574वीं रैंक हासिल कर यूपीएससी में मिली मजदूर के बेटे को कामयाबी

By जय प्रकाश जय
June 07, 2019, Updated on : Thu Sep 05 2019 07:32:07 GMT+0000
574वीं रैंक हासिल कर यूपीएससी में मिली मजदूर के बेटे को कामयाबी
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आजकल वैसे तो हर मेधावी युवा का पहला सपना आईएएस-आईपीएस बनना होता है लेकिन सामान्य जीवन में तमाम कठिनाइयों के बीच ऐसी सफलता पाना कितना कठिन होता है, इसे पांचवीं कोशिश में कामयाब हुए केरल के संघर्षशील जोसफ के. मैथ्यू की जिंदगी से भलीभांति समझा जा सकता है।


joseph upsc

अपने साथियों के साथ जोसेफ मैथ्यू (दाएं से दूसरे)

आज का हर युवा अपने जीवन में जल्दी सफल हो लेना चाहता है, लेकिन उनमें से ज्यादातर सफलता हासिल करने के लिए संघर्ष और सब्र से, जितना हो सके, परहेज रखना चाहते हैं। पांचवें अटैम्प्ट में यूपीएससी की परीक्षा पास कर चुके कोट्टायम (केरल) निवासी आईएएस जोसफ के. मैथ्यू का जिंदगीनामा, एक ऐसे संघर्षशील व्यक्ति की दास्तान है, जो आज किसी भी युवा के लिए प्रेरक टिप्स हो सकती है।


कोई बड़ी सफलता हमारे हाथ में नहीं होती है बल्कि उसे पाने के लिए निरन्तर प्रयास करना पड़ता है, उम्मीद बनाए रखनी होती है क्योंकि यह कोई बाजार में बिकने वाली वस्तु नहीं, जिसे कोई भी आसानी से खरीद ले। यह तो सिर्फ कड़ी मेहनत और धैर्य से ही हासिल की जा सकती है। यही वजह हो सकती है कि एक घटना के जश्मदीद रहे मैथ्यू आईएएस बनने का सपना तो उसी वक्त से देखने लगे थे लेकिन कामयाब होने तक सिविल सेवा परीक्षा में उन्हे पांच अटैम्प्ट्स गुजरना पड़ा।


पुत्तिंगल टेम्पल के उस हादसे ने कोट्टायम (केरल) के रहने वाले जोसफ के. मैथ्यू के जीवन की दिशा ही बदल दी। उस घटना का उनके दिमाग पर गहरा असर हुआ। उस दिन जोसेफ ने प्रधानमंत्री की टीम में शामिल होने के लिए अपनी छुट्टी कैंसिल कर दी थी। तभी उन्हें जानकारी मिली कि पुत्तिंगल टेम्पल में लगी आग में 102 लोगों की मौत हो गई है। उस घटना के बाद जोसेफ को लगा कि सिविल सेवा का हिस्सा बनकर ही इस तरह की घटनाओं को रोका जा सकता है।





उसके बाद जोसेफ ने पहली बार 2012 में यूपीएससी की परीक्षा दी। सफल नहीं हो पाए। उससे पहले सरकारी मेडिकल कॉलेज से बैचलर की डिग्री हासिल करने वाले जोसेफ तो विदेश में नौकरी करने के भी सपने देखते रहते थे। उस वक्त मैथ्यू दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में नर्सिंग ऑफिसर थे। उन्हे यहां तक पहुंचाने में उनके माता-पिता का अहम योगदान था। जोसेफ की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी, पिता दिहाड़ी मजदूर और मां साधारण गृहिणी।


प्रतिभा किसी की मोहताज नहीं होती और न ही समय और परिस्थितियां उसके लिए बाधक बनती हैं। इस बात को मैथ्यू ने एम्स, दिल्ली में एक नर्सिंग ऑफिसर (मेल नर्स) रहते हुए सही साबित कर दिखाया। जोसफ बताते हैं कि एम्स में शिफ्ट में ड्यूटी होती है। रात के शिफ्ट में 12 घंटे की ड्यूटी करनी पड़ती है। ऐसे में पढने का समय तय कर पाना मुश्किल था। लिहाजा जब भी समय मिलता, वह पढ़ाई शुरू कर देते। इस तरह नौकरी से समय चुराकर वह प्रतिदिन औसतन चार से पांच घंटे पढ़ाई करते।


उस दौरान उनके साथियों और सीनियर्स को इस बात की जानकारी थी कि वह सिविल सर्विसेज की तैयारी कर रहे हैं, जिससे उन्हे सहकर्मियों का सहयोग भी मिलने लगा। चार बार उन्होंने सिविल सेवा की प्राथमिक परीक्षा तो पास कर ली लेकिन चयन नहीं हो सका। पांचवें प्रयास में वह साक्षात्कार तक पहुंच गए। उनका विषय मनोविज्ञान था। आखिरकार, रिजल्ट आया तो उन्हे अपनी पांचवीं कोशिश में 574वीं रैंक हासिल हो ही गया।





मैथ्यू बताते हैं कि नर्सिंग ऑफिसर बनने के बाद उन्होंने अपने पिता को शारीरिक काम करने से मना कर दिया था। अस्पताल में कभी शाम तो कभी सुबह उनकी शिफ्ट लगाई जाती थी। ऐसे में उन्हें पढ़ने का समय कम ही मिल पाता था। इसलिए वह शिफ्ट के हिसाब से पढ़ाई करने लगे। ड्यूटी के बीच-बीच में समय मिलने पर वह अपने नोट्स को रिवाइज भी करते रहते।


परीक्षा की तैयारी के लिए उन्होंने एक दिन भी अपनी पढ़ाई से ब्रेक नहीं लिया। ज्यादातर स्टडी मटेरियल ऑनलाइन मिलने से उन्हें काफी आसानी रहती थी। वह कहते हैं कि जनता के लिए सरकार की नीतियां बहुत ही अच्छी हैं लेकिन नीतियों का सही तरीके से जमीनी स्तर पर लागू नहीं किया जाता है। सरकारी कार्य करने के दौरान उनको यह देखने और समझने का मौका मिला है। उनके पिता की मेहनत और सहयोग का ही नतीजा रहा कि वह अपने आप को इस तरह से तैयार कर पाए। जोसफ की छोटी बहन भी नर्स हैं।