87 साल की शीला घोष ने भीख मांगना अस्वीकार कर शुरू किया फ्राइज़ बेचने का बिजनेस

By yourstory हिन्दी
September 01, 2017, Updated on : Thu Sep 05 2019 07:16:30 GMT+0000
87 साल की शीला घोष ने भीख मांगना अस्वीकार कर शुरू किया फ्राइज़ बेचने का बिजनेस
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जिंदादिली किसे कहते हैं ये कोई प. बंगाल की शीला घोष से सीखे। आत्म सम्मान क्या होता है, इसे जानने के लिए शीला घोष के जीवन से और बेहतर उदाहरण क्या हो सकता है। 

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परिवार को चलाने की जिम्मेदारी शीला ने अपनी पूरी तरह से झुक चुकी कमर पर उठा ली है। ज्यादातर लोग 60 या 65 साल की उम्र में रिटायर होने के बाद आरामदायक जीवन जीते हैं लेकिन शीला ने उम्र को कभी काम में रोड़ा नहीं बनने दिया और आज भी लगातार काम कर रही हैं।

परिस्थितियां ऐसी थीं कि वे चाहती तो भीख मांग लेतीं लेकिन उन्होंने मेहनत करना चुना, जिसके चलते वे लोगों के सम्मान योग्य बन गईं। वे कहती हैं कि मैंने तय किया था कि जब तक जिंदा हूं सड़क पर भीख नहीं मांगूगी। 

जिंदादिली किसे कहते हैं ये कोई प. बंगाल की शीला घोष से सीखे। आत्म सम्मान क्या होता है, इसे जानने के लिए शीला घोष के जीवन से और बेहतर उदाहरण क्या हो सकता है। शीला घोष, 87 साल की एक बुजुर्ग महिला। जिनके पति, एक बेटा, एक बेटी सब परिवार छोड़ कर चले गए। घर में बहू है, एक मेंटल डिसेबल्ड बेटी और एक पोता। अपने इस चार के परिवार को चलाने की जिम्मेदारी शीला ने अपनी पूरी तरह से झुक चुकी कमर पर उठा ली है। ज्यादातर लोग 60 या 65 साल की उम्र में रिटायर होने के बाद आरामदायक जीवन जीते हैं लेकिन शीला ने उम्र को कभी काम में रोड़ा नहीं बनने दिया और आज भी लगातार काम कर रही हैं।

शीला एक मध्यमवर्गीय घर में पैदा हुई थीं। उनके मां-बाप ने उनकी शादी 14 साल की उम्र में ही कर दी थी। शीला को नदीं में छपाक करना, तैरना बड़ा पसंद था। वो जामुन के पेड़ पर सर्र से चढ़ जाती थीं। फिर घंटों-घंटो भर नीचे नहीं आती थीं। उनकी मां फिर उन्हें भूतों का डर दिखाकर नीचे लाती थीं। लेकिन ससुराल पहुंचते ही शीला की सारी मस्तियों पर रोक लगा दी गई। ससुराल का माहौल बड़ा ही सख्त था। यहां तो उन्हें खिड़की से बाहर देखने पर भी डांट पड़ती थी। शीला के पति रेलवे में थे, उनका जगह जगप तबादला होता रहता था। शीला इसी बहाने खूब घूमती थीं। लेकिन पति की मौत के बाद उनका ये सफर भी रुक गया।

मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा-

शीला चाहती थीं कि वो अपने बच्चों को बिना लड़के-लड़की का भेदभाव किए शिक्षा दिलवाएं। लेकिन उनकी बड़ी बेटी जल्द ही गुजर गई। एक बेटी की दिमागी हालत ठीक नहीं थी तो शीला ने अपने बेटे की शिक्षा पर पूरा ध्यान दिया। उनका बेटा भी रेलवे में नौकरी करने लगा। सब ठीक चल रहा था लेकिन 30 की उम्र लगते-लगते उस फेफड़े का कैंसर हो गया। वो बेड पर आ गया। उसका वेतन रोक दिया गया। घर में पैसों की कमी फिर आन पड़ी। उनका बेटा 15 साल तक बेड पर रहा। इन सालों में शीला किसी तरह परिवार चलाया और बेटे का इलाज करवाया लेकिन 42 की उम्र में उनका बेटा भी भगवान को प्यारा हो गया।

लेकिन शीला ने हार नहीं मानी-

शीला ने अपनी बहू के साथ मिलकर मोमबत्तियां बनाकर बेचना शुरू किया लेकिन मोम बड़ा मंहगा पड़ता था। फिर एक दिन उनके पोते ने भाजा तलकर बेचने का आइडिया दिया। शीला को ये बात बहुत पसंद आई। तब से शुरू हुआ भाजा बेचने का वो सफर अनवरत जारी है। वो बेहद ही अथक काम करती हैं और काम को जल्दी खत्म कर अपने परिवार से मिलने के लिए घर दौड़ी चली जाती हैं क्योंकि अब ये ही इनके जीवन की रोशनी हैं। शीला ने गरीबी के चलते भीख का सहारा नहीं लिया बल्कि उन्होंने कोलकाता में बंगाली भाजा बेचने शुरू किये । जहां शीला बंगाली भाजा बेचती हैं वहां से उनका घर करीब दो घंटे की दूरी पर है जहां से शीला रोज अपडाउन करती हैं।

पाली से कोलकाता के बीच वैसे दूरी ज़्यादा तो नही है पर 87 साल की बुजुर्ग के लिए यह एक लम्बा सफर ही है, खासतौर पर अगर उसके साथ सामान बेचने की टोकरी हो, तो यह सफर उसके लिए और भी मुश्किल हो जाता है। इनके हाथ भाजा बनाते नहीं थकते और न ही इनकी आंखें उनको तलते हुए बहती है, इनके पैर भी इतनी दूर चलने के बाद नहीं थकते। इतनी बूढ़ी होने के बाद भी उनका मानना है कि वह बिलकुल स्वस्थ हैं और परिवार को पाल सकती हैं। शीला इस समाज के लिए एक बेहतरीन उदारहण है जो नई इबारत लिख रही हैं ।

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शीला की जिंदादिली को सलाम-

जो लोग इनके नजदीक से गुजरते हैं, वे फ्राइज इसलिए नहीं खरीदते क्योंकि उन्हें पसंद है, बल्कि इसलिए कि उन्हें इस वृद्धा की मेहनतकश जिजीविषा पर गर्व होता है और वे मदद करना चाहते हैं। जब शीला से पूछा जाता है कि वे थक जाती होंगी, तो वे सिर्फ हंस देती हैं और कहती हैं कि उनकी सेहत खराब नहीं है। शीला भाजा बेचकर दिनभर में तकरीबन 1200 रुपए तक कमा लेती हैं, लेकिन ये अभी भी उनके चार लोगों के परिवार के लिए कम पड़ता है।

परिस्थितियां ऐसी थीं कि वे चाहती तो भीख मांग लेतीं लेकिन उन्होंने मेहनत करना चुना, जिसके चलते वे लोगों के सम्मान योग्य बन गईं। वे कहती हैं कि मैंने तय किया था कि जब तक जिंदा हूं सड़क पर भीख नहीं मांगूगी। शीला की उम्र और उनके सम्मान को देखते हुए स्थानीय लोग उन्हें तब याद करते हैं, जब कोई झगड़ा या विवादित मसला होता है। वे जाती हैं और बातचीत से मामला सुलझा देती हैं। ये एक और कारण है कि लोग उनकी इज्जत ज्यादा करते हैं।

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