घर से पंचायत तक का सफर और महिला सशक्तिकरण की मिसाल — बिहार की सीमा कुमारी की कहानी
बिहार के नालंदा की धानकी पंचायत की मुखिया सीमा कुमारी ने पहली चुनावी हार के बाद दोबारा कोशिश की और जीत हासिल की. जानिए कैसे उन्होंने पंचायत में शिक्षा, सड़क, नाली, आंगनबाड़ी, महिला स्वावलंबन और जल संरक्षण जैसे मुद्दों पर काम शुरू किया.
बिहार के नालंदा जिले के सरमेरा प्रखंड की धानकी पंचायत में सीमा कुमारी को लोग ‘निम्की मुखिया’ के नाम से जानते हैं. आज उनकी पहचान एक जिम्मेदार और सक्रिय महिला मुखिया के रूप में है. पंचायत से जुड़े काम के लिए जब वह अलग-अलग विभागीय कार्यालयों में पहुंचती हैं, तो लोग उन्हें पहचानते हैं.
लेकिन इस पहचान तक पहुंचने का सफर आसान नहीं था.
सीमा कुमारी ने अपनी जिंदगी का एक बड़ा हिस्सा घर की जिम्मेदारियों के बीच बिताया. पढ़ाई में उनकी दिलचस्पी थी और समाज को समझने की इच्छा भी. लेकिन शादी के बाद उनकी जिंदगी घर तक सीमित हो गई.
गांव में वोट देने के दौरान जब वह लोगों से मिलतीं, तो उन्हें अपनी पढ़ाई और गांव की स्थिति के बीच एक बड़ा फर्क दिखाई देता. यहीं से उनके मन में एक सवाल पैदा हुआ. अगर उन्होंने पढ़ाई की है, तो क्या उसका इस्तेमाल समाज के लिए नहीं किया जा सकता?
इसी सवाल ने उन्हें राजनीति और पंचायत की जिम्मेदारी की ओर बढ़ने का रास्ता दिखाया. पहली बार चुनाव में हार मिली, लेकिन उन्होंने इसे अपनी मंजिल नहीं माना. अगली कोशिश में उन्होंने जीत हासिल की और पंचायत के विकास के काम में जुट गईं.
पढ़ाई से मिली सोच, पिता से मिली प्रेरणा
सीमा कुमारी का जन्म एक मध्यमवर्गीय परिवार में हुआ. उनके पिता शिक्षा को बहुत महत्व देते थे. उनका मानना था कि हर व्यक्ति को पढ़ने और आगे बढ़ने का बराबर अधिकार मिलना चाहिए.
सीमा बचपन से ही पिता के सामाजिक कामों को करीब से देखती थीं और उनमें हिस्सा भी लेती थीं.
स्कूल की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने कॉलेज में कदम रखा और ग्रेजुएशन की डिग्री ली. इसके बाद भी आगे पढ़ने की इच्छा थी. लेकिन परिवार की दूसरी जिम्मेदारियों को देखते हुए उनकी शादी कर दी गई.
शादी के बाद भी उनके पिता उन्हें पढ़ाई जारी रखने के लिए प्रेरित करते रहे.
सीमा बताती हैं, “मेरे पिताजी हमेशा कहते थे कि पढ़ाई-लिखाई बहुत जरूरी है. उन्होंने मुझे समझाया कि शिक्षा सिर्फ अपने लिए नहीं, बल्कि समाज के लिए भी काम आ सकती है.”
शादी के बाद उनकी जिंदगी का बड़ा हिस्सा घर की जिम्मेदारियों में बीतने लगा. कई बार उन्हें लगता था कि उन्होंने स्नातक तक पढ़ाई की, लेकिन अब उनका काम सिर्फ घर तक सीमित है.
यह सवाल धीरे-धीरे उनके मन में मजबूत होता गया कि क्या वह समाज के लिए भी कुछ कर सकती हैं.
गांव की समस्याओं ने राजनीति में आने की वजह दी
शहर में रहने के दौरान जब भी चुनाव आते, सीमा अपने गांव वोट देने जाती थीं. इन यात्राओं के दौरान उन्हें गांव के लोगों से बात करने का मौका मिलता. वह गांव की गलियों में घूमतीं और लोगों की परेशानियां सुनतीं.
उन्हें महसूस हुआ कि गांव में गरीबी के साथ-साथ शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी सुविधाओं की भी कमी है. कई लोगों को सरकारी योजनाओं की जानकारी नहीं थी. कुछ लोग योजनाओं का लाभ लेने की प्रक्रिया से भी अनजान थे.
एक तरफ उनकी पढ़ाई थी और दूसरी तरफ गांव की समस्याएं. उन्हें लगा कि अगर उनके पास शिक्षा है, तो उसकी जिम्मेदारी भी है.
लोगों से बातचीत के दौरान कुछ ग्रामीणों ने उन्हें चुनाव लड़ने की सलाह दी.
वह कहती हैं, “लोगों ने मुझसे कहा कि आप चुनाव क्यों नहीं लड़तीं? आप पढ़ी-लिखी हैं. अगर आप मुखिया बनेंगी, तो हमारे गांव का भला होगा. उस दिन मेरे मन में भी लगा कि शायद मुझे यही करना चाहिए.”
उन्होंने चुनाव लड़ने का फैसला किया.
पहली बार उन्हें हार का सामना करना पड़ा. लेकिन हार के बाद भी उन्होंने कोशिश नहीं छोड़ी. उन्होंने लोगों से मिलना जारी रखा और अपनी कमियों को समझा. अगली बार उन्होंने फिर चुनाव लड़ा और जीत हासिल की.
महिला सशक्तिकरण की मिसाल
मुखिया बनने के बाद सीमा ने पंचायत की समस्याओं को समझने के लिए लोगों से सीधे बातचीत शुरू की. उनका मानना था कि किसी भी योजना को सफल बनाने के लिए पहले यह समझना जरूरी है कि गांव की असली जरूरत क्या है.
उन्होंने सरकारी योजनाओं को लेकर पंचायत में जागरूकता अभियान चलाया. ग्रामीणों को योजनाओं और उपलब्ध सुविधाओं की जानकारी देने की कोशिश की गई.
पंचायत में स्कूल की मरम्मत का काम हुआ. नए आंगनबाड़ी केंद्र का निर्माण कराया गया. पक्की नालियों और सड़कों के निर्माण पर भी काम किया गया.
हालांकि, सीमा के लिए विकास का मतलब सिर्फ सड़क और नाली बनाना नहीं था. वह चाहती थीं कि पंचायत की महिलाएं भी अपने पैरों पर खड़ी हों.
इसी सोच के साथ स्थानीय NGO की मदद से अनपढ़ महिलाओं और लड़कियों के लिए सिलाई और कढ़ाई का प्रशिक्षण शिविर आयोजित कराया गया.
इस पहल का मकसद महिलाओं को किसी पर निर्भर रहने के बजाय अपने लिए कमाई का रास्ता तैयार करने में मदद करना था. रोजगार के अलग-अलग अवसरों को लेकर भी महिलाओं को जानकारी दी गई.
सीमा कहती हैं, “मैं चाहती थी कि हमारे गांव की महिलाएं सिर्फ घर तक सीमित न रहें. उन्हें कोई हुनर मिले और वह अपने पैरों पर खड़ी हो सकें. इसी सोच से सिलाई-कढ़ाई का प्रशिक्षण शुरू कराया.”
पानी बचाने के लिए जल चौपाल और नुक्कड़ नाटक
धानकी पंचायत में सीमा ने जल संरक्षण को भी अपनी प्राथमिकताओं में शामिल किया. उनका मानना था कि पानी की समस्या आने वाले समय में गांवों के लिए बड़ी चुनौती बन सकती है.
लोगों को पानी की अहमियत समझाने के लिए जल चौपाल का आयोजन किया गया. इन चौपालों में ग्रामीणों से पानी की उपलब्धता, उसके सही इस्तेमाल और भविष्य के लिए संरक्षण पर बातचीत की गई.
सार्वजनिक स्थानों पर सोख्ता का निर्माण कराया गया. पानी के बेहतर इस्तेमाल को लेकर नुक्कड़ नाटक भी आयोजित किए गए. स्थानीय NGO और स्वास्थ्य विभाग के लोगों ने भी इन कार्यक्रमों में हिस्सा लिया.
सीमा के मुताबिक, गांव की समस्याओं को पहचानने और उनके समाधान का रास्ता निकालने में ग्राम सभा की बड़ी भूमिका है. उन्होंने पंचायत की बैठकों को नियमित बनाने की कोशिश की.
उन्होंने जिला स्तर से मिलने वाले प्रशिक्षण में भी हिस्सा लिया. पंचायत में GPDP से जुड़े काम को आगे बढ़ाने के लिए टीम का गठन किया गया और उसकी मासिक बैठक पर जोर दिया गया.
सीमा कहती हैं, “पानी आज बचाएंगे, तभी आने वाली पीढ़ी के लिए सुरक्षित भविष्य बना पाएंगे. इसी बात को आसान तरीके से समझाने के लिए हमने गांव में जल चौपाल और नुक्कड़ नाटक जैसे कार्यक्रम शुरू किए.”
सम्मान मिला, लेकिन मंजिल अभी बाकी है
सीमा कुमारी के काम को राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर भी पहचान मिली है. महिलाओं को सशक्त बनाने के प्रयासों के लिए उन्हें राज्य स्तर पर नारी सशक्तिकरण सम्मान पुरस्कार मिल चुका है.
जल संरक्षण के क्षेत्र में उनके काम के लिए राष्ट्रीय स्तर पर भी सराहना और पुरस्कार मिला है.
हालांकि, इन सम्मानों के बावजूद सीमा की नजर अभी आगे की चुनौतियों पर है. वह पंचायत की बच्चियों के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य और पोषण को और बेहतर बनाने पर ध्यान देना चाहती हैं.
उनका मानना है कि गांव का विकास तभी पूरा होगा, जब वहां की बेटियों को आगे बढ़ने के समान अवसर मिलेंगे.
घर की जिम्मेदारियों से शुरू हुआ उनका सफर आज पंचायत के नेतृत्व तक पहुंच चुका है. पहली चुनावी हार से लेकर दूसरी कोशिश में जीत और फिर विकास के काम तक, सीमा की कहानी बताती है कि नेतृत्व सिर्फ पद मिलने से नहीं आता.
इसके लिए लोगों की बात सुनना और उनकी समस्याओं के साथ खड़ा होना जरूरी है.
सीमा के लिए मुखिया का पद सिर्फ एक जिम्मेदारी है. उनका असली लक्ष्य पंचायत के लोगों तक उन सुविधाओं को पहुंचाना है, जिन्हें आम तौर पर शहरों से जोड़कर देखा जाता है.
सीमा कहती हैं, “मैंने यह महसूस किया है कि एक महिला भी उतनी ही मजबूती से नेतृत्व कर सकती है. मेरा लक्ष्य है कि सरकार की योजनाओं और सुविधाओं का लाभ पंचायत के हर परिवार तक पहुंचे. आने वाले समय में मैं खास तौर पर बच्चियों की शिक्षा, स्वास्थ्य और पोषण पर काम करना चाहती हूं.”
उनकी कहानी एक ऐसे गांव की कहानी भी है, जहां बदलाव छोटे-छोटे कदमों से शुरू होता है. एक महिला ने पहले अपनी स्थिति को समझा. फिर गांव की जरूरतों को जाना. आखिरकार उन्होंने नेतृत्व की जिम्मेदारी स्वीकार की.
अब उनकी कोशिश है कि धानकी पंचायत की तस्वीर पहले से बेहतर हो.






