क्या है शिव खेड़ा की किताब 'You Can Win' में जिसने बना दिया उन्हें भारत का सबसे फ़ेमस सक्सेस गुरु

By Prerna Bhardwaj
June 23, 2022, Updated on : Fri Jun 24 2022 09:08:13 GMT+0000
क्या है शिव खेड़ा की किताब 'You Can Win' में जिसने बना दिया उन्हें भारत का सबसे फ़ेमस सक्सेस गुरु
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"जीतने वाले कोई 

      अलग काम नहीं करते,

 वे हर काम  

     अलग ढंग से करते हैं."


यह वाक्य जैसे ही कहीं आपके कानों को सुनाई पड़ता है, आपको एकाएक आभास होता है कि आप यह वाक्य पहले भी कभी सुन चुके हैं. किताब के कवर पेज पर लिखा ये वाक्य इस किताब का सूत्र-वाक्य है. किताब का नाम है 'यू कैन विन' (You Can Win) और इस किताब के लेखक हैं शिव खेड़ा (Shiv Kheda). मूल किताब अंग्रेज़ी भाषा में है. इसका हिंदी अनुवाद 'जीत आपकी' शीर्षक से प्रकाशित है. यह उन थोड़ी-सी भारतीय किताबों में शामिल है जो इंटरनेशनल बेस्टसेलर का दर्जा पा चुकी हैं. किताब का कवर पेज बताता है कि इस पुस्तक की 38 लाख से ज़्यादा कॉपियाँ 21 भाषाओं में अनूदित होकर बिक चुकी हैं. यह तथ्य निश्चित रूप से इस पुस्तक की लोकप्रियता एवं उसके उपयोगी होने की बात की तस्दीक़ करता है.


इस किताब के लेखक की बात करें तो शिव खेड़ा एक प्रसिद्ध लेखक होने के साथ-साथ एक सफल उद्यमी, एक मोटिवेशनल स्पीकर एवं शिक्षक के तौर पर भी जाने जाते हैं. यूँ तो उन्होंने कई पुस्तकों की रचना की है पर उनमें सर्वप्रमुख, सर्वाधिक प्रसिद्ध, इस इंटरनेशनल बेस्टसेलर किताब का अलग ही स्थान है. 

लेकिन क्या है इस किताब के भीतर? क्या बात है जो दुनिया भर में इतनी बड़ी संख्या में लोगों को यह किताब अपने लिए उपयोगी लगी?  मोटिवेशन और लाइफ स्किल पर फ़ोकस इस किताब का कंटेंट देखकर पता चलता है कि शायद इसका सबसे बड़ा कारण तो लेखक का स्वयं का बेहद समृद्ध जीवन-अनुभव है. लेखक ने एक साथ महान हस्तियों व आम व्यक्तियों और उसके साथ-साथ अपनी व्यापक दृष्टि और अनुभवों का हवाला देकर पुस्तक को प्रामाणिक एवं रोचक बनाने का शानदार एवं सफ़ल प्रयास किया है.


इस किताब में कुल ग्यारह अध्याय है जो हमें अलग-अलग तरीक़ों से प्रभावित करते हैं. हमारी सोच को प्रभावित करते हैं. किताब का मूल उद्देश्य व्यक्ति के दृष्टिकोण में आमूल-चूल परिवर्तन लाना है. यह किताब न सिर्फ़ मानव-स्वभाव के दो दृष्टिकोणों - सकारात्मक एवं नकारात्मक - के बीच के अंतर को स्पष्ट रूप से परिभाषित करती है बल्कि ख़ुद के भीतर पॉज़िटिव एटीट्यूड को विकसित करने के व्यावहारिक एवं कारगर उपाय भी सुझाती है. असल में देखें तो सारा मामला जीवन एवं उसकी चुनौतियों को लेकर किसी व्यक्ति के दृष्टिकोण का ही होता है. हम बाहरी दुनिया को प्रायः ही अपने अनुरूप नहीं ढाल पाते. वह हमारे हाथ मे नहीं होती. ऐसी स्थिति में क्या किया जाय? एक चीज़ हमारे हाथ में होती है. और वह एक चीज़ यह है कि जीवन की चुनौतियों एवं परिस्थितियों को लेकर जो हमारे अपने अंदर की दिमाग़ी दुनिया है, जो हमारा दृष्टिकोण है, हम उसे बदलने के लिए प्रयासरत हो सकते हैं. दृष्टिकोण बदलते ही बाहरी दुनिया भी उसी अनुरूप बदल जाती है. कुछ रोज़ पहले किसी व्यक्ति को जो बात समस्या लगती थी, अब वही बात कुछ नई सीख देकर जाने वाली चुनौती लगने लगती है. किसी परिस्थिति विशेष के संदर्भ में 'समस्या' से 'चुनौती' तक का यह सफ़र जीवन के प्रति बदले हुए दृष्टिकोण का ही परिणाम है. इसीलिए शायद किताब के पहले अध्याय का नाम ही 'दृष्टिकोण का महत्व' है. 


दूसरा अध्याय सकारात्मक नज़रिए को विकसित करने के नुस्ख़ों के बारे में है. तीसरा अध्याय सफलता प्राप्त करने के तरीक़ों के बारे में बात करता है वहीं चौथा अध्याय असफलता की ओर धकेलने वाले खतरों के प्रति पाठक को आग़ाह करता है. आगे के तीन अध्याय क्रमवार प्रेरणा, आत्मसम्मान एवं आपसी मेलजोल के महत्च को लेकर के हैं. व्यक्तित्व-विकास को लेकर जहाँ सकारात्मक दृष्टिकोण सबसे पहली ज़रूरत है वहीं आगे की ये बातें इस लक्ष्य तक जाने के लिए एक सीढ़ी का काम करती हैं. लेखक द्वारा अध्यायों का ऐसा सिलसिले-वार चयन पुस्तक को और अर्थवत्ता प्रदान करता है. पुस्तक के आख़िरी अध्याय आदतों, अपने उद्देश्य के लिए लक्ष्य बनाने के बारे में ज़ोर देते हैं. पुस्तक का आख़िरी अध्याय लक्ष्य-प्राप्ति की नैतिकता पर बल देता है. इस प्रकार आख़िर तक आते यह किताब कार्य के प्रति व्यक्ति को एक आवश्यक नैतिक जवाबदेही से भर देती है. तब यह किताब सफलता-प्राप्ति के फ़ॉर्मूलों की किताब भर नहीं रह जाती है. यह बात इस किताब के बारे में एक और उल्लेखनीय बात कही जा सकती है.


किताब के बीच-बीच में लेखक ने महान हस्तियों के कथनों का वाजिब इस्तेमाल किया है. इस से किताब की रोचकता बढ़ी है और यह किताब पाठक को आरंभ से लेकर अपने अंत तक बाँधे रहती है.


इस किताब को पढ़ते हुए एक बात विशेष तौर पर ध्यान रखी  जानी चाहिए. यह किताब सरपट पढ़ी जाने वाली किताब नहीं है. इस को ठहर कर, इससे नोट्स लेकर और फिर उस पर सोचने-विचारने से ही इस किताब का पूरा-पूरा फ़ायदा उठाया जा सकता है.

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