एक्‍स-रे की खोज गलती से हुई थी, जिसने मेडिकल साइंस का इतिहास बदल दिया

By yourstory हिन्दी
November 08, 2022, Updated on : Tue Nov 08 2022 06:20:15 GMT+0000
एक्‍स-रे की खोज गलती से हुई थी, जिसने मेडिकल साइंस का इतिहास बदल दिया
रोएंटजेन ने पाया कि यह किरण मनुष्य के ऊतकों से भी गुजर सकती है, लेकिन हड्डियों और धातु की वस्तुओं से नहीं. यह एक क्रांतिकारी खोज थी.
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“दुनिया की सारी महान खोजें एक्‍सीडेंटल हैं. चाहे सेब का पेड़ से गिरना और गुरुत्‍वाकर्षण की खोज हो, आर्किमिडीज का सिद्धांत हो या एक्‍स-रे की खोज.”

- विलियम सेसिल डेंपियर “ए शॉर्ट हिस्‍ट्री ऑफ साइंस“


आज वर्ल्‍ड रेडियोग्राफी डे है. एक्‍सरे किरणों का पहली बार पता चले 127 साल बीत गए हैं और इन 127 सालों में गलती से हुई इस एक खोज ने मेडिकल साइंस समेत पूरी दुनिया के इतिहास को बदलने और नई दिशा देने में महत्‍वपूर्ण भूमिका निभाई है.


ये 1895 की बात है. 50 साल का के एक जर्मन मैकेनिकल इंजीनियर और फिजिसिस्‍ट डॉ. विलहेल्‍म रोएंटजेन अपनी प्रयोगशाला में बैठे रोज की तरह कुछ एक्‍सपेरीमेंट कर रहे थे. डॉ. विलहेल्‍म जर्मनी की वुएर्जबर्ग यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर थे. विलहेल्‍म के हाथों में एक कैथोड-रे ट्यूब (cathode-ray tube) थी. उस कैथोड-रे ट्यूब के साथ काम करते हुए रोएंटजेन को ट्यूब के पास टेबल पर क्रिस्टल की एक फ्लोरोसेंट चमक दिखाई दी.


रोएंटजेन जिस ट्यूब के साथ काम कर रहे थे, उसमें एक कांच का बल्ब था, जिसमें पॉजिटिव और निगेटिव इलेक्ट्रोड लगे हुए थे. ट्यूब में हवा नहीं थी और जब उन्‍होंने बिजली के साथ उस बल्‍ब को ऑन किया तो ट्यूब से एक फ्लोरोसेंट किरणें निकलीं. रोएंटजेन ने उस ट्यूब के एक सिरे पर मोटी दफ्ती जैसा काला कागज रख दिया और पाया कि वो किरणें उस मोटी दफ्ती को पार करके कुछ फीट दूर रखी चीजों पर पड़ रही थीं और एक हरे रंग की फ्लोरोसेंट चमक उत्‍पन्‍न कर रही थीं. 


उस दिन रोएंटजेन को दो बातें पता चलीं. उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि ट्यूब से जो किरणें निकल रही थीं, वो कोई सामान्‍य रौशनी की किरण नहीं थी. वो एक नई तरह की इलेक्‍ट्रोमैग्‍नेटिक किरण थी, जो किसी भी ठोस चीज को पार करके उसके दूसरी ओर निकल जाने और दूसरी ओर मौजूद वस्‍तु को प्रकाशित करने की क्षमता रखती थी. इस खोज से उत्‍साहित होकर उन्‍होंने उन किरणों के साथ और भी प्रयोग किए और पाया कि ये नई किरण अधिकाशं पदार्थों से होकर गुजर थी.


रोएंटजेन ने यह भी पाया कि यह किरण मनुष्यों के ऊतकों से भी गुजर सकती है, लेकिन हड्डियों और धातु की वस्तुओं से नहीं. यह एक क्रांतिकारी खोज थी. रोएंटजेन ने एक बॉक्‍स के आकार का रेडियोग्राफ तैयार किया और पहली फिल्‍म निकाली अपनी पत्‍नी बर्था के हाथों की. हालांकि यह देखना दिलचस्प है कि एक्स-रे का शुरुआती उपयोग चिकित्‍सा के लिए नहीं, बल्कि औद्योगिक उपयोग के लिए किया गया था. 


रोएंटजेन की इस खोज ने वैज्ञानिक हलकों में हचलल पैदा कर दी थी. दुनिया भर में वैज्ञानिक इस प्रयोग को दोहरा सकते थे, एक्‍स-रे किरणों का इस्‍तेमाल कर सकते थे क्‍योंकि कैथोड ट्यूब तो तब तक काफी पॉपुलर हो चुकी थी और हर जगह आसानी से उपलब्‍ध थी. अखबारों और पत्र-पत्रिकाओं में इन रहस्‍यमयी किरणों के बारे में तरह-तरह के लेख छपे, कुछ सच्‍चे, कुछ काल्‍पनिक. वैज्ञानिकों के लिए यह शोध का और आम जनता के लिए रहस्‍य और जिज्ञासा का विषय बन गया था.


रोएंटजेन ने अपना रिसर्च पेपर तैयार किया, जिसका नाम था "ऑन ए न्यू काइंड ऑफ रे" और इसे वुर्जबर्ग के फिजिकल मेडिकल इंस्टीट्यूट में जमा कर दिया. रोएंटजेन के इस प्रयोग को दोहराना मुश्किल नहीं था क्‍योंकि कैथोड ट्यूब तो हर यूनिवर्सिटी के फिजिक्‍स डिपार्टमेंट में मौजूद थी. बाद में इस उपकरण में धीरे-धीरे सुधार हुआ और अस्पतालों ने इसका प्रयोग चिकित्‍यकीय उद्देश्‍य से करना शुरू कर दिया. 

 

इस क्रांतिकारी खोज के लिए डॉ. विलहेल्‍म रोएंटजेन को वर्ष 1901 में नोबेल पुरस्‍कार से सम्‍मानित किया गया. यह फिजिक्‍स के लिए दिया गया पहला नोबेल पुरस्‍कार था.


1901 तक एक्‍सरे मशीन बन चुकी थी और अस्‍पतालों में बड़े पैमाने पर इसका प्रयोग आम हो गया था. 13 साल बाद 1914 में पहला विश्‍वयुद्ध शुरू हुआ, जो चार साल तक चलता रहा. इस जंग के समय यह एक्‍सरे मशीन वरदान साबित हुई. तब तक मैरी क्‍यूरी रेडियम की खोज की चुकी थीं और रेडियम की खोज ने एक्‍सरे मशीनों के जरिए मनुष्‍य के अंगों की फोटोग्राफिक प्‍लेट बनाने की प्रक्रिया आसान बना दी थी.


युद्ध के दौरान मैरी क्‍यूरी ने एक पोर्टेबल एक्‍स-रे गाड़ी तैयार की, जिसे कहीं भी आसानी से ट्रांसपोर्ट किया जा सकता था. इस मशीन ने युद्ध के समय तकरीबन 10 लाख लोगों की जान बचाने में मदद की.  


आज हम जो रेडियोग्राफिक मशीनें देखते हैं, वो बहुत बाद में कई सुधारों के बाद बनी मशीन है. शुरू-शुरू में रेडियोग्राफ कांच की फोटोग्राफिक प्लेटों पर बनाए गए थे. 1918 में जॉर्ज ईस्टमैन ने फिल्म के प्रयोग की शुरुआत की.


डिजिटल क्रांति ने रेडियोग्राफी की तस्‍वीर को बदलकर रख दिया. अब रेडियोग्राफिक इमेजेज डिजिटल कैमरे से कैप्‍टचर की जाती हैं और उसे डिजिटल फॉरमैट में ही सेव किया जाता है.


रेडियोग्राफी की खोज ने चिकित्‍सा विज्ञान की दुनिया में महान क्रांतिकारी बदलाव किए. अब इस मशीन के जरिए शरीर के भीतर की उन चीजों को देख पाना मुमकिन हो गया, जिन्‍हें आंखों से देख पाना मुमकिन नहीं था. एक्‍सरे के जरिए शरीर के भीतरी अंगों, फेफड़ों, हड्डियों आदि की संरचना को देखना और उनका अध्‍ययन करना आसान हो गया. हालांकि एक अत्‍याधुनिक रेडियोग्राफ को बनने में उसके बाद भी तकरीबन 30 साल लग गए. 1930 तक आते-आते रेडियोग्राफ पूरी दुनिया में फैल गए और मेडिकल क्लिनिक और अस्‍पताल में इसका प्रयोग किया जाने लगा.


इस क्रांतिकारी खोज को आज 127 साल हो चुके हैं. इन 127 सालों में विज्ञान बहुत आगे निकल चुका है, लेकिन रेडियोग्राफी की खोज, रेडियम की खोज, रेडियोएक्टिविटी की खोज विज्ञान की इस महान ऐतिहासिक यात्रा के उन पड़ावों की तरह है, जिससे होकर विज्ञान आज यहां तक पहुंचा है.  


Edited by Manisha Pandey