौत हो जाती है। समय के साथ-साथ हालात और भी ख़राब होते जा रहे हैं। रिपोर्ट का यह भी कहना है कि 2030 तक भारत में पानी की मांग, सप्लाई की अपेक्षा दोगुनी हो जाएगी और फलस्वरूप पानी की किल्लत के चलते देश की जीडीपी में 6 प्रतिशत तक गिरावट दर्ज होने की आशंका है। 


भूमिगत जल पर भारत की कुल पानी की सप्लाई का 40 प्रतिशत हिस्सा निर्भर करता है। भूमिगत जल का स्तर लगातार गिरता जा रहा है और इसकी गुणवत्ता भी लगातार ख़राब होती जा रही है, जिससे विभिन्न प्रकार की बीमारियां फैल रही हैं और मौतें भी हो रही हैं। लेकिन पानी की कमी और गुणवत्ता के ख़राब होने का सबसे बुरा प्रभाव किसानों पर पड़ रहा है। सरकार अपनी ओर से प्रयास कर रही है, लेकिन कुछ स्टार्टअप्स भी हैं, जो इन हालात को बेहतर बनाना चाहते हैं। इन स्टार्टअप्स में ही गिनती होती है, हैदराबाद के स्टार्टअप, खेती की। इसकी शुरुआत सत्या रघु वी. मोकपती, कौशिक कप्पागंटुलु, सौम्य और आयुष शर्मा ने की थी। 


खेती

स्टार्टअप खेती के फाउंडर्स

सत्या मानते हैं कि पानी का संरक्षण हालिया वक़्त की सबसे बड़ी ज़रूरत है। उनका कहना है कि उनके द्वारा उपलब्ध कराए जा रहे 'ग्रीनहाउस इन अ बॉक्स' (जीआईबी) सॉल्यूशन से इस समस्या से लड़ा जा सकता है। सत्या पहले सीए थे और अब वह बतौर ऑन्त्रप्रन्योर देश के किसानों की मदद करना चाहते हैं। सत्या के साथ हाल ही में योरस्टोरी ने बातचीत की और उनसे जाना कि किसान पानी के कम इस्तेमाल के बावजूद कैसे अच्छा उत्पादन हासिल कर सकते हैं और उनका स्टार्टअप किस प्रकार से पानी की कमी की समस्या को सुलझा रहा है? 


पेश है योरस्टोरी के साथ बातचीत के कुछ अंशः


श्रद्धा शर्माः पानी का कम से कम इस्तेमाल करते हुए अधिक उत्पादन हासिल करने में 'खेती' किस प्रकार से किसानों की मदद कर रहा है?

सत्या रघुः 'खेती', ड्रिप इरिगेशन सिस्टम के इस्तेमाल पर ज़ोर देता है। साथ ही, वाष्पीकरण से पानी को बचाने के लिए सुरक्षा की चार परतों की व्यवस्था की गई है। इसकी बदौलत एक दिन में सिर्फ़ 1 हज़ार लीटर पानी का इस्तेमाल करके, किसान पूरी तरह से ऑर्गेनिक सब्ज़ियां उगा सकते हैं। यह मात्रा 5 लोगों के परिवार में होने वाली पानी की खपत के बराबर है। एक खुले खेत की अपेक्षा ग्रीनहाउस में एक ही फ़सल को उगाने के लिए 98 प्रतिशत तक कम पानी खर्च होता है।




श्रद्धा शर्माः 'ग्रीन हाउस इन अ बॉक्स' की लागत कितनी आती है?

सत्याः एक जीआईबी यूनिट की लागत 1.6 लाख रुपए से लेकर 3 लाख रुपए तक आती है। यह लागत जीआईबी यूनिट के साइज़ पर निर्भर करती है। हमारी सबसे छोटी जीआईबी यूनिट 2 हज़ार स्कवेयर फ़ीट (एक एकड़ा का 1/16 वां हिस्सा) के एरिया में इन्सटॉल हो जाती है और सबसे बड़ी यूनिट 5 हज़ार स्कवेयर फ़ीट (एक एकड़ का 1/8वां हिस्सा) में फैली होती है। इस इन्सटॉलेशन में एक ग्रीनहाउस, एक ड्रिप इरिगेशन किट, बीज और उर्वरक आदि शामिल होते हैं। 


श्रद्धा शर्माः आपको ऐसा क्यों लगता है कि भारत में किसानों के लिए 'खेती' एक अच्छा विकल्प हो सकता है? 

सत्याः तीन वजहें हैं, जिनके चलते हमें लगता है कि हम मार्केट में सबसे अच्छा विकल्प पेश कर रहे हैं।


1) हम देश का एकमात्र क्लाइमेट-स्मार्ट ऐग्रीकल्चरल सॉल्यूशन मुहैया करा रहे हैं, जिसकी मदद से छोटे स्तर पर खेती करने वाले किसान भी ग्रीनहाउस सेटअप की मदद से सब्ज़ियां उगा सकते हैं और अच्छी आय पैदा कर सकते हैं।


2) हमने अपने शोध के बल पर लागत को भी 40 प्रतिशत तक कम कर दिया है और इस वजह से छोटे स्तर पर खेती करने वाले किसानों पर पैसे की मार भी कम पड़ रही है। 


3) इतना ही नहीं, हम देश में पहले और अकेले हैं, जो ग्रीनहाउस जैसी खेती से जुड़ी सुविधाओं के साथ-साथ विशेषज्ञों की राय, फ़ाइनैंस, ट्रेनंग और मार्केट लिंक भी उपलब्ध करा रहे हैं। इसकी बदौलत किसानों को हर तरह से मदद मिल रही है। 


श्रद्धा शर्माः भारत में पानी की कमी पर आपकी क्या राय है? 

सत्याः यह एक वास्तविक समस्या है, जो समय के साथ-साथ गंभीर होती चली जा रही है। खुले खेत में पैदावार के लिए किसानों को जितने पानी की ज़रूरत होती है, उन्हें उसका सिर्फ़ 20 प्रतिशत हिस्सा ही उपलब्ध हो पा रहा है। मांग और उपलब्धता के बीच की यह कमी किसानों के साथ-साथ बाज़ार पर भी बुरा असर डाल रही है। सिंचाई परियोजनाओं, चेक डैम्स और वॉटर हार्वेस्टिंग की मदद से हमें इस परिदृश्य को बदलने की ज़रूरत है। 


हमने एक ऐसा मॉडल विकसित किया है, जिसके इस्तेमाल के लिए सरकारी की ओर सब्सिडी की भी ज़रूरत नहीं पड़ती। अगर सरकार अपनी ओर से मदद बढ़ाती है तो इस तरह के सॉल्यूशन को और भी बड़े वर्ग तक पहुंचाना संभव होगा।



श्रद्धा शर्माः औसतन किसानों द्वारा कितने पानी का इस्तेमाल किया जाता है?

सत्याः सब्ज़ियों के लिए किसान एक दिन में 50 हज़ार लीटर पानी और धान उगाने के लिए एक दिन में 1 लाख लीटर से भी ज़्यादा पानी का इस्तेमाल करते हैं। वैश्विक तौर पर औसत रूप से साफ़ पानी का लगभग 70 प्रतिशत हिस्सा खेती और उससे जुड़े कामों में इस्तेमाल हो जाता है। 



श्रद्धा शर्माः आपके उत्पाद से कितने किसान लाभान्वित हो चुके हैं? 

सत्याः दिसंबर, 2018 में हमने 15 गांवों में 150 किसानों के साथ काम किया। इस प्रोजेक्ट में मिली सफलता के बाद हमने इस साल 500 और परिवारों को इस प्रोजेक्ट में साथ आने के लिए तैयार किया है। हमारा लक्ष्य है कि 2025 तक 1 लाख किसानों को अपनी मुहिम के साथ जोड़ा जाए। 


श्रद्धा शर्माः क्या छोटे स्तर पर काम करने वाले किसानों के लिए यह क़ीमत ज़्यादा नहीं है? 

सत्याः हमारे सॉल्यूशन में लगने वाले लागत का सिर्फ़ 10 प्रतिशत किसानों को शुरुआत में देना पड़ता है और बाक़ी हिस्सा बैंक द्वारा फ़ाइनैंस कर दिया जाता है। उत्पादन पूरा होने के बाद किसान बची हुई रकम चुका सकते हैं। यह एक बार का निवेश होता है और आने वाले 15 सालों या इससे भी ज़्यादा समय तक किसान लाभ उठा सकते हैं।