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हिंदी को राजकीय भाषा का दर्जा दिलाने के लिए संघर्षरत रहे ये स्वतंत्रता सेनानी

हिंदी को राजकीय भाषा का दर्जा दिलाने के लिए संघर्षरत रहे ये स्वतंत्रता सेनानी

Tuesday March 07, 2023 , 3 min Read

30 अगस्त, 1887 में जन्में प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी और देशभक्त गोविन्द बल्लभ पंत (Govind Ballabh Pant) आज़ाद भारत में उत्तर प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री और बाद में भारत के होम मिनिस्टर बने.


पन्त की अनेक उपलब्धियों में उनकी एक उपलब्धि रही भाषाई आधार पर राज्यों का पुनर्गठन. भाषा के आधार पर राज्यों के पुनर्गठन को हमेशा से ही देश की एकता के लिए खतरा समझा जाता रहा है. पर इतिहास देखें तो पाएंगे कि इस चीज ने भारत को सबसे ज्यादा जोड़ा है. अगर पंत को सबसे अधिक किसी चीज़ के लिए जाना जाता है, तो हिंदी को राजकीय भाषा का दर्जा दिलाने के लिए.


साल 1957 में इनको ‘भारत रत्न’ से भी सम्मानित किया गया.1920 में जब “रोलेट एक्ट” के विरोध में महात्मा गांधी ने असहयोग आन्दोलन छेड़ा तो पन्त अपनी चलती वकालत छोड़ इस आन्दोलन का हिस्सा बने.


पन्त ने लॉ की डिग्री ली थी. 1909 में गोविंद बल्लभ पंत को लॉ एक्जाम में यूनिवर्सिटी में टॉप करने पर 'लम्सडैन' गोल्ड मेडल मिल चुका था. कानून की पढ़ाई पूरी करने के बाद साल 1910 में अल्मोड़ा में वकालत भी की और बाद में वे काशीपुर (उत्तराखंड) चले गए. काशीपुर में रहते हुए उन्होंने ‘प्रेम सभा’ नामक एक संगठन की स्थापना की, जो विभिन्न सामाजिक सुधारों की दिशा में काम करता था.


वकालत करने के साथ-साथ वे “कुली बेगार” जैसी अपमानजनक प्रथा के खिलाफ भी लडे. कुली बेगार कानून में था कि लोकल लोगों को अंग्रेज अफसरों का सामान फ्री में ढोना होता था. पंत इसके विरोधी थे. 


पन्त ने काकोरी कांड में गिरफ्तार हुए राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खां का केस भी लड़ा था.


साल 1921 में कांग्रेस में शामिल हुए और जल्द ही भारत की आज़ादी की लड़ाई के हिस्सा बन ग1930 के ‘डांडी मार्च’ में भाग लेने पर उन्हें जेल हुई. 1942 में ‘भारत छोड़ो’ प्रस्ताव पर हस्ताक्षर करने के लिये उन्हें 3 साल की कैद मिली.


द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान गांधी और सुभाष चंद्र बोस के बीच हुई बहस में समझौता कराने के प्रयास भी किया. गांधी चाहते थे कि युद्ध के दौरान ब्रिटिश शासन का समर्थन किया जाए, वहीं सुभाष चंद्र बोस का मत इसके उलट था.


देश के आज़ाद होने के बाद उत्तर प्रदेश (तब संयुक्त प्रांत) के पहले मुख्यमंत्री बने, जिसमें नारायण दत्त तिवारी संसदीय सचिव नियुक्त किये गये थे.


मुख्यमंत्री के रूप में उनकी विशाल योजना नैनीताल तराई को आबाद करने की थी. ‘भूमि सुधार’ में भी महत्ववपूर्ण भूमिका निभाई.


7 मार्च 1961 को उनकी मृत्यु हार्टअटैक के कारण हुई.


गोविन्द बल्लभ पन्त को समर्पित भारत का पहला कृषि विश्वविद्यालय, गोविन्द बल्लभ पन्त कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, साल 1960 में खोला गया.


गोविन्द बल्लभ पंत के सम्मान में 1989 में गोविन्द बल्लभ पंत अभियान्त्रिकी महाविद्यालय उत्तराखण्ड में खोला गया, जिसे उत्तराखण्ड सरकार संचालित करती है.


गोविन्द बल्लभ पंत के नाम पर उत्तर प्रदेश के सोनभद्र जिले में गोविन्द बल्लभ पंत सागर बांध है.


नई दिल्ली में इनके नाम पर पंडित पंत मार्ग है.