कुछ रंग फूलों में नहीं उभरे अभी

हिंदी के शीर्ष कवि-आलोचक एवं साहित्य आकदमी अध्यक्ष विश्वनाथ प्रसाद तिवारी के जन्मदिन पर विशेष... 

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'कुछ शब्द लिखे जाएँगे अभी, कुछ बच्चे पैदा होंगे अभी, कुछ सपने नींद में नहीं आए अभी, कुछ प्रेम कथाएँ शुरू नहीं हुईं अभी, कुछ रंग फूलों में नहीं उभरे अभी, कुछ किरणें धरती पर नहीं पहुँचीं अभी, असंभव नहीं कि रह जाए वही, जो नहीं है अभी।' ये शब्द हैं हिंदी के शीर्ष कवि-आलोचक एवं साहित्य आकदमी अध्यक्ष विश्वनाथ प्रसाद तिवारी के। आज उनका जन्मदिन है।

हिंदी के शीर्ष कवि-आलोचक एवं साहित्य आकदमी अध्यक्ष विश्वनाथ प्रसाद तिवारी। 

हिंदी के शीर्ष कवि-आलोचक एवं साहित्य आकदमी अध्यक्ष विश्वनाथ प्रसाद तिवारी। 


विश्वनाथ प्रसाद तिवारी की गिनती उन समकालीन कवियों में होती है, जिनके सृजन की सघनता अदभुत और व्यापक लोक-स्वीकार्य है। उनके साहित्य की गंभीर पड़ताल की जाए तो स्वाधीनता, स्त्री-मुक्ति और मृत्यु-बोध, उनके तीन प्रमुख शब्द-सरोकार हैं।

साहित्य की कोई विधा हो, कविता, निबंध, कहानी, संस्मरण, आलोचना, आचार्य विश्वनाथ प्रसाद तिवारी ऐसे सभी शब्दों के सहयात्री हैं। साहित्य अकादमी के अध्यक्ष बनने वाले वह हिन्दी के पहले साहित्यकार हैं। अकादमी की पत्रिका 'समकालीन भारतीय साहित्य' के अलावा वह रचना और आलोचना में हिंदी की विशिष्ट पत्रिका 'दस्तावेज' के भी संपादक हैं। हिंदी साहित्य में अनमोल सृजन के लिए उन्हें देश-विदेश के अनेक शिखर सम्मानों से समादृत किया जा चुका है। उनका रचनाकर्म देश और भाषा की सीमाएं तोड़ता है। हजारी प्रसाद द्विवेदी पर लिखी इनकी आलोचना पुस्तक का गुजराती और मराठी भाषाओं में अनुवाद हुआ है। इसके अलावा रूसी, नेपाली, अंग्रेजी, मलयालम, पंजाबी, मराठी, बांग्ला, गुजराती, तेलुगु, कन्नड़, तमिल, असमिया, उर्दू आदि भाषाओं में भी इनकी रचनाएं अनूदित हो चुकी हैं। संस्थापक संपादक के रूप में 1978 से प्रकाशित हो रही 'दस्तावेज' के ऐतिहासिक महत्व के दर्जनों संग्रहणीय विशेषांक पाठकों तक पहुंच चुके हैं। उनके शोध और आलोचना के 12 ग्रंथ, सात कविता संग्रह, चार यात्रा संस्मरण, तीन लेखक-संस्मरण, एक साक्षात्कार पुस्तक प्रकाशित हो चुकी है। उन्होंने हिन्दी के कवियों, आलोचकों पर केन्द्रित 16 अन्य पुस्तकों का सम्पादन किया है। उनकी डायरी 'दिनरैन' तथा आत्मकथा 'अस्ति और भवति' भी प्रकाशित हो चुकी है।

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विश्वनाथ प्रसाद तिवारी की गिनती उन समकालीन कवियों में होती है, जिनके सृजन की सघनता अदभुत और व्यापक लोक-स्वीकार्य है। उनके साहित्य की गंभीर पड़ताल की जाए तो स्वाधीनता, स्त्री-मुक्ति और मृत्यु-बोध, उनके तीन प्रमुख शब्द-सरोकार हैं। उनकी पूरी रचना-यात्रा इन तीन बिन्दुओं से रेखांकित होती है। उनमें भी स्त्री-अस्मिता की खोज उनके कविता सरोकारों में प्रथम है। उनकी कविताओं में स्त्री के लिए असीम स्थान है। उनकी दृष्टि में स्त्री के जितने विविध रूप हैं, वे सब सृष्टि के सृजन-संसार हैं। उनके कवि की समूची संरचना देशज और स्थानीयता के भाव-बोध के साथ रची-बसी है। वह देश के भोजपुरी अंचल से आते हैं, इसलिए उनके रचना-लोक में देशज भोजपुरी समाज की भी पर्याप्त उपस्थिति है। मनुष्यता उनकी कविताओं में कुछ इस तरह मुखर होती है-

बेहतर कविता लिखेगा वही,

जो बेहतर कवि होगा।

जिस समय वह लिख रहा होगा,

सबसे अच्छी कविता,

जरूर होगा उस समय वह

सबसे अच्छा आदमी।

जिस दुनिया में लिखी जाएँगी

बेहतर कविताएँ,

वही होगी बेहतर दुनिया,

शब्द और अर्थ नहीं है कविता

सबसे सुंदर सपना है,

सबसे अच्छे आदमी का।

उनकी एक अन्य चर्चित कविता है 'मनुष्यता का दुख', जिसमें जीवन-जगत का असीम सत्य समाया हुआ है, जिसके शब्द जीवन की सार्थकता और निर्थकता, दोनों से हमारा साक्षात्कार कराते हैं-

पहली बार नहीं देखा था इसे युद्ध में

इसकी कथा अनंत है

कोई नहीं कह सका इसे पूरी तरह

कोई नहीं लिख सका संपूर्ण

किसी भी धर्म में, किसी भी पोथी में

अंट नहीं सका यह पूरी तरह

हर रूप में कितने-कितने रूप

कितना-कितना बाहर

और कितना-कितना भीतर

क्या तुम देखने चले हो दुख?

नहीं जाना है किसी भविष्यवक्ता के पास

न अस्पताल, न शहर, न गांव, न जंगल

जहां तुम खड़े हो, देख सकते हो वहीं

पानी की तरह राह बनाता नीचे

और नीचे आग की तरह लपलपाता

समुद्र सा फुफकारता दुख

कोई पंथ कोई संघ, कोई हथियार नहीं

कोई राजा, कोई संसद, कोई इश्तिहार नहीं

तुम, हां-हां, तुम सिर्फ हथेली से उदह दो

तो चुल्लू-भर कम हो सकता है

मनुष्यता का दुख।

विश्वनाथ प्रसाद तिवारी के शब्दों में स्त्री अनंत जन्मों की कथा है। उसमें सृष्टि का कितना अशेष समाया हुआ है, कितने लिखित-अलिखित, पठित-अपठित अध्यायों में दर्ज है स्त्री, उसे संपूर्णता में कह पाना कठिन ही नहीं, असंभव है। कवि के शब्दों में एक स्त्री का आत्मकथ्य कुछ इस प्रकार प्रकट होता है-

मुझे याद है अपने अनंत जन्मों की कथा

पिता ने उपेक्षा की, सती हुई मैं

चक्र से कटे मेरे अंग-प्रत्यंग

जन्मदात्री मां ने अरण्य में छोड़ दिया असहाय

पक्षियों ने पाला, शकुंतला कहलाई

जिसने प्रेम किया, उसी ने इनकार किया पहचानने से।

सीता नाम पड़ा, धरती से निकली

समा गई अग्नि-परीक्षा की धरती में।

जन्मते ही फेंक दी गई आम्र-कुंज में

आम्रपाली कहलाई, सुंदरी थी

इसलिए पूरे नगर का हुआ मुझ पर अधिकार।

जली में वीरांगना, बिकी मैं वीरांगना

देवदासी द्रौपदी, कुलवधू नगरवधू

कितने-कितने मिले मुझे नाम-रूप

पृथ्वी, पवन, जल, अग्नि, गगन, मरु, पर्वत, वर

सबमें व्याप्त हे मेरी व्यथा।

मुझे याद है अपने अनंत जन्मों की कथा,

उसके दुख, दिख नहीं रहे थे उसके दुख

पर्दे पर जब वह तेल का प्रचार करती

उसके बाल बिना तूफान के लहराते थे

मसालों के प्रचार में महक उठती वह स्वयं

कैमरा उसकी आंखों को कभी झील में बदल देता

कभी अधरों को कोंपलों में

और हद तब हो जाती है, जब पैंटी का प्रचार करते

वह पैंटी से बाहर निकल दर्शकों से चिपक जाती

कुछ भी तो नहीं था उसकी काया पर

जिसमें छिपा सके वह अपना दुख

मैंने बुद्ध का महावाक्य पढ़ा था कि संसार दुखमय है

मैं देखना चाहता था उसके दुख

महीनों-महीनों उस परी को निहारते-निहारते

एकाएक मुझे लगा, क्या अपने दुख को

मेरे सुख में तब्दील कर देना ही नहीं है उसका दुख?

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