'नमस्ते' हमारी संस्कृति भी, डिप्लोमेसी भी

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भले नाथू ला पर ‘नमस्ते डिप्लोमेसी’ के साथ पीपुल्स लिबरेशन आर्मी के सैनिकों के साथ सीतारमण की बातचीत ने डोकलाम गतिरोध के बाद द्विपक्षीय संबंध सुधारने के लिए चीनी रणनीतिकारों को एक ‘गुडविल संदेश’ दिया हो, प्रश्न उठता है कि हिंदी को लेकर आज भी हमारे देश की राजनीति कितनी गंभीर, कितनी विनम्र है। तो क्या, आज 'नमस्ते' सिर्फ एक डिप्लोमेटिक शब्द भर होकर रह गया है!

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'नमस्ते' हमारी भारतीय संस्कृति में श्रेष्ठताबोधक अभिवादन का पर्याय भी है और आधुनिक राजनीतिक जीवन में सुसभ्य डिप्लोमेसी का प्रतीक भी। जनवरी 2015 में अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा सपत्नीक भारत आए तो महात्मा गांधी की समाधि पर श्रद्धांजलि देने राजघाट के लिए निकलते समय उन्होंने दोनो हाथ जोड़ कर 'नमस्ते' किया।

प्रस्थान करते समय प्लेन में सवार होने से पहले भी उन्होंने भारत को 'नमस्ते' किया। रक्षा मंत्री का पद संभालने के बाद पहली बार सिक्किम की नाथू ला सीमा पर पहुंची रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण ने चीनी सैनिकों को हाथ जोड़कर 'नमस्ते' किया।

नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे त्वया हिन्दुभूमे सुखं वर्धितोहम् ।

महामङ्गले पुण्यभूमे त्वदर्थे पतत्वेष कायो नमस्ते नमस्ते ।।

प्रभो शक्तिमन् हिन्दुराष्ट्राङ्गभूता इमे सादरं त्वां नमामो वयम्

त्वदीयाय कार्याय बध्दा कटीयं शुभामाशिषं देहि तत्पूर्तये ।

अजय्यां च विश्वस्य देहीश शक्तिं सुशीलं जगद्येन नम्रं भवेत्

श्रुतं चैव यत्कण्टकाकीर्ण मार्गं स्वयं स्वीकृतं नः सुगं कारयेत् ।।२।।

समुत्कर्षनिःश्रेयसस्यैकमुग्रं परं साधनं नाम वीरव्रतम्

तदन्तः स्फुरत्वक्षया ध्येयनिष्ठा हृदन्तः प्रजागर्तु तीव्रानिशम् ।

विजेत्री च नः संहता कार्यशक्तिर् विधायास्य धर्मस्य संरक्षणम् ।

परं वैभवं नेतुमेतत् स्वराष्ट्रं समर्था भवत्वाशिषा ते भृशम् ।।३।।

'नमस्ते' हमारी भारतीय संस्कृति में श्रेष्ठताबोधक अभिवादन का पर्याय भी है और आधुनिक राजनीतिक जीवन में सुसभ्य डिप्लोमेसी का प्रतीक भी। जनवरी 2015 में अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा सपत्नीक भारत आए तो महात्मा गांधी की समाधि पर श्रद्धांजलि देने राजघाट के लिए निकलते समय उन्होंने दोनो हाथ जोड़ कर 'नमस्ते' किया। प्रस्थान करते समय प्लेन में सवार होने से पहले भी उन्होंने भारत को 'नमस्ते' किया। रक्षा मंत्री का पद संभालने के बाद पहली बार सिक्किम की नाथू ला सीमा पर पहुंची रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण ने चीनी सैनिकों को हाथ जोड़कर 'नमस्ते' किया। यह तो रही राजनीतिक द्विअर्थी अभिवादन की बात। 

एक बार स्वामी विवेकानंद विदेश गए। वहाँ उनके स्वागत के लिए पहुंचे लोगों ने जब उनकी तरफ मिलाने के लिए अपने हाथ बढ़ाए और इंग्लिश में 'HELLO' कहा तो प्रत्याभिवादन में उन्होंने अपने दोनों हाथ जोड़कर 'नमस्ते' कहा। उस समय स्वागतार्थियों को लगा कि स्वामी जी को अंग्रेजी नहीं आती है। उन्होंने हिंदी में कहा- 'आप कैसे हैं?' तब स्वामी जी ने कहा- 'आई एम् फ़ाईन, थैंक यू.' तब उन्हे बड़ा आश्चर्य हुआ। उन्होंने स्वामी जी से पूछा- 'जब हमने आपसे इंग्लिश में बात की तो आपने हिंदी में उत्तर दिया और जब हमने हिंदी में पूछा तो आपने इंग्लिश में कहा, इसका क्या कारण है?' स्वामी जी ने कहा- 'जब आप अपनी माँ का सम्मान कर रहे थे, तब मैं अपनी माँ का सम्मान कर रहा था और जब आपने मेरी माँ का सम्मान किया, तब मैंने आपकी माँ का सम्मान किया।'

उस वक्त विवेकानंद ने यह भी कहा था - 'यदि किसी भी भाई बहन को इंग्लिश बोलना या लिखना नहीं आता है तो उन्हें किसी के भी सामने शर्मिंदा होने की जरुरत नहीं है बल्कि शर्मिंदा तो उन्हें होना चाहिए जिन्हें हिंदी नहीं आती है क्योंकि हिंदी ही हमारी राष्ट्र भाषा है। हमें तो इस बात पर गर्व होना चाहिए की हमें हिंदी आती है। क्या आपने किसी देश को देखा है जहाँ सरकारी काम उनकी राष्ट्र भाषा को छोड़ कर किसी अन्य भाषा या इंग्लिश में होता हो। यहाँ तक कि जो भी विदेशी मंत्री या व्यापारी हमारे देश में आते हैं, वह अपनी ही भाषा में काम करते हैं या भाषण देते हैं, फिर उनके अनुवादक हमें हमारी भाषा या इंग्लिश में अनुवाद करके समझाते हैं। जब वह अपनी भाषा-संस्कृति नहीं छोड़ते तो हमें अपनी राष्ट्र भाषा को छोड़कर इंग्लिश में बात करने, काम करने की क्या जरूरत है।' 

'नमस्ते' बहाने स्वामी विवेकानंद ने सिर्फ अभिवादन बोध ही नहीं कराया था, बल्कि इस बात के लिए भी भारतीयों को आगाह किया था कि 'निज भाषा उन्नति अहै।' बताया था कि हमारी मातृभूमि, हमारी भाषा, हमारी संस्कृति, सब हमारी आस्था के केंद्र हैं। इन्हें हमे अपने जीवन में, अपने आचार-विचार और व्यवहार में भी अविकल रूप से साझा करते रहना चाहिए। भले नाथू ला पर ‘नमस्ते डिप्लोमेसी’ के साथ पीपुल्स लिबरेशन आर्मी के सैनिकों के साथ सीतारमण की बातचीत ने डोकलाम गतिरोध के बाद द्विपक्षीय संबंध सुधारने के लिए चीनी रणनीतिकारों को एक ‘गुडविल संदेश’ दिया हो, प्रश्न उठता है कि हिंदी को लेकर आज भी हमारे देश की राजनीति कितनी गंभीर, कितनी विनम्र है। तो क्या, आज 'नमस्ते' सिर्फ एक डिप्लोमेटिक शब्द भर होकर रह गया है!

अभिवादन के सभी प्रकारों में 'नमस्कार' अथवा 'नमस्ते को भारती संस्कृति सर्वाधिक सात्विक अभिवादन की विधि मानती है और जहां तक संभव हो, व्यवहार में लाने की इसकी अनुशंसा करती है। 'नमस्ते' शब्द अब विश्वव्यापी हो गया है। विश्व के अधिकांश स्थानों पर इसका अर्थ और तात्पर्य समझा जाता है और हम हों या प्रवासी, इसका प्रयोग भी करते हैं। फैशन के तौर पर भी कई जगह 'नमस्ते' बोलने का रिवाज है। यद्यपि पश्चिम में 'नमस्ते' भावमुद्रा के संयोजन में बोला जाता है, लेकिन भारत में माना जाता है कि भावमुद्रा का अर्थ नमस्ते ही है और इसलिए, इस शब्द का बोलना इतना आवश्यक नहीं माना जाता है। 

जापानी तरीके की तरह बिना स्पर्श के, झुक कर हाथ को लहराकर, अभिवादन करना, लोकप्रिय तरीका होने के बावजूद, आध्यात्मिक दृष्टि से यह अभिवादन अन्य सभी तरीकों से भिन्न है। संस्कृत व्याकरण की दृष्टि से 'नमस्ते' शब्द की व्युत्पत्ति इस प्रकार है- नमस्ते= नमः+ते। अर्थात् तुम्हारे लिए प्रणाम। संस्कृत में प्रणाम या आदर के लिए 'नमः' अव्यय प्रयुक्त होता है, जैसे- "सूर्याय नमः" (सूर्य के लिए प्रणाम है)। इसी प्रकार यहाँ- "तुम्हारे लिए प्रणाम है", के लिए युष्मद् (तुम) की चतुर्थी विभक्ति का प्रयोग होता है। वैसे "तुम्हारे लिए" के लिए संस्कृत का सामान्य प्रयोग "तुभ्यं" है, परन्तु उसी का वैकल्पिक, संक्षिप्त रूप "ते" भी बहुत प्रयुक्त होता है, यहाँ वही प्रयुक्त हुआ है।

संस्कत विद्वान बताते हैं कि ‘नमस्ते’ और ‘नमस्कार’ शब्द पर्याय होते हुए भी उन दोनों के बीच एक आध्यात्मिक अंतर है। नमस्कार शब्द नमस्ते से अधिक सात्विक है। नमस्कार अर्थात दूसरों में दैवी रूप को देखना, यह आध्यात्मिक शक्ति को बढ़ाता है और दैवी चेतना (चैतन्य) को आकर्षित करता है। यदि नमस्कार अथवा नमस्ते ऐसी आध्यात्मिक भाव से किया जाये कि हम सामने वाले व्यक्ति की आत्मा को नमस्कार कर रहे हैं, यह हममें कृतज्ञता और समर्पण की भावना जागृत करता है। यह आध्यात्मिक विकास में सहायता करता है। नमस्कार अथवा नमस्ते करते समय यदि हम ऐसा विचार रखते हैं कि “आप हमसे श्रेष्ठ हैं, मैं आपका अधीनस्त हूँ, मुझे कुछ भी ज्ञान नहीं और आप सर्वज्ञ हैं”, यह अहंकार को कम करने और विनम्रता को बढ़ाने में सहायक होता है।

 नमस्ते या नमस्कार मुख्यतः हिन्दुओं और भारतीयों द्वारा एक दूसरे से मिलने पर अभिवादन और विनम्रता प्रदर्शित करने के लिए प्रयुक्त होता है। इस भाव का अर्थ है कि सभी मनुष्यों के हृदय में एक दैवीय चेतना और प्रकाश है जो अनाहत चक्र (हृदय चक्र) में स्थित है। यह शब्द संस्कृत के नमस शब्द से निकला है। इस भावमुद्रा का अर्थ है, एक आत्मा का दूसरी आत्मा से आभार प्रकट करना। दैनन्दिन जीवन में नमस्ते शब्द का प्रयोग किसी से मिलने हैं या विदा लेते समय शुभकामनाएं प्रदर्शित करने या अभिवादन करने के लिए किया जाता है। हम नमस्ते या नमस्कार के अतिरिक्त प्रणाम शब्द का भी प्रयोग करते हैं।

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