पढ़ेगा इंडिया, तभी तो कुछ करेगा इंडिया

2nd Jul 2015
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टीच फॉर इंडिया से जुड़कर बच्चों का भविष्य बना रहे हैं अनूप पारिख...

पढ़ाने के साथ-साथ बच्चों में नैतिक मूल्यों की शिक्षा भी देना है जरूरी...

अमेरिका में लगी लगाई नौकरी छोड़ भारत के गरीब बच्चों को पढ़ाने का किया फैसला, बनाया जिंदगी का मिशन...


यह बात पूरी तरह सच है कि हर व्यक्ति की सोच व समझ दूसरे व्यक्ति से भिन्न होती है। तभी तो कई लोगों के लिए नौकरी केवल पैसे कमाने का एक जरिया मात्र होती है तो कई लोग नौकरी को केवल नौकरी नहीं समझते बल्कि अपना काम व अपनी जिम्मेदारी समझ कर करते हैं और उसमें पूरी तरह डूब जाते हैं। जो लोग केवल पैसे के लिए काम करते हैं उन्हें भले ही शुरूआत में सफलता जल्दी मिल जाए लेकिन वे अधिक समय तक एक ही स्थान पर टिक कर काम नहीं कर सकते। और जो लोग अपने काम को मिशन मानकर पूरी शिद्दत से करते हैं वे लोग अपने काम से सबका दिल जीत लेते हैं। ऐसे लोग अपने आस-पास के लोगों के लिए ही नहीं बल्कि समाज के लिए भी उदाहरण पेश करते हैं। ऐसे ही एक व्यक्ति हैं अनूप पारिख जोकि टीच फॉर इंडिया कार्यक्रम से जुड़कर मुंबई के गोविंदी इलाके में गरीब और झोंपड़ पट्टी में रहने वाले बच्चों को पढ़ा रहे हैं।

अनूप अमेरिका में बतौर अकादेमिक सलाहकार यानी काउंसलर के तौर पर काम कर रहे थे लेकिन एक बार वे अपने कुछ दोस्तों से मिले जोकि टीच फॉर इंडिया और टीच फॉर अमेरिका से जुड़े हुए थे, जब अनूप ने उनसे बात की तो वे काफी प्रभावित हुए और उनके मन में भी गरीब बच्चों को पढ़ाने की इच्छा जागृत हुई और उन्होंने तय किया कि वे भी इस मिशन से जुडेंग़े। उन्होंने भारत में गरीब बच्चों के लिए काम करने का मन बनाया। क्योंकि अनूप का पालन-पोषण भारत में ही हुआ था इसलिए अपने देश के लिए कुछ करने की भावना उनके अंदर प्रबल थी।

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उसके बाद अनूप भारत आ गए और सन 2010 में टीच फॉर इंडिया से फैलोशिप ली और मुंबई में ही गरीब बच्चों को पढ़ाने लगे। लेकिन राह आसान नहीं थी। यहां कई दिक्कतें थीं। यहां के स्कूल व्यवस्थित नहीं थे। ऐसे स्थान पर पढ़ाना बहुत ज्यादा मुश्किल था। कई दिक्कतें थीं जिनका सामना रोज़ करना पड़ रहा था। शुरु में कुछ समय तक तो वे समझ ही नहीं पा रहे थे कि क्या वे बच्चों को पढ़ा पाएंगे? लेकिन धीरे-धीरे वे इस माहौल में रमने लगे। उन्होंने बच्चों के साथ दोस्ती की और पढ़ाई को बहुत रुचिकर बनाकर बच्चों के सामने पेश किया। वे चाहते थे कि बच्चे पढ़ाई को मज़े से करें पढ़ाई को बोझ न समझें। धीरे-धीरे बच्चे भी उनसे जुडऩे लगे और एक शिक्षक नहीं बल्कि अपने बड़े भाई की तरह उन्हें सम्मान देने लगे। इसका नतीजा यह रहा कि बच्चों का रिजल्ट बहुत अच्छा आया।

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अनूप बताते हैं कि वे विदेश में काफी पैसा कमा सकते थे लेकिन उन्हें उतना ही पैसा चाहिए जितने पैसे से उनकी जरूरतें पूरी हो जाए ऐशो आराम वाली जिंदगी से ज्यादा वे साधारण जीवन जीने को अहमियत देते हैं साथ ही उन्हें इस काम से संतुष्टि व सुकून मिलता है इसलिए टीच फॉर इंडिया की फैलोशिप के बाद जहां कुछ लोग चले जाते हैं लेकिन वे कहीं नहीं गए और टीच फॉर इंडिया से जुड़कर गरीब बच्चों को पढ़ा रहे हैं।

अनूप मानते हैं कि 

"हर बच्चे में टेलेंट होता है बल्कि गरीब बच्चों ने तो जिंदगी को बहुत करीब से देखा होता है। वे जानते हैं कि उनके माता पिता किस तरह एक-एक पैसा कमाते हैं। लेकिन कई बार टैलेंट और अनुभव होने के बावजूद खुद को जल्दी गरीबी से निकालने की कोशिश में बच्चे गलत राह भी पकड़ लेते हैं जो काफी दुखदायी होता है।" 

और बतौर टीचर अनूप बच्चों को सही मार्गदर्शन देना अपना नैतिक कर्तव्य मानते हैं।

गरीब बच्चों को हर पड़ाव पर दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। सरकार ने भी बच्चों के लिए कई योजनाएं बनाई हैं लेकिन वे जमीन पर नहीं उतर पातीं और जो चीजें आसानी से हो सकती हैं सरकार उन पर ध्यान नहीं देती, जोकि चिंता का विषय है। इसलिए जरूरी है कि हर कोई मिलकर इस ओर प्रयास करे। अनूप बताते हैं कि जब वे बच्चों को पढ़ाते हैं तो वे भी बच्चों से काफी कुछ सीख रहे होते हैं। बच्चों के जिज्ञासा भरे प्रश्नों का उत्तर देने के लिए उन्हें भी हमेशा तैयार रहना होता है।

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