एक फैशन गली ऐसी, जहाँ मिलते हैं कस्टमाइज्ड जूते... सुजीत और शफीक़ का अनोखा स्टार्ट-अप

    By Shikha Chouhan
    May 18, 2016, Updated on : Thu Sep 05 2019 07:17:15 GMT+0000
    एक फैशन गली ऐसी, जहाँ मिलते हैं कस्टमाइज्ड जूते... सुजीत और शफीक़ का अनोखा स्टार्ट-अप
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    लेटेस्ट फैशन और ब्रांडेड कपडे...ये कुछ ऐसे पैमाने बन गये हैं जो हमारी लाइफस्टाइल, हमारे स्टेटस और हमारे सोशल सर्कल को परिभाषित करने लगे हैं. खासतौर पर मिडिल क्लास लोगों के लिए तो जैसे नामी ब्रांड्स की चीज़ों का इस्तेमाल करना उनकी सबसे बड़ी ज़रूरत बन गई है. भीड़ से अलग दिखने की चाह में आजकल की युवा पीढ़ी, कमाई का ज़्यादातर हिस्सा, महंगे ब्रांड्स पर खर्च करने में ज़रा भी नहीं हिचकिचाती. लेकिन कपड़ों पर मोटी रकम खर्च करने के बाद ब्रांडेड जूतों की शौपिंग में कुछ कंजूसी करनी ही पड़ती है. जो शौक़ीन होते हैं वो इसमें भी नहीं हिचकिचाते लेकिन ज़्यादातर जूतों के मामले में कंजूसी कर ही जाते हैं. जूतों का मामला थोडा है भी पेचीदा...स्टाइलिश और कम्फर्टटेबल जूते सस्ते नहीं होते. और जब आप सस्ता ढूंढने निकलते हैं तो फिर स्टाइल और कम्फर्ट से समझौता करना ही पड़ता है. सुजीत के आसपास भी ऐसे दोस्त थे जो कुछ अलग पहनने और अलग दिखने की कोशिशों में लगे रहते थे. अमेटी यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन करने के बाद सुजीत ने एक्सेंचर में बतौर बिज़नेस एनालिस्ट काम करना शुरू किया. एक दिन यूहीं ऑफिस में किसी के जूते चर्चा का विषय बन गये।


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    सुजीत कहते हैं, 

    "हम सब अपने रोज़मर्रा के काम में व्यस्त थे तभी कोई चिल्लाया..वाह..क्या शानदार जूते हैं. मैंने भी जाकर उन जूतों को देखा और उनकी क्रिएटिविटी से काफी इम्प्रेस हो गया. मैंने पता किया तो मालूम हुआ की मेरे एक दोस्त ने अपने जूतों पर कार्टून कैरक्टर्स बनवाने के लिए पूरे 4000 रुपये खर्च किये हैं. मैं पूरी रात सो नहीं पाया और उस दोस्त के बारे में सोचता रहा जिसे 40 रुपये खर्च करने का कोई मलाल नहीं था और उसके चेहरे की ख़ुशी देखने लायक थी. मैं पूरी रात इस कांसेप्ट के बारे में पढ़ता रहा और मेरी उत्सुकता और बढती गई।"

    सुजीत ने इस कांसेप्ट पर काम करना शुरू किया और उन्होंने ऐसे जूतों को अफोर्डबल बनाने के इरादे से लगभग 500 लोगों से बात की और सर्वे किया जिसमे परिवार के लोग और दूसरे दोस्त भी शामिल थे. सर्वे से जो बात निकलकर सामने आई वो ये थी की करीब 95 फीसदी लोगों ने पलक झपकते ही बता दिया कि उन्होंने कौन से ब्रांड के कपडे पहने हैं, लेकिन जब जूतों की बारी आई तो ज़्यादातर के पास कोई जवाब नहीं था और वो इसकी अलग-अलग वजह बताने लगे. सुजीत ने मिडिल क्लास उपभोक्ताओं पर फोकस किया जिनकी रूचि इंटरनेशनल ब्रांड्स के जूतों में तो रहती है लेकिन ज्यादा कीमत होने की वजह से वो इन्हें अफोर्ड नहीं कर पाते. दूसरी ओर देसी ब्रांड्स में उपभोक्ताओं के पास वही पूराने डीज़ाइन वाले जूतों को खरीदने के अलावा ज्यादा विकल्प नहीं हैं. ऐसे उपभोक्ता जूतों को बस ज़रूरत के लिए खरीदते हैं और किसी खास ब्रांड को ही खरीदने की उनकी ना तो मंशा होती है और ना शौक. सुजीत ने इसे ही आधार बनाकर शुरू किया...FGali जहाँ एफ का मतलब था फैशन।


    सुजीत

    सुजीत


    एक तरफ जहाँ सुजीत के मन में उठने वालों सवालों से शुरू हुआ एफगली वहीँ कोई और भी था जिसका मन सुजीत की ही तरह ठीक उन्ही सवालों के जवाब ढूंढ रहा था. आपको जानकर हैरानी होगी की दो अलग-अलग जगहों पर रहनेवाले दो अलग लोग एक ही बात सोच रहे थे लेकिन दोनों की ऐसा सोचने की बस वजहें अलग थीं. कॉलेज के दिनों से ही शफीक को भी हमेशा अच्छा पहनने और भीड़ से अलग दिखने का शौक था. शफीक पढाई पूरी करके एंड्रायड डेवलपर बन गये और अक्सर काम से ऊब जाने पर वो बीच-बीच में फेसबुक चेक कर लिया करते थे।

    शफीक के मुताबिक,

    एक दिन यूँ ही फेसबुक चेक करते हुए मैंने जूतों पर की गई कलाकारी देखी और उस आर्टिस्ट की क्रिएटिविटी से अचंभित रह गया. जब मैंने और जानकारी जुटाई तो पता चला कि मैं इन्हें नहीं अफोर्ड कर सकता. लेकिन ऐसे बहुत से थे जिन्हें इन जूतों के लिए ढाई हज़ार खर्च करने में कोई ऐतराज़ नहीं था और पेमेंट करने के बाद भी वो उन्हें पाने के लिए 15 दिन इंतज़ार कर सकते थे. मैंने ऑनलाइन भी आर्टिस्ट डीज़ाइनड जूते ढूंढे लेकिन ज्यादा विकल्प नहीं मिले. तभी मुझे लगा की मेरे जैसे और भी होंगे जो ऐसे जूतों के शौक़ीन होंगे और जिन्हें कम कीमत में ये जूते ऑनलाइन नहीं मिलते होंगे।


    शफीक

    शफीक


    डिमांड और सप्लाई के इसी अंतर के बारे में सोचते-सोचते शफीक़ को भी लगा कि अगर उत्पाद और उपभोक्ता के बीच की इस कड़ी को पूरा कर दिया जाये तो इसमें बिज़नेस के अच्छे अवसर मिलेंगे और उन्होंने शुरुआत की ‘यूत’ की. दो साल अलग-अलग काम करने के बाद शफीक और सुजीत को लगा कि एक जैसी सोच और एक जैसे काम को साथ करना चाहिए. साल 2014 में दोनों ने अपनी कम्पनीज को मर्ज कर दिया और Fgali नाम के साथ ही आगे बढ़ने का फैसला किया।


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    सुजीत बताते हैं..

    इंग्लिश के फैशन स्ट्रीट को ही हिंदी में हमने FGali कर दिया. वैसे भी फैशन, फुटवेयर, फंकी और फैन-आर्ट, ये सारे शब्द भी एफ से ही शुरू होते हैं. शुरू-शुरू में हमारी कोशिश थी की हम मुंबई के कलाकारों के ही डीज़ाइनड जूतों के लिए बाज़ार मुहैया करवाएं और पेमेंट और डिलीवरी के लिए अनुकूल माहौल तैयार करें. लेकिन अब हम जूते खुद बनाते हैं. हम एक खास जूते के आउटलाइन के आधार पर देशभर के कलाकारों से डीज़ाइन मंगवाते हैं. फिर उपभक्ताओं की मांग को ध्यान में रखकर सबसे अच्छे डीज़ाइन का चुनाव किया जाता है. उस आर्टिस्ट को पेमेंट के बाद हम उस ख़ास जूते को बनाते हैं. स्लिप-ऑन, लेस-अप से शुरू करते हुए आज हम बैलीज़, हील्स और वेजेस भी बनाते हैं।

    एक तरफ जहाँ शफीक को ऑनलाइन फुटवेयर ब्रांड का तजुर्बा था वहीँ सुजीत ने ऑफलाइन स्पेस में काम करते हुए FGali को कामयाब बनाने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी. आप FGali के जूते उनके स्टोर से खरीद सकते हैं या FGali.com से ऑनलाइन आर्डर भी कर सकते हैं. इसके अलावा अच्छी बात ये है की हर जूते के बॉक्स में उसे डीज़ाइन करने वाले आर्टिस्ट की आपको पूरी कहानी मिलेगी. सुजीत के मुताबिक उनके ब्रांड के माध्यम से कई कलाकारों को अपनी कला की अभिव्यक्ति का मौका मिल रहा है. सुजीत बताते हैं की एक ऐसी ही आर्टिस्ट थी जो जिंदगी में नाकामयाबी की वजह से डिप्रेशन में चली गई थी. लेकिन आज वो उनकी मुख्य डिज़ाइनर्स में से एक है और कला ने डिप्रेशन से निकलने में उनकी मदद की।

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    पेशे से स्टाइलिस्ट आकांक्षा भी FGali की टीम में शामिल हो गई हैं और वो उत्पादों की क्वालिटी, डीज़ाइन और अपग्रेडेशन का काम संभालती हैं. इससे पहले आकांक्षा कई बॉलीवुड हस्तियों के लिए बतौर स्टाइलिस्ट का काम कर चुकी हैं. FGali की टीम में अरशद भी हैं जो इससे पहले शॉपर स्टॉप और ग्रे जैसी कंपनीज़ के लिए काम कर चुके हैं. अपने दस साल के तजुर्बे के साथ अरशद डिजिटल मार्केटिंग का काम सँभालते हैं।

    सुजीत कहते हैं,

    शुरू शुरू में हमें भी बहुत सी मुश्किलों का सामना करना पड़ा. रिटेल या मैन्युफैक्चरिंग बैकग्राउंड नहीं होने की वजह से हमें मार्केट को समझने में काफी वक़्त लगा. उपभोक्ता की पसंद और गुणवत्ता को ध्यान में रखते हुए उत्पाद बनाना फिर इन्हें बेचने के लिए सही मर्चेनडाइज़र ढूँढना और आखिर में उसे उपभोक्ता के हाथों में पहुँचाना, इन सबमें बहुत सी दिक्कतें होती हैं. प्राइस और डीज़ाइन में कॉमपीट करते हुए एक अच्छा कॉनज्युमर बेस बनाना भी बेहद चुनौतीपूर्ण है और ये बहुत जल्दी ही हमारी समझ में आ गया था. लेकिन वाजिब दाम में अच्छे उत्पाद लोगों तक पहुँचाना ही हमारी यूएसपी है और हमें उम्मीद है की अच्छी क्वालिटी और वर्ड ऑफ़ माउथ मार्केटिंग के ज़रिये हम भविष्य में अपने ब्रांड्स के लिए लॉयल कस्टमर बेस बनाने में कामयाब होंगे. फिलहाल फंडिंग के लिए हमारी रिटेल और रियल एस्टेट दिग्गजों से बातचीत चल रही है।


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    एफगली का क्लोकिंग रेवेन्यू रेट फिलहाल 40 लाख है और ये हर महीने 15 फीसदी की दर से बढ़ रहा है. अगर भारतीय फुटवेयर बाज़ार पर नज़र डालें तो ये लगभग 38,700 करोड़ का है और सालाना 20 फीसदी की दर से बढ़ रहा है. ऐसे में एफगली को भविष्य से काफी उम्मीदें हैं. एफगली के जूते युवाओं, स्टाइलिस्ट, मॉडल्स, फैशन ब्लोगर्स और टीवी कलाकारों के बीच काफी लोकप्रिय है. FGali इससे पहले बौलीवुड क्रिकेट लीग में लखनऊ नवाब्स के लिए जूते डिज़ाइन कर चुका है. इसके अलावा बिग बॉस सीजन 8 और फैशन शोज़ में भी अपने जूतों की नुमाइश कर चुका है. FGali एक ऐसी जगह है जहाँ सिर्फ मनपसंद जूते नहीं बल्कि ऐसे जूते मिलते हैं जो सिर्फ आपके लिए ही बने हैं और आप जब चाहे इसे किसी अपने को उनके नाम या उनके पसंदीदा डिज़ाइन के साथ गिफ्ट कर सकते हैं।

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