अरुणा आसफ़ अली, आज़ादी के आन्दोलन की वो शख़्सियत जिन्हें ‘1942 की रानी झांसी’ भी कहा जाता है

By Prerna Bhardwaj
August 09, 2022, Updated on : Fri Aug 26 2022 09:16:05 GMT+0000
अरुणा आसफ़ अली, आज़ादी के आन्दोलन की वो शख़्सियत जिन्हें ‘1942 की रानी झांसी’ भी कहा जाता है
आज़ादी की लड़ाई में अग्रिम भूमिका निभाने वाली, विभिन्न सम्मानों से सम्मानित, विशिष्ट व्यक्तित्व की धनी यह महिला आजीवन अपने पति के साथ एक कमरे के फ्लैट में रहीं, सार्वजनिक परिवहनों में सफ़र किया.
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”दिल्ली जो एक शहर था आलम में इंतिख़ाब.” हाँ, वही दिल्ली जहां मीर-ओ-ग़ालिब का पता मिलता है, जहां की वज़ादारी और मुहब्बतें मशहूर हैं, उसी दिल्ली के दिल दरियागंज के पास आसफ़ अली रोड है, और वहां से लगभग 16 किलोमीटर की दूरी पर वसंत विहार के पास अरुणा आसफ़ अली मार्ग है. दिल्ली की ये दोनों सड़कें आपस में तो नहीं मिलतीं, पर ये दोनों लोग, जिनके नाम पर ये सड़कें हैं, भारत के स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय भूमिका निभाने वाले कॉमरेड्स थे जो निजी रिश्ते में पति-पत्नी भी थे. आसफ़ अली राष्ट्रीय कांग्रेस के वरिष्ठ नेता थे, जिन्होंने असेम्बली बम काण्ड में गिरफ्तार हुए भगत सिंह का केस भी लड़ा था. अरुणा आसफ़ अली वह महिला थीं जिन्होंने मुंबई में (तब बॉम्बे) आज के दिन, 9 अगस्त 1942, वहां के गोवालिया टैंक मैदान में भारत का तिरंगा फहराकर ‘भारत छोड़ो’ आन्दोलन का आग़ाज़ किया था.


8 अगस्त 1942 को कांग्रेस वर्किंग कमेटी ने अपने बॉम्बे अधिवेशन में ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो’ की प्रस्तावना पारित की थी. इस अधिवेशन में अरुणा और आसफ़ दोनों ने हिस्सा लिया था. प्रस्तावना पारित होते ही अगले दिन, यानी 9 अगस्त की सुबह अंग्रेजों ने कांग्रेस के बड़े नेताओं, गाँधी, पटेल, नेहरु इत्यादि को गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया था. ऐसी परिस्थिति में अरुणा ने आन्दोलन की कमान संभालते हुए गोवलिया टैंक मैदान में भारत का तिरंगा फहराकर न केवल आन्दोलन की अध्यक्षता की बल्कि अंग्रेजी दमन के खिलाफ भारतीयों की मंशा भी साफ़ कर दी.


मंशा थी: भारतीयों को अब “पूर्ण स्वराज” से कम कुछ भी मंज़ूर न होगा.


ज़ाहिर है, तिरंगा फहराए जाने के बाद पुलिस ने वहां इकत्रित हुई जनता को तितर-बितर करने के लिए उनपर लाठी-चार्ज करना शुरू कर दिया. अपनी सूझ-बूझ का परिचय देते हुए अरुणा आसफ़ अली वहीं से आम जनमानस को क्रांति का सन्देश दिया, ताकि पुलिस दमन से घबराकर वह अपनी लड़ाई कमज़ोर न मान लेंऔर अपनी गिरफ्तारी देने के बदले भूमिगत हो गयीं. यह निर्णय एक मंझे हुए नेता का ही हो सकता है. अरुणा ने फैसला लिया कि वो क्रांति के लिए बनी हैं, कारावास के लिए नहीं. जब देश आंदोलित था, गाँधी और नेहरु जेल में थे तब उन्होंने अपनी गिरफ्तारी न देकर भूमिगत रहकर अपने अन्य साथियों के साथ आन्दोलन का नेतृत्व करना ज्यादा जरूरी समझा. दैनिक ‘ट्रिब्यून’ ने अरुणा आसफ़ अली की साहसी भूमिगत मोर्चाबंदी के लिए उन्हें ‘1942 की रानी झांसी’ की संज्ञा भी दी थी.


हालांकि इसके पहले कई बार अरुणा को गिरफ्तार किया जा चूका था. 1 930 में ‘नमक सत्याग्रह’ के दौरान अंग्रेज़ों ने उन्हें एक साल की कैद दी थी. 1932 में भी उन्हें एक साल के लिए तिहाड़ में कैद रखा गया. उन्हें अम्बाला की जेल में एकांत कारावास की सज़ा भी मिली थी.


बड़े नेताओं को जेल में बंद किया जाना, कांग्रेस को गैरकानूनी संस्था घोषित कर देना, शहर और गांवों के स्थानीय नेताओं की गिरफ्तारी, जैसे रास्ते अंग्रेज़ आन्दोलन का दमन करना चाहते थे. देश में उस वक़्त कोई स्थिर नेतृत्व न होने के बावजूद देश भर में अंग्रेजों के खिलाफ कड़े विरोध प्रदर्शन होते रहे, जो यह स्पष्ट कर रह थे कि अब भारतवासियों को गुलाम बना कर नहीं रखा जा सकता.


अरुणा के भूमिगत होने के बाद अंग्रेजों ने उन्हें गिरफ्तार करने का आदेश जारी किया. ब्रिटिश सरकार की तमाम कोशिशों के बावजूद वह उनकी गिरफ्त में नहीं आईं. पुलिस अपना काम करती रही और अरुणा अपना. पुलिस की पकड़ से बचती हुई अरुणा देश में घूम-घूम कर आज़ादी के आन्दोलन में शामिल लोगों में नव जागृति लाने के काम से जुडी रहीं. ब्रिटिश हुकूमत ने हर पेंच अपनाए, उनकी सारी संपत्ति जब्त करके उसे नीलाम कर दिया. अरुणा ने राम मनोहर लोहिया के साथ मिलकर ‘इन्कलाब’ नामक मासिक सामाचार पत्र को संपादित करने का काम किया. थक-हार कर अंग्रेजी सरकार ने उनके सिर पर पांच हज़ार रुपये का इनाम रखा, पर कोई फायदा नहीं हुआ. ये सिलसिला लगभग चार साल तक चला.


साल 1946 में जब उन्हें गिरफ्तार करने का वारंट रद्द किया गया तब वह प्रकट हुईं और आत्म-समर्पण किया.


आज़ादी दूर नहीं थी. एक साल बाद जब देश आज़ाद हुआ, अरुणा आसफ अली दिल्ली प्रदेश कांग्रेस कमेटी की अध्यक्ष बनीं. साल 1958 में वह दिल्ली की पहली मेयर चुनी गईं.


अपने जुझारू राजनैतिक जीवन की विरासत, पार्टी में काम करने के अनुभव की वजह से ही सरकारी पदों पर आसीन रहते हुए भी अरुणा सामाजिक मुद्दों और कार्यों से गहरे रूप से जुडी रहीं. साल 1947-48, देश-विभाजन के दौरान, उन्होंने दिल्ली में शरणार्थियों की समस्या को हल करने में अपना योगदान दिया. उन्होंने भारत-रूस संस्कृति संस्था की सदस्य के रूप में इन दोनों देशों के बीच मित्रता बढ़ाने में बहुत सहयोग किया. ‘ऑल इंडिया पीस काउन्सिल’ और ‘नेशनल फेडरेशन ऑफ इन्डियन वीमेन’ ऐसी संस्थानों में पूरी तरह सक्रिय रहीं. दिल्ली में ही स्थित लेडी इरविन कॉलेज की स्थापना में इनका अहम् योगदान रहा. दिल्ली से प्रकाशित अंग्रेजी दैनिक ‘पेट्रियट’ से आजीवन जुड़ी रहीं.


1975 में उन्हें लेनिन शांति पुरस्कार, 1992 में 'पद्म विभूषण' से सम्मानित किया गया. 29 जुलाई 1996 में उनकी मृत्यु हुई. मरणोपरांत, 1997 में भारत सरकार ने उन्हें ‘भारत रत्न’ से सम्मानित किया.


आज़ादी की लड़ाई में अग्रिम भूमिका निभाने वाली, विभिन्न सम्मानों से सम्मानित, विशिष्ट व्यक्तित्व की धनी यह महिला आजीवन अपने पति के साथ एक कमरे के फ्लैट में रहीं, सार्वजनिक परिवहनों में सफ़र किया. लेकिन यह आश्चर्यजनक नहीं है क्योंकि अरुणा आसफ़ अली वही महिला हैं जिनकी संपत्ति नीलाम करके भी अंग्रेज़ उनके हौसले नहीं तोड़ पाए थे.


(फीचर ईमेज क्रेडिट: DD News)