Brands
YSTV
Discover
Events
Newsletter
More

Follow Us

twitterfacebookinstagramyoutube
Yourstory

Brands

Resources

Stories

General

In-Depth

Announcement

Reports

News

Funding

Startup Sectors

Women in tech

Sportstech

Agritech

E-Commerce

Education

Lifestyle

Entertainment

Art & Culture

Travel & Leisure

Curtain Raiser

Wine and Food

Videos

ys-analytics
ADVERTISEMENT
Advertise with us

भीख नहीं किताबें दो

कॉलेज स्टूडेंट किरण रावत गरीब बच्चों को देती हैं फ्री ट्यूशन

भीख नहीं किताबें दो

Wednesday May 10, 2017 , 5 min Read

जिन दिनों मेरा जन्म हुआ उन दिनों दूरदर्शन पर उड़ान नाटक आता था, जो पहली आईपीएस ऑफिसर किरण बेदी के जीवन पर आधारित था। लोगों को जब मेरे नाम के बारे में पता चला, तो मेरा नाम एक मज़ाक का विषय बन गया। लोग कहते, 'आपकी बेटी का नाम किरण है, किरण रखने से कोई किरण बेदी थोडी बन जायेगी।' मां कहतीं, मेरी बेटी किरण बेदी बने या न बने, लेकिन उनके पद चिन्हों पर जरूर चलेगी। मां के उसी कहे को साकार करते हुए, मैंने किरण बेदी जी के पद चिन्हों पर चलते हुऐ समाज सेवा का रास्ता चुना और बन गई उम्मीदों की किरण...

image


अजमेर के आंचल में बसा एक छोटा सा गांव बंदिया में मोहन सिंह रावत और गुलाबी रावत के घर जन्मी मैं वो बेटी हूं, जो अपने दो भाईयों की छोटी बहन है। मैंने किरण बेदी के पद चिन्हों पर चलते हुऐ समाज सेवा का रास्ता चुना और मिशन किरण कैम्पेन चला के बनाई अपनी पहचान। मेरी उम्र अभी 19 साल है। मैं बीए सेकिंड ईयर की स्टूडेन्ट हूं, मेरे पापा मजदूरी करते हैं और समाज सेवा के संस्कार माँ से मिले हैं।

क्या है मिशन किरण?

मिशन किरण की शुरुवात साल 2014 में जम्मू कश्मीर में बाढ़ के दौरान हुई थी। अपने गाँव मे घर-घर घूम के जम्मू कश्मीर बाढ़ पीड़ितो के लिये सहायता राशि इकट्ठा की। उस सहायता राशि को भास्कर अॉफिस अजमेर में जमा करवाई। वो राशि मात्र 4631रूपये थी। उसी दौरान नवरात्री चल रहे थे, मैंने लोगो से अनुरोध किया, कि आप 10 रूपये नारियल के ना चढ़ा कर इस गुल्लक में डालें क्योंकि ये सीधा जम्मू कश्मीर वैष्णव देवी की भूमि पर जायेगा, जिसे आज हमारी जरूरत है।

मैंने अपने 18वें जन्मदिन पर अपने पापा के साथ अजमेर अस्पताल में नेत्रदान का संकल्प पत्र भर के एक मुहिम शुरू की। ये मुहिम थी उन अंधकार से भरी जिंदगी को रोशन करने की जो हम नेत्रदान के द्वारा कर सकते हैं। मैंने अपने 19वें जन्मदिन पर फेसबुक और व्हाट्सएप पर नेत्रदान का अनुरोध किया और फेसबुक के 13 लोगों ने मेरे नेत्रदान आवाह्न पर नेत्रदान का संकल्प पत्र भरा। मैं अभी तक 70 लोगों को नेत्रदान संकल्प दिलवा चुकी हूं और यही नहीं, मैं अपनी महीम के तहत लोगो को देहदान के लिये भी प्रेरित करती है। क्योंकि मेरा मानना है कि हमारी मृत्यु के बाद हमारे शरीर को नष्ट कर दिया जाता है, दूसरी ओर हमारा एक कदम हमारी एक सोच किसी को नया जीवन दे सकता है, तो हमे अंग दान करना चाहिए।

मिशन किरण का कपड़ा बैंक

मैं आपसे पूछती हूं, कि गरीबी की पहली पहचान क्या है? मेरे हिसाब से 'गरीबी की पहली पहचान कपड़ा है।' आप सोच कर देखें, कि हमारे घर पर किसी गरीब को खाना खिलाना है तो हम उसी बच्चे को पकड़ के लेकर आते हैं, जिसके कपड़े गंदे मैले और फटे हुए हों। ये होता है आंकलन जो हम करते है साधरणतः। तो हम कह सकते हैं, कि गरीबी की पहली पहचान कपड़ा ही है। आज भी आधा भारत भूखा और नंगा सड़कों पर घूमता है और हम बात करते हैं, चांद पर पहुंचने की।

जनवरी में मैंने फेसबुक पर एक पोस्ट लिखी थी, जिसमें लोगों से कहा था, "आपके जो कपड़े आपके दिलों से उतर चुके हैं, जिन्हें आप काम में नहीं लेते और वो आपके घर के किसी कोने में पड़े हुए हैं, क्यों ना उन्हें उन जरूरतमंदों को बाँटे जिनको दो जोड़ी कपड़ों की जरूरत है। क्यों न किसी का तन ढंकने के लिए घरों में बंद कपड़ों की पोटलियों को खोला जाये।" ये वही फेसबुक पोस्ट थी, जिससे कपड़ा बैंक की शुरुवात हुई। पहले ही दिन जोधपुर से कपड़े आये। अब तक ये मिशन अजमेर और आसपास के कई गाँवों में 80 हज़ार से ज्यादा कपड़े बांट चुका है और अभी भी सिलसिला जारी है। ये डोनर मेरे कुछ फेसबुक दोस्त, कुछ स्कूल के दिनों के दोस्त और कुछ कॉलेज के बच्चे हैं, जो अब अपने कपड़ों से अन्य लोगो के तन ढकने के लिये आगे आये हैं।

मेरी पाठशाला 'भीख नहीं किताबें दो'

मैंने अप्रैल 2016 में 'किरण की पाठशाला' की शुरुवात की। ये पाठ शाला 13 बच्चों के साथ शुरू हुई। इस पाठशाला में आज 70 बच्चे शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। ये बच्चे वो है जो बकरियां चराने, खेतो में काम करने वाले, किसी होटल पर काम करने वाले बाल मजदूर,ऐसे बच्चे जो अभी भी स्कूल की चौखट से दूर है, ऐसे बच्चे जो डेरे में रहते हैं और भीख मांगते है। इन बच्चों के अंधेरे में गुम होते मासूम बचपन और उनके बचपन को सुरक्षित करने के लिये मैंने इस पाठशाला की शुरुवात की। पाठशाला में बच्चो को शिक्षा के साथ उन्हें उनके अच्छे स्वास्थ्य, धर्म आध्यत्मिक शिक्षा, बेड टच गुड टच, उनकी कला, उनके हुनर को तराशा जा रहा है। सोच बदलो या ना बदलो पर खुद को बदलने की कोशिश जरूर करो।

मैं मिशन किरण के द्वारा शुद्ध शाकाहारी नशा मुक्ति अभियान भी चला रही हूं। लोगों को इस अभियान से जोड़ने के लिये सत्संग आयोजन किया जाता है। मेरी माँ गुलाबी रावत के द्वारा समय-समय पर रैली निकाली जाती है, बच्चों को शाकाहारी का पाठ पढ़ाया जाता है। मिशन किरण बेटी बचाओ अभियान पर भी काम कर रहा है, जो लड़कियां शिक्षा छोड़ चुकी हैं या जो कभी स्कूल नहीं गईं उन्हें फिर से शिक्षा से जोड़ा जा रहा है। मैं समय-समय पर ग्रामीण आंचल में बालिका शिक्षा और बेटीयों पर लोगो की सोच बदलने के लिये सभायें आयोजित करती हूं, जहां इस तरह की महिलाओं से बात की जाती है। अगर आज लड़कियों और महिलाओं की स्थिति अच्छी हो गयी है, तो मैं लोगों से बस ये सवाल करना चाहती हूं, कि फिर आज भी 21वीं सदी के भारत में कचरे के डिब्बे और नालियों में सिर्फ लड़कियां ही क्यों मिलती हैं, लड़के क्यों नहीं?

-धन्यवाद!

वंदे मातरम

'किरण रावत'


-ये पाठक द्वारा लिखी हुई स्टोरी है, जिसके लिए योरस्टोरी जिम्मेदार नहीं है।