जब सुधा मूर्ति ने मन ही मन मनाया कि JRD टाटा को याद न आए पोस्टकार्ड वाला किस्सा

By Ritika Singh
August 19, 2022, Updated on : Fri Aug 19 2022 09:06:43 GMT+0000
जब सुधा मूर्ति ने मन ही मन मनाया कि JRD टाटा को याद न आए पोस्टकार्ड वाला किस्सा
टेल्को जॉइन करने के बाद सुधा मूर्ति को अहसास हुआ कि JRD टाटा वास्तव में किस शख्सियत का नाम है.
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इन्फोसिस फाउंडेशन (Infosys Foundation) की चेयरपर्सन सुधा मूर्ति (Sudha Murty) टाटा मोटर्स (पुराना नाम टेल्को) की पहली महिला इंजीनियर थीं. टेल्को में उनके जॉइन करने की कहानी बड़ी दिलचस्प रही और इस दिलचस्प कहानी की शुरुआत हुई थी, उनके द्वारा गुस्से में लिखे गए एक पोस्टकार्ड से. बाद में जब वह JRD टाटा (JRD Tata) से मिलीं तो यही पोस्टकार्ड एपिसोड, उनके नर्वस होने की वजह बन गया. लेकिन साथ ही उन्होंने जाना जेआरडी टाटा को, उनके प्रभावशाली और उदार व्यक्तित्व को...

पोस्टकार्ड एपिसोड...

1974 अप्रैल में सुधा मूर्ति ने JRD टाटा को एक लेटर लिखा था, बिना किसी कनेक्शन के. उस वक्त सुधा IISc बेंगलुरु से कंप्यूटर साइंस में मास्टर्स के फाइनल ईयर में थीं. IISc परिसर में उन्हें ऑटोमोबाइल कंपनी टेल्को [अब टाटा मोटर्स] में एक स्टैंडर्ड जॉब का विज्ञापन दिखा था, जिसमें कहा गया था कि कंपनी को युवा, होनहार, मेहनती और उत्कृष्ट शैक्षणिक पृष्ठभूमि वाले इंजीनियरों की जरूरत है. साथ ही एक और लाइन भी लिखी थी- 'महिला उम्मीदवारों को आवेदन करने की आवश्यकता नहीं है.' बस फिर क्या था सुधा ने इस भेदभाव के खिलाफ आवाज उठाने की सोची और गुस्से में सीधा टाटा ग्रुप के प्रमुख जेआरडी टाटा को लेटर लिख डाला. जेआरडी टाटा ने वह लेटर पढ़ा भी था और उसी के बाद सुधा मूर्ति के लिए Tata Motors के साथ जुड़ने का रास्ता खुला था.


इंटरव्यू के बाद सुधा ने डेवलपमेंट इंजीनियर के तौर पर पुणे में कंपनी को जॉइन किया. पुणे में ही सुधा मूर्ति की मुलाकात एनआर नारायण मूर्ति (N.R. Narayan Murthy) से हुई थी और फिर वह शादी के बाद सुधा कुलकर्णी से सुधा मूर्ति बन गईं. एनआर नारायण मूर्ति आईटी कंपनी इन्फोसिस (Infosys) के को-फाउंडर हैं.

जब पहली बार मिलीं JRD से..

टेल्को जॉइन करने के बाद सुधा मूर्ति को अहसास हुआ कि जेआरडी टाटा वास्तव में किस शख्सियत का नाम है. सुधा मूर्ति ने टेल्को जॉइन तो कर ली थी लेकिन काफी वक्त तक उन्हें टाटा समूह के चेयरमैन जेआरडी टाटा से मिलने का मौका नहीं मिला. फिर उनका मुंबई, (तत्कालीन नाम बंबई) में ट्रान्सफर हुआ. एक दिन सुधा को अपने चेयरमैन मूलगांवकर को कुछ रिपोर्ट दिखानी पड़ी. वह बॉम्बे हाउस (टाटा मुख्यालय) की पहली मंजिल पर उनके कार्यालय में थीं कि तभी अचानक जेआरडी टाटा अंदर आ गए. तब पहली बार सुधा मूर्ति ने ‘आपरो जेआरडी’ को देखा. आपरो का मतलब गुजराती में ‘हमारा’ होता है और यही वह स्नेहपूर्ण शब्द था, जिससे बॉम्बे हाउस के लोग जेआरडी को बुलाते थे. वहीं जेआरडी के करीबी उन्हें जेह नाम से भी बुलाते थे.


जेआरडी टाटा को सामने देखकर सुधा मूर्ति अपने पोस्टकार्ड एपिसोड को याद करते हुए बहुत नर्वस महसूस कर रही थीं. मूलगांवकर ने सुधा को इंट्रोड्यूस कराते हुए कहा, ‘जेह, यह युवती एक इंजीनियर है और वह भी स्नातकोत्तर है. यह टेल्को के शॉप फ्लोर पर काम करने वाली पहली महिला है.’ इसके बाद जेआरडी ने सुधा मूर्ति की ओर देखा और सुधा मूर्ति मन ही मन प्रार्थना कर रही थीं कि जेआरडी उनसे उनके इंटरव्यू या उसके पहले के पोस्टकार्ड एपिसोड के बारे में कोई सवाल न पूछें.


खैर, जेआरडी ने कुछ नहीं पूछा. उल्टा उन्होंने कहा, 'यह अच्छा है कि हमारे देश में लड़कियां इंजीनियरिंग कर रही हैं. वैसे, आपका नाम क्या है.’ जवाब में सुधा मूर्ति ने कहा, ‘जब मैंने टेल्को जॉइन की थी तो मैं सुधा कुलकर्णी थी, सर. अब मैं सुधा मूर्ति हूं.’ यह सुनकर जेआरडी मुस्कुराए और मूलगांवकर के साथ बात करने लगे. यह देखकर सुधा मूर्ति जल्दी से कमरे से बाहर चली गईं या यूं कहें कि लगभग कमरे से बाहर भाग गईं.

जब एक बार फिर हो गई मुलाकात..

इसके बाद एक बार फिर ऐसा मौका आया, जब सुधा मूर्ति ने मन ही मन प्रार्थना की कि जेआरडी को उनका पोस्टकार्ड एपिसोड याद न आ जाए. हुआ यूं था कि एक दिन सुधा मूर्ति अपने पति नारायण मूर्ति के लिए इंतजार कर रही थीं, जो ऑफिस खत्म होने के बाद उन्हें लेने आने वाले थे. तभी उन्होंने अचानक देखा कि जेआरडी भी उनकी बगल में खड़े हैं. सुधा को समझ नहीं आया कि क्या प्रतिक्रिया दें. तभी एक बार फिर उन्हें अपने पोस्टकार्ड एपिसोड को लेकर चिंता सताने लगी. फिर उन्होंने अपनी और जेआरडी की पिछली मुलाकात के बारे में सोचा और उन्हें अहसास हुआ कि जेआरडी इसके बारे में भूल चुके हैं. उनके लिए यह एक छोटी सी घटना रही होगी, लेकिन सुधा मूर्ति के लिए तो यह एक बड़ी बात थी.


तभी अचानक जेआरडी ने पास खड़ी सुधा मूर्ति से पूछा, ‘यंग लेडी, तुम यहां क्यों हो? ऑफिस का वक्त खत्म हो गया है.’ सुधा ने जवाब दिया, ‘सर, मैं अपने पति के आने का इंतजार कर रही हूं, जो मुझे लेने आने वाले हैं.’ इस पर जेआरडी ने कहा, ‘अंधेरा हो रहा है और कॉरिडोर में कोई नहीं है. मैं तुम्हारे साथ तुम्हारे पति के आने तक इंतजार करूंगा.’ जेआरडी की बात सुनकर सुधा मूर्ति घबरा गईं. सुधा को नारायण मूर्ति का इंतजार करने की आदत थी लेकिन जेआरडी के उनके साथ में इंतजार करने ने उन्हें बेहद असहज कर दिया था.


लेकिन उन्हें यह भी अहसास हुआ कि जेआरडी में इतने दिग्गज होने के बावजूद भी सुपीरियोरिटी जैसा कोई अंश नहीं था. वह देश के एक सम्मानित व्यक्ति थे, टाटा समूह के चेयरमैन थे लेकिन फिर भी एक साधारण कर्मचारी की खातिर इंतजार कर रहे थे. तभी नारायण मूर्ति आ गए. सुधा मूर्ति ने उन्हें देखा और जल्दी से जाने लगीं. तभी जेआरडी ने उन्हें बुलाया और कहा, ‘यंग लेडी, अपने पति से कहो कि वह अपनी पत्नी को फिर कभी इंतजार न करवाए.’

when-sudha-murty-first-time-met-jrd-tata-sudha-murty-and-the-postcard-episode-appro-jrd

जब टेल्को छोड़ी तो क्या कहा

सुधा मूर्ति ने 1982 में टेल्को को छोड़ा, जब उनके पति एनआर नारायण मूर्ति पुणे में इन्फोसिस की शुरुआत करने जा रहे थे. सुधा मूर्ति अपना फाइनल सेटलमेंट पूरा करने के बाद बॉम्बे हाउस की सीढ़ियों से नीचे आ रही थीं, तभी उन्होंने जेआरडी को आते देखा. वह सोच में डूबे हुए थे. सुधा उन्हें अलविदा कहना चाहती थीं, इसलिए रुक गईं. तभी जेआरडी ने भी उन्हें देखा और रुक गए. उन्होंने उन्होंने धीरे से कहा, ‘तो आप क्या कर रही हैं श्रीमती कुलकर्णी?’ जेआरडी हमेशा ऐसे ही सुधा मूर्ति को संबोधित करते थे. जवाब में सुधा ने कहा, ‘ सर, मैं टेल्को छोड़ रही हूं.’ जेआरडी के यह पूछने पर कि आप कहां जा रही हैं, सुधा ने बताया कि उनके पति इन्फोसिस नाम की कंपनी शुरू कर रहे हैं. इसलिए वह पुणे शिफ्ट हो रही हैं.


इस पर जेआरडी ने कहा, ‘ओह! और जब आप सफल होंगीं तो आप क्या करेंगी?’ इस पर सुधा ने कहा, ‘सर, मुझे नहीं पता कि हम सफल होंगे.’ तब जेआरडी टाटा ने उन्हें सलाह दी, ‘कभी भी झिझक के साथ शुरुआत न करें. हमेशा आत्मविश्वास से शुरुआत करें. जब आप सफल होते हैं तो आपको समाज को वापस देना चाहिए. समाज हमें बहुत कुछ देता है, हमें परस्पर आदान-प्रदान करना चाहिए. मैं तुम्हें शुभकामनाएं देता हूं.’


फिर जेआरडी सीढ़ियों से ऊपर चढ़ते चले गए और सुधा वहीं खड़ी थीं. वे पल एक सहस्राब्दी की तरह लग रहे थे. वह आखिरी बार था, जब सुधा मूर्ति ने जेआरडी टाटा को जीवित देखा था...


(यह अंश https://www.tata.com/ पर उपलब्ध साल 2019 में JRD Tata के लिए सुधा मूर्ति द्वारा लिखे गए एक लेख 'Appro JRD' से लिया गया है.)