म़जबूत लोकतंत्र के लिए मीडिया का उत्तरदायित्व महत्पूर्ण

    ''एक वक्त था जब स्वयं प्रधानमंत्री को भी नहीं बख्शा जाता था। सबसे शक्तिशाली मंत्री की कड़ी से कड़ी आलोचना के बाद भी एक पत्रकार आराम से सो सकता था और अगले दिन अपनी नौकरी या गरिमा खोने के डर के बिना अपने ऑफिस आ जाता था, लेकिन अब ऐसा नहीं दिखता, चारों और दहशत का माहौल है। मैं इसे खासतौर पर बोलने की आज़ादी और आमतौर पर लोकतंत्र का विषाक्तीकरण कहूँगा।''

    18th Oct 2016
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    आज़ादी पाने के वर्षों के संघर्ष के बाद भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में ‘आपातकाल’ सबसे काला पन्ना था। तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गाँधी के द्वारा उस समय राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर देश के नागरिकों के मौलिक अधिकारों का हनन किया गया था। विपक्ष के अस्तित्व को बेहद क्रूरता से नकार दिया गया था और प्रेस की आज़ादी को पूर्णविराम लगा दिया गया था। विपक्ष के सभी प्रमुख नेताओं को हिरासत में ले लिया गया था। जनता पार्टी के आन्दोलन के बाद शाह कमीशन की रिपोर्ट के अनुसार कुल मिलाकर 34988 लोगों को मीसा के कठोर अधिनियम के अंतर्गत तथा 75818 लोगों को डिफेन्स ऑफ़ इंडिया नियमों के अंतर्गत जेल में डाल दिया गया था।

    आपातकाल के दौरान, प्रेस की आज़ादी एक सबसे बड़ी दुर्घटना थी। प्रेस, जिसे विपक्ष की अनुपस्थिति में विपक्ष की भूमिका निभानी चाहिए थी, कुछेक को छोड़कर सबको दरकिनार कर दिया गया था। उस समय के सूचना एवं प्रसारण मंत्री श्री एल के आडवाणी ने प्रेस के आचरण पर एक भविष्यवाणी की थी। उन्होंने कहा था, “प्रेस को झुकने के लिए कहा गया, और वह रेंगने लगी।” आज जब मैं प्रेस को देखता हूँ तो मुझे आडवाणी जी के वह शब्द बहुत याद आते हैं, लेकिन इसमें एक बहुत बड़ा फर्क है। आज, कोई आपातकाल नहीं है, मौलिक अधिकारों का हनन नहीं किया जा रहा, विपक्ष हिरासत में नहीं है और प्रेस की आज़ादी बरकरार है, लेकिन आज के मीडिया को देखते हुए उसके आचरण पर एक गंभीर प्रश्न ज़रूर उठ रहा है। मीडिया के एक बड़े हिस्से ने अपना ज़मीर खो दिया है और वे सभी लोग जडवत पत्रकारों की तरह व्यवहार कर रहे हैं।

    यह अत्यधिक आश्चर्यजनक है, क्योंकि आज की दुनिया अधिक स्वच्छंद है। खबरों का प्रसार तुरंत किया जाता है। मीडिया की पहुँच इतनी व्यापक कभी नहीं थी। उसके दर्शक और श्रोता वैश्विक स्तर पर हैं और कोई भी व्यक्ति पत्रकार या खबरी बन सकता है। 1975 में कोई टीवी नहीं था, लेकिन आज, अखबारों के आलावा 800 से अधिक चेनल्स हैं, जो केवल भारतीय मूल के हैं। एक वक्त था जब राष्ट्रीय दैनिक अखबारों के ही बहुत सीमित संस्करण हुआ करते थे, लेकिन अब हर राष्ट्रीय दैनिक देश के हर नुक्कड़ और हर गली तक पहुँचने की कोशिश कर रहा है। दैनिक भास्कर जैसे अखबार के 50 से अधिक संस्करण छापे जाते हैं। भारत के हर शहर और हर गलियारे की अपनी खुद की पत्रिका छपती है।

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    और उसके बाद सबसे बड़ा धमाका कर रही है – सोशल मीडिया। तकनीकी हस्तक्षेप ने एक नया आयाम खड़ा किया है, जो किसी भी सम्पादक की पहुँच से बहुत दूर है। आज, सोशल मीडिया का रिपोर्टर ही एडिटर या संपादक है। और खबरों के चुनाव को लेकर उस पर कोई प्रतिबन्ध नहीं है और ना ही उसे न्यूज़ रूम की और से कोई दिशा निर्देश दिए जाते हैं। अत: यह औपचारिक प्रेस के लिए एक खुली चुनौती है कि वह सोशल मीडिया पत्रकारिता नामक इस प्राणी की गति के बराबर चलता रहे। जिसे सिर्फ ‘प्रेस’ नहीं कहा जा सकता और जो अनौपचारिक होने के साथ-साथ आज़ाद भी है।

    खबरों की इस नई प्रतिस्थिति में भारतीय मीडिया को, खासतौर पर टीवी पत्रकारिता को, एक नई व्याकरण की रचना करनी है। पिछले कुछ वर्षों में टीवी की खबरें न ही उतनी उदासीन हैं और न ही पहले की तरह तटस्थ है, जैसा कि उत्कृष्ट पत्रकारिता के गुरुओं के द्वारा निर्धारित की गयी थी। खबरों के प्रसारण का प्राचीन तरीका अब बेहद उबाऊ, विनम्र और ऊर्जा विहीन हो गया है। आधुनिक खबरों का एक खुद का दृष्टिकोण होना बहुत ज़रूरी है। जबकि प्राचीन पत्रकारिता के विचार संपादक की सोच या ओपिनियन पोल पर आधारित होते थे। टी आर पी की चूहा दौड़ ने तथ्यों की लगातार विवेचना करने के प्रमुख सिद्धांत को अनदेखा कर दिया है। नई पत्रकारिता का नया मंत्र है – स्पीड यानि गति। कोई भी खबर केवल कुछ पलों तक ही जीवित रहती है। हर पल में एक नई खबर होनी चाहिए। यहाँ एक विरोधाभास भी है। यह अक्सर देखा गया है कि लोगों का ध्यान आकर्षित करने के लिए किसी ख़ास खबर को, जिसमें दर्शकों की अधिक रूचि की सम्भावना होती है, इतनी बार दिखाया जाता है कि वह अपना मूल स्वरुप और उद्देश्य खो देती है।

    एक समय में फिर भी एक आम राय हुआ करती थी। टीवी अधिक धर्म निरपेक्ष, आधुनिक, उदार और जनतांत्रिक था। इस आम सहमति ने कभी भी साम्प्रदायिकता का समर्थन नहीं किया, ना ही इसने कभी कट्टरपंथी विचारधारा को पनपने दिया। इसने हमेशा मतभेद का सम्मान किया, असहमति पर विचार किया, विचारशील तथ्य के लिए संघर्ष किया तथा हिंसक विचारों का विरोध किया। यह आम सहमति कहीं न कहीं ‘लेफ्ट’ के उपदेशों से प्रेरित थी। वही आम सहमति हाल ही के समय में खंडित होती पाई गयी। अब उद्गम हुआ है ‘राईट’ के संभाषण का।

    ‘राईट’ होने में कुछ भी गलत नहीं है। अमेरिका और यूरोप जैसे विकसित लोकतन्त्रों में एक बहुत मज़बूत ‘राईट विचारधारा’ है, लेकिन भारत में यह एक नई घटना है। लेफ्टिज़म की तरह राईटिज़म का कोई संरचित दृष्टिकोण नहीं है। यह अधिकतर आरएसएस की विचारधारा द्वारा निर्देशित है। यह ‘संभाषण’ धर्म निरपेक्षता को खुली चुनौती देता है। भावनाओं के प्रति आकर्षित होते हुए भी इस समय यह देशभक्ति को परिभाषित कर रहा है। किसी भी बहस या पृथक विचार को देशद्रोही करार दिया जाता है। और यही किसी तर्कसंगत या साधारण सोच या फिर खुली बहस के अवसर का हनन कर रहा है। आज सिर्फ दिखावे की शक्ति हुकूमत कर रही है। टीवी स्टूडियो काल्पनिक युद्ध के मैदानों में बदल गए हैं, जहाँ हर पल हर एक को देश के प्रति अपने प्रेम का दिखावा करना पड़ रहा है।

    लेकिन यह एक बहुत बड़े खतरे की परछाई है – पक्षपात पूर्ण होने की प्रवृत्ति बहुमत को प्रोत्साहित कर रही है। वह अल्पसंख्यकों के विचारों की हत्या करके अपने जूनून को नई ऊंचाईयों पर ले जा रही है, जो भारत जैसे विविध समाज के लिए बहुत घातक है। यह अभिव्यक्ति के मौलिक अधिकार को ख़त्म कर रही है। सरकार के मत को पवित्र माना जा रहा है बुद्धिजीवी नेताओं का तिरस्कार किया जा रहा है। एक वक्त था जब स्वयं प्रधानमंत्री को भी नहीं बख्शा जाता था। सबसे शक्तिशाली मंत्री की कड़ी से कड़ी आलोचना के बाद भी एक पत्रकार आराम से सो सकता था और अगले दिन अपनी नौकरी या गरिमा खोने के डर के बिना अपने ऑफिस आ जाता था, लेकिन अब ऐसा नहीं दिखता, चारों और दहशत का माहौल है। मैं इसे खासतौर पर बोलने की आज़ादी और आमतौर पर लोकतंत्र का विषाक्तीकरण कहूँगा।

    मैं यह नहीं कहता कि पत्रकारिता पर कोई खतरा है, बल्कि मैं यह कहूँगा कि आज टीवी स्टूडियोज ने एक नया संकट खड़ा कर दिया है। यह संकट अंतरात्मा पर है। यह बोलने की आज़ादी के हर आधार पर हमला कर रहा है। अगर सत्ता के दबाव के कारण सभी संपादक और पत्रकार पत्रकारिता के मूल उद्देश्यों को छोड़कर अपनी तनख्वाह की अधिक परवाह करते रहेंगे, तो यह सचमुच बेहद गंभीर अवस्था है। सौभाग्य से, अखबार अभी तक अधिक जीवंत हैं। डिजिटल पत्रकारिता नए आयाम छु रही है। टीवी अधिक शक्तिशाली है, लेकिन वह नागरिकों की नज़र में अपना सम्मान खो रहा है। पत्रकारों के लिए केवल उनकी साख ही उनका धन है। टीवी में यह स्थान लुप्त होता जा रहा है। कुछ न्यूज़ पोर्टल निर्भीक पत्रकारिता को अपनी आवाज़ दे रहे हैं । उन्होंने नए क्षितिज को स्पर्श किया है। सेलेब्रिटी एंकर्स को समझना चाहिए कि भविष्य वहीँ है, और उनके मालिकों को भी श्री अटल बिहारी वाजपयी जी के वर्षों पुराने कथन को समझना चाहिए –

    “प्रजातंत्र 51 और 49 का खेल नहीं है। प्रजातंत्र असल में एक नैतिक सिस्टम है। संसद नियमों और अधिनियमों का एक कोर्ट रूम मात्र नहीं है, वहां शब्दों को काटा जाता है। संविधान और नियम महत्वपूर्ण है, लेकिन अगर प्रजातंत्र को केवल एक संरचना या एक पद्धति बनाया जायेगा, तो वह अपना मूल अस्तित्व खो देगा और यह एक समस्या है। यह न होने देना हमारी ज़िम्मेदारी है। “

    ( वेबसाइट संपादकीय का लेखक के विचारों से सहमत होना अनिवार्य नहीं है।)

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