एक प्रोफेसर ऐसे, जो 33 साल से ऐशो-आराम छोड़ जंगल में रहते हैं आदिवासियों की बेहतरी के लिए

By Ravi Verma
February 06, 2016, Updated on : Thu Sep 05 2019 07:18:13 GMT+0000
एक प्रोफेसर ऐसे, जो 33 साल से ऐशो-आराम छोड़ जंगल में रहते हैं आदिवासियों की बेहतरी के लिए
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दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ाते थे प्रोफेसर पी डी खेरा....

छले 33 सालों से बैगा आदिवासियों की सेवा में जुटे प्रोफेसर पी. डी. खेरा...

80 साल की उम्र में संरक्षित बैगा जनजाति के बच्चों को दे रहे हैं शिक्षा...

महिलाओं को दासता से मुक्त करने की पहल जारी...

अंधविश्वास,टोना टोटका के खिलाफ जागरुक करने की कोशिश...


छतीसगढ़ के बिलासपुर जिले के अचानकमार टाईगर रिजर्व के वनग्राम लमनी छपरवा में विनोबा भावे की तरह दिखने वाला एक शख्स जंगलों के बीच बनी झोपड़ी में पिछले 33 साल से रह रहा है. नाम है डा.प्रोफ़ेसर प्रभुदत्त खेरा. वे दिल्ली विश्वविद्यालय में 15 साल तक समाजशास्त्र पढ़ाते रहे हैं. सन 1983-84 में एक दोस्त की शादी में बिलासपुर आना हुआ. उसी के बाद जंगल घूमने गए . वहां एक आदिवासी बच्ची को फटी पुरानी फ़्राक में बदन छिपाते देखकर उन्हें कुछ ऐसी अनुभूति हुई कि सुई धागा लेकर उसकी फ़्राक सिलने बैठ गए. इस दौरान वे वहीं रेस्ट हाउस में रुककर वहां बसने वाले बैगा जनजाति के लोगों के रहन सहन को देखते समझते रहे. इन लोगों की हालत और सरकार की बेरुखी देखकर प्रो.खेरा का मन इतना व्यथित हुआ कि उन्होंने प्रोफ़ेसर की नौकरी छोड़ दी और दिल्ली का ऐशो आराम छोड़कर लमनी के जंगलों में ही आ बसे .

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अब पिछले 33 सालों से बैगा आदिवासियों की सेवा और उनका जीवन सुधार ही प्रो.पी.डी.खेरा के जीवन का उद्देश्य है. आज 80 साल की उम्र में वे संरक्षित बैगा जनजाति के बच्चों को शिक्षा दे रहे हैं, महिलाओं को दासता से मुक्त करने की पहल कर रहे हैं और अंधविश्वास,टोना टोटका से उन्हें दूर कर रहे हैं.

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1960 के दशक में प्रख्यात मानव शास्त्री एल्विन ने भी बैगा जनजाति पर शोध किया था, लेकिन प्रो.खेरा का कहना है कि उन्हें इन बैगाओं की नित नई समस्याओं से इतनी फ़ुर्सत ही नहीं मिलती कि वे कोई किताब लिख सकें. खेरा ने योरस्टोरी को बताया, 

"जब मैं इन लोगों के बीच आकर बसा तो लोगों और सरकार के नुमाइन्दों ने मुझे नक्सली समझ लिया और जांच तक करा डाली. बाद में मेरा सेवाभाव देखकर समझ में आया कि यह तो पागल प्रोफ़ेसर है जो अपना जीवन बर्बाद करने इन लोगों के बीच आया है"
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33 साल बाद खेरा की ही मेहनत से बैगा जनजाति के बच्चे 12 वीं तक पढ़ रहे हैं. युवा शहर जाकर रोज़गार तलाश रहे है और इनकी जीवनशैली में काफी बदलाव आया है.

प्रो.खेरा का कहना है, 

सरकार बैगाओं को संरक्षित जनजाति का दर्जा देकर भूल गई है और जितनी योजनाएं और घोषणाएं होती हैं उसके अनुसार काम नहीं होता.’
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इसे प्रो.खेरा के सेवा भाव का पागलपन कुछ ऐसा है कि वे अपनी पेंशन का अधिकांश हिस्सा इन बैगा बच्चों पर खर्च कर देते हैं. जंगल में झोपड़ी में रहने वाले,अपना सारा काम खुद करने वाले इस 80 साल के नौजवान को देखकर ऐसा लगता है जैसे गांधी जी कह रहे हों कि यही है उनके सपनों की सही तस्वीर. 


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