पैदल स्कूल पहुंचकर पूरी की पढ़ाई, मेहनत से बने डिप्टी कलेक्टर

By जय प्रकाश जय
February 18, 2019, Updated on : Thu Sep 05 2019 07:31:24 GMT+0000
पैदल स्कूल पहुंचकर पूरी की पढ़ाई, मेहनत से बने डिप्टी कलेक्टर
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विजय कुमार देहरिया (तस्वीर साभार- यूट्यूब)

भगवान राम तो सिया सुकुमारी के लिए वन-वन भटके थे, हमारे समय में देश के युवा भविष्य संवारने के लिए जंगल-जंगल भटक रहे हैं। मध्य प्रदेश पब्लिक सर्विस कमीशन की परीक्षा में (एससी कैटेगरी) पहली रैंक हासिल करने वाले विजय कुमार देहारिया जंगल में नौकरी के साथ पीएससी की तैयारी करते हुए एग्जाम टॉप कर डिप्टी कलेक्टर बन गए हैं। परिवार की माली हालत खराब होने के बावजूद ऊंचा ओहदा पा लिया है।


भविष्य संवारने के लिए कड़ी मेहनत के बाद प्रतिभाएं जीवन में किस तरह रंग लाती है, जबलपुर (म.प्र.) के विजय कुमार देहारिया उसकी जीती-जागती मिसाल हैं। मध्य प्रदेश पब्लिक सर्विस कमीशन की (एससी कैटेगरी) परीक्षा में पहली रैंक हासिल करने वाले देहारिया जबलपुर के लखनादौन के पास छोटे से गांव जमुआ के रहने वाले हैं। उनका गांव इतना छोटा है कि वहां आज भी बुनिया दी सुविधाएं न के बराबर हैं। सबसे बड़ी बात है कि उनके गांव में कोई स्कूल नहीं है। उनकी पढ़ाई लिखाई सिवनी से हुई। उसके बाद वह आगे की पढ़ाई करने के लिए जबलपुर इंजीनियरिंग कॉलेज में दाखिल हो गए। उनका सपना डिप्टी कलेक्टर बनने का था।


विजय कुमार देहारिया के अब तक के जीवन का सफर किसी फिल्म की तरह है। लखनादौन के स्कूल में उन्होंने पहली बार छठवीं क्लास में अंग्रेजी पढ़ी। उनके गांव से सबसे नजदीकी पक्की सड़क तीन किलोमीटर दूर है। उनके पूरे गांव में केवल छह लोग ग्रैजुएट हैं, जिनमें से एक विजय और एक उनके छोटे भाई हैं। उनके पिता धनैया लाल 2007 तक मात्र बाईस रुपए की पगार पर टीचिंग करते थे। मां राजकुमारी आंगनबाड़ी में हैं।


विजय कुमार देहारिया के परिवार की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं। देहारिया आठ किमी सफर करके स्कूल जाते थे। पैसे की कमी के कारण वह इंजिनियरिंग कॉलेज में दाखिला नहीं ले सके। बाद में जबलपुर इंजीनियरिंग कॉलेज में उन्हें ग्रीन कार्ड होने के कारण बिना फीस के पढ़ने का अवसर मिल गया। खर्च निकालने के लिए वह अपने आवास पर बच्चों को ट्यूशन देते। इंजिनियरिंग पूरी करने के बाद उन्होंने इंदौर में छह हजार रुपए महीने की नौकरी कर ली। नौकरी भी जंगल की। वह सिवनी के जंगल में फॉरेस्ट गार्ड की ड्यूटी देने लगे। नौकरी के साथ जंगल में ही वे एमपीपीएससी की तैयारी भी करने लगे। दो बार तो एग्जाम में कामयाब नहीं हुए। तीसरे चांस में एसटी कैटेगरी में वह पूरे प्रदेश में टॉप कर गए।


विजय कुमार देहारिया का इस तरह डिप्टी कलेक्टर बनने का सपना भी पूरा हो गया। प्रदेश की जनरल कैटिगरी में उनकी रैंक 38वीं है। उन्होंने जब रिजल्ट देखा तो एक बार को उन्हें खुद की कामयाबी पर यकीन नहीं हुआ लेकिन सच वही रहा, जो उन्होंने उस वक्त जाना। उनको पिछली दो बार की असफलताओं से ये तो समझ में आ गया था कि क्या नहीं करना है। उन्होंने सोशल मीडिया के साथ ही अपने नाते-रिश्ते के लोगों से भी दूरी बना ली। इतनी एकाग्रता से तैयारी में जुट गए। वह आज भी मिनिस्ट्री ऑफ डिफेंस में जॉब कर रहे हैं। विजय कहते हैं कि वह अपने गांव के लोगों को बुनियादी सुविधाएं दिलाने की जरूर कोशिश करेंगे।


एमपी पीएससी- 2018 की मुख्य परीक्षा में पूरे मध्य प्रदेश में तीसरा स्थान पाने वाली राजनंदनी शर्मा भी जबलपुर से ही हैं। जबलपुर शहर में हेडमास्टरी कर रहे पिता अखिलेश शर्मा और डाइट में लैक्चरार मां तरुणा शर्मा की असिस्टेंट सब इंस्पेक्टर पुत्री राजनंदनी शर्मा को सेकंड अटैम्प्ट में कुल 975 अंक मिले हैं। अब वह डिप्टी कलेक्टर बन चुकी हैं। राजनंदनी हमेशा से डिप्टी कलेक्टर बनने का सपना देखती रही हैं।


वह स्कूल में मैथ्स और साइंस में ज्यादा रुचि रखती थीं। सामान्य शिक्षा के बाद उन्होंने इंजीनियरिंग की पढ़ाई की। उसके बाद वह वर्ष 2016 से पीएससी की तैयारी करने लगीं। अगले साल प्रीलिम्स क्लियर नहीं हुआ। बाद में उन्होंने अपनी स्ट्रेटजी बदल दी। अस्सी फीसदी सेल्फ स्टडी से दूसरी बार उनको सफलता मिल गई। वह कहती हैं कि डिप्टी कलेक्टर के रूप में वह महिलाओं विकास के लिए हर संभव प्रयास करेंगी।


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