जॉन्डिस से मर रहे नवजात बच्चों को बचाने के लिए इस डॉक्टर ने तैयार की मशीन

By yourstory हिन्दी
February 14, 2019, Updated on : Thu Sep 05 2019 07:31:24 GMT+0000
जॉन्डिस से मर रहे नवजात बच्चों को बचाने के लिए इस डॉक्टर ने तैयार की मशीन
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पोर्टेबल मशीन का उद्घाटन करते नीति आयोग के सीईओ अमिताभ कांत

हमारी स्टार्टअप भारत सीरीज़ का पहला आर्टिकल, टियर-II और टियर-III शहरों में होने वाले अनूठे और कारगर प्रयोगों के महत्व पर केंद्रित है। हम बात करने जा रहे हैं लाइफ़ट्रॉन इनोव इक्यूपमेंट्स के डॉ. किरन कांती। इस स्टार्टअप ने नवजात बच्चों में जॉन्डिस के किफ़ायती इलाज के लिए एक पोर्टेबल मशीन तैयार की है। इस मशीन की मदद से हर साल जॉन्डिस जैसी ख़तरनाक बीमारी से होने वाली मौतों को रोका जा सकता है। इस स्टार्टअप को हुबली, कर्नाटक में सैंडबॉक्स स्टार्टअप्स में इनक्यूबेशन मिला था।


डॉ. किरन कांती ने योर स्टोरी को बताया कि भारत में हर साल 8 लाख से ज़्यादा नवजात शिशुओं की मौत होती है और इनमें से अधिकतर केस जॉन्डिस के होते हैं। उनका कहना है कि अगर उन्हें सही समय पर उपयुक्त इलाज मिल जाए तो उनकी जान बचाई जा सकती है। 


नवजात बच्चों को जॉन्डिस की आशंका काफ़ी अधिक होती है। पूरे नौ महीने बाद जन्म लेने वाले 3 बच्चों में से 2 बच्चों को जॉन्डिस होने की आशंका होती है, वहीं 5 प्रीमैच्योर बच्चों में से 4 को जॉन्डिस की बीमारी होती है। इसका सबसे प्रभावी इलाज है, फोटोथेरपी यानी विज़िबल लाइट के इस्तेमाल से बिलिरुबिन लेवल्स के दुष्प्रभावों को कम करना। सूरज की रौशनी से नवजात बच्चों में जॉन्डिस की बीमारी का इलाज होता है। बड़े अस्पतालों में इस इलाज के लिए संसाधन मौजूद होते हैं, लेकिन ग्रामीण इलाकों में ये सुविधाएं मौजूद नहीं होतीं। 


किरन पेशे से एक एनेस्थिसियॉलॉजिस्ट हैं। किरन पिछले 20 सालों से उत्तरी कर्नाटक के बागलकोट में नियोनैटल नर्सिंग सेंटर चला रहे हैं। उनका नर्सिंग होम कर्नाटक के ग्रामीण इलाकों में स्थित उन चुनिंदा अस्पतालों में से एक है, जहां पर फोटोथेरपी ट्रीटमेंट की सुविधा उपलब्ध है।


किरन बताते हैं, "मार्केट में उपलब्ध उपकरण बेहद मंहगे और भारी होते हैं। इन्हें लगाने के लिए नियोनैटल इनटेंसिव केयर (एनआईसीयू) सेटअप की आवश्यकता होती है, जहां पर नवजात को मां से अलग रखकर, उसकी निगरानी की जाती है। ग्रामीण इलाकों में इस तरह की व्यवस्था का अभाव होता है।"


यूनिसेफ़ की एक रिपोर्ट के मुताबिक़, नियोनैटल मॉर्टेलिटी के हिसाब से भारत दुनिया में 12वें नबंर पर है। सही इलाज के अभाव में हो रही इन दुर्भाग्यपूर्ण मौतों को रोकने के उद्देश्य के साथ, किरन ने फ़ैसला लिया कि वह लोगों को उनके घरों तक सुविधाएं पहुंचाएंगे और इसके फलस्वरूप ही उन्होंने 2016 में हुबली, कर्नाटक से लाइफ़ट्रॉन्स इनोव इक्युपमेंट्स की शुरुआत की। कॉन्सेप्ट बेहद सरल और स्पष्ट था कि एक किफ़ायती, पोर्टेबल, बेडसाइड नियोनैटल फोटोथेरपी यूनिट विकसित की जाए, जिसे किसी भी सुदूर या ग्रामीण इलाके में सहजता के साथ इस्तेमाल किया जा सके।


वह बताते हैं कि डिज़ाइन तय होने के बाद उसका प्रारूप (प्रोटोटाइप) तैयार करने के लिए उन्हें इंजीनियर्स की ज़रूरत थी और उन्हें डिज़ाइन और उसकी उपयोगिता समझाना काफ़ी चुनौतीपूर्ण काम था। उन्होंने तीन सालों तक डिज़ाइन पर काम किया और इसके बाद उन्होंने सबसे उपयुक्त डिज़ाइन पर सहमति जताई। किरन ने जानकारी दी कि उन्होंने दो सीएडी डिज़ाइनर्स और दो इंजीनियर्स हायर किए थे।


अपने शोध के दौरान किरन की मुलाक़ात, सी. एम. पाटिल से हुई, जो हुबली स्थित एक इनक्यूबेटर, देशपांडे फ़ाउंडेशन सैंडबॉक्स स्टार्टअप्स को संचालित करते हैं। इस दौरान ही, उन्होंने लैब और उपकरणों का सेटअप जमाया। पिछले साल मार्च में, नीति आयोग के सीईओ अमिताभ कांत ने किरन के स्टार्टअप का उद्घाटन किया।


लाइफ़ट्रॉन को अभी अपनी इस अत्याधुनिक फोटोथेरपी यूनिट के लिए पेटेंट मिलना बाक़ी है। इसकी लागत हाल में बड़े पैमाने पर इस्तेमाल हो रहीं यूनिट्स से लगभग आधी यानी 30 हज़ार रुपए तक है। इस डिज़ाइन में बैटरी बैकअप की पूरी व्यवस्था की गई है और इसे बड़ी आसानी के साथ किसी भी प्राइमरी हेल्थकेयर सेंटर पर इस्तेमाल में लाया जा सकता है। हुबली और किरन के नर्सिंग होम में इस प्रोटोटाइप के ट्रायल्स हो चुके हैं और लाइफ़ट्रॉन की टीम ने इंडियन सर्टिफ़िकेशन फ़ॉर मेडिकल डिवाइसेज़ और अन्य संस्थाओं के पास सर्टिफ़िकेशन के लिए आवेदन भी दे दिया है।


किरन कहते हैं, "हमारी योजना इस साल एक हज़ार यूनिट्स बेचने और 4 करोड़ रुपए तक रेवेन्यू जमा करने की है। शुरुआती कुछ महीनों के बाद हमारे पास 100 पेंडिंग ऑर्डर्स है, जिन्हें हम जल्द से जल्द पूरा करने की कोशिश कर रहे हैं। हमे पूरी उम्मीद है कि पोर्टेबल फोटोथेरपी यूनिट ग्लोबल मार्केट में अपनी उपयोगिता साबित कर पाएगी।"


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