कभी अकाल पड़ने से मर गए थे लाखों लोग, हरित क्रांति ने बनाया आत्मनिर्भर, जानिए ये कैसे हुआ मुमकिन

By Anuj Maurya
August 14, 2022, Updated on : Fri Aug 26 2022 09:00:39 GMT+0000
कभी अकाल पड़ने से मर गए थे लाखों लोग, हरित क्रांति ने बनाया आत्मनिर्भर, जानिए ये कैसे हुआ मुमकिन
एक वो भी दौर था जब भारत में अकाल पड़ने की वजह से लाखों लोग मारे गए थे. लेकिन आज हम खेती में इतने समृद्ध हो चुके हैं कि अनाज का निर्यात तक करते हैं. हरित क्रांति की वजह से ही ये सब मुमकिन हो पाया.
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अभी देश आजादी का अमृत महोत्सव (Independence Day) मना रहा है, लेकिन अगर हरित क्रांति (Green Revolution) ना हुई होती तो शायद आज भी हम अन्न की कमी से जूझ रहे होते. 1947 में आजादी मिलने से पहले बंगाल में एक भीषण अकाल पड़ा था, जिसकी वजह से करीब 20 लाख लोग मारे गए थे. उसी वक्त हर किसी को ये बात समझ आ गई थी कि अब कृषि में कुछ अलग करना होगा, तभी खाद्यान्न की कमी से निपटा जा सकता है. इस समस्या को गहराई से समझा एमएस स्वामीनाथन (M. S. Swaminathan) ने और साथ ही इस समस्या का हल भी ढूंढ निकाला. तभी तो उन्हें भारत में हरित क्रांति का जनक कहा जाता है. आज भारत अनाज के मामले में बहुत आगे है. 2021-22 में भारत में 12.96 करोड़ टन चावल का उत्पादन हुआ, जबकि 10.64 करोड़ टन गेहूं का उत्पादन हुआ.

जानिए क्या हुआ था हरित क्रांति में

भारत में हरित क्रांति की शुरुआत एम एस स्वामीनाथन ने 1968 में की थी. वैसे तो इस पर काम कुछ साल पहले से ही शुरू हो गया था, लेकिन 1968 में इंदिरा गांधी ने हरित क्रांति की आधिकारिक घोषणा की थी. हरित क्रांति हमारे देश में उस वक्त मुमकिन नहीं हो पाती अगर नॉर्मन बोरलॉग ना होते. बोरलॉग ने मैक्सिको के प्रसिद्ध 'बौना गेहूं प्रजनन कार्यक्रम' की शुरुआत की थी. 1959 के दौरान स्वामीनाथन ने बोरलॉग से संपर्क किया और अर्ध बौने गेहूं के प्रजनन वाले बीज मांगे. इसके बाद 1963 में बोरलॉग भारत आए और यहां की खेती का निरीक्षण किया.


रबी के सीजन में बोरलॉग के बीजों का उत्तर भारत में कई जगहों पर टेस्ट भी किया गया और नतीजे हैरान करने वाले थे. पाया गया कि मैक्सिको मूल के अर्ध बौने गेहूं के बीज से प्रति हेक्टेयर करीब 4-5 टन पैदावार मिल रही है, जबकि भारतीय नस्ल से सिर्फ 2 टन तक ही पैदावार मिलती थी. जब 1964 में सी. सुब्रमण्यम देश के खाद्य और कृषि मंत्री बने तो उन्होंने ज्यादा पैदावार वाली किस्मों का खूब समर्थन किया. आखिरकार प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने इन बौने किस्म वाले बीजों के आयात की मंजूरी दी. नतीजा ये हुआ कि 1968 में किसानों ने करीब 170 लाख टन का रेकॉर्ड गेहूं उत्पादन कर के सबको हैरान कर दिया.

धान की खेती में 1950 के दशक में ही आने लगी थी क्रांति

1950 के दशक में वैज्ञानिकों ने भारत के देसी गेहूं-धान की किस्मों पर उर्वरकों का इस्तेमाल करना शुरू किया. टेस्टिंग में पाया गया कि उर्रवकों के इस्तेमाल से देसी गेहूं-धान की किस्म वाली फसलें नुकसान होने लगीं. जैसे ही उर्वरक डालते तो फसल गिर जाती. इसकी वजह यह थी कि उस समय जो किस्में बोई जाती थीं, उनका तना बेहद लंबा और पतला होता था. इतना ही नहीं, पौधे की बाली भी छोटी होती थी. वहीं बौनी किस्मों में तना मोटा और छोटा हो गया, साथ ही बाली बड़ी हो गई. यानी अब एक तो हर पौधे से उत्पादन अधिक होता था, ऊपर से पौधा गिरता नहीं था तो नुकसान भी बहुत कम हो गया. इसकी वजह से पैदावार में तगड़ी तेजी देखने को मिली.


उस दौरान धान की जापानी किस्म का इस्तेमाल शुरू हो चुका था, जो बौनी प्रजाति थी, जिससे पैदावार बढ़ने लगी थी. जापानी किस्म से किसान को प्रति हेक्टेयर धान की करीब 5 टन तक पैदावार मिलती थी, जबकि देसी किस्म में यह पैदावार सिर्फ 2 टन तक ही सीमित रह जाती थी. धीरे-धीरे समय बीतने के साथ-साथ मक्का, ज्वार, बाजरा आदि की भी संकर किस्में विकसित की गईं, जिससे किसानों की पैदावार बढ़ी.

हरित क्रांति से फायदे के साथ-साथ हुए ये नुकसान भी

जब देश में हरित क्रांति आई तो पैदावार बढ़ने से किसानों का मुनाफा तेजी से बढ़ा. हालांकि, इस बढ़ी पैदावार में बहुत बड़ी भूमिका रही उर्वरकों और रसायनों की. इन रसायनों और उर्वरकों ने जमीन में लगे पौधे को तो खूब मजूबत और अधिक पैदावार वाला बना दिया, लेकिन जमीन की ताकत कम कर दी. इन्हीं रसायनों और उर्वरकों के अधिक इस्तेमाल की वजह से आज के वक्त में उपजाऊ मिट्टी बहुत ही कम बची है. जमीन की उर्वरा शक्ति काफी हद तक कम हो गई है. हालात ये हो गए हैं कि अब फिर से ऑर्गेनिक और नेचुरल फार्मिंग को लेकर जागरूकता फैलाने की जरूरत पड़ गई है.