कई दशक तक बच्चन और सुमन छाए रहे मंचों पर

By जय प्रकाश जय
November 27, 2017, Updated on : Thu Sep 05 2019 07:15:18 GMT+0000
कई दशक तक बच्चन और सुमन छाए रहे मंचों पर
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27 नवम्बर, कैसा संयोग दिवस आज। देश की दो साहित्यिक विभूतियों की स्मृति-वेला। मधुशाला के यशस्वी कवि हरिवंश राय बच्चन का जन्मदिन और महाकवि शिवमंगल सिंह सुमन की पुण्यतिथि। एक वक्त में दोनो महाकवि देश के काव्य मंचों पर कई दशक तक एक साथ छाए रहे।

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उत्तर-छायावादी जिन दो प्रमुख कवियों में भौतिकवाद और अध्यात्मवाद के समन्वय की बेचैनी का भाव देखा जाता है, उनमें एक रहे हरिवंश राय 'बच्चन', दूसरे शिवमंगल सिंह 'सुमन'।

देश को आज़ादी मिलने से पूर्व स्वतंत्रता संग्राम के दिनों में दोनो कवियों की कविताओं ने पूरे आंदोलन को ओजस्वी स्वर दिया। ‘सुमन’ केवल हिंदी कविता के क्षेत्र में एक शक्तिशाली हस्ताक्षर ही नहीं थे, बल्कि वह अपने समय की सामूहिक चेतना के संरक्षक भी थे। 'बच्चन' के काव्य की विलक्षणता उनकी लोकप्रियता है। यह नि:संकोच कहा जा सकता है कि आज भी हिन्दी के ही नहीं, सारे भारत के सर्वाधिक लोकप्रिय कवियों में 'बच्चन' का स्थान सुरक्षित है।

27 नवम्बर, कैसा संयोग दिवस आज। देश की दो साहित्यिक विभूतियों की स्मृति-वेला। मधुशाला के यशस्वी कवि हरिवंश राय बच्चन का जन्मदिन और महाकवि शिवमंगल सिंह सुमन की पुण्यतिथि। एक वक्त में दोनो महाकवि देश के काव्य मंचों पर कई दशक तक एक साथ छाए रहे। उत्तर-छायावादी जिन दो प्रमुख कवियों में भौतिकवाद और अध्यात्मवाद के समन्वय की बेचैनी का भाव देखा जाता है, उनमें एक रहे हरिवंश राय 'बच्चन', दूसरे शिवमंगल सिंह 'सुमन'। देश को आज़ादी मिलने से पूर्व स्वतंत्रता संग्राम के दिनों में दोनो कवियों की कविताओं ने पूरे आंदोलन को ओजस्वी स्वर दिया। 

‘सुमन’ केवल हिंदी कविता के क्षेत्र में एक शक्तिशाली हस्ताक्षर ही नहीं थे, बल्कि वह अपने समय की सामूहिक चेतना के संरक्षक भी थे। उन्हें सन् 1999 में भारत सरकार ने साहित्य एवं शिक्षा के क्षेत्र में पद्म भूषण से सम्मानित किया था। वे ग्वालियर के विक्टोरिया कॉलेज में हिंदी के व्याख्याता, माधव महाविद्यालय उज्जैन के प्राचार्य और फिर कुलपति रहे। अध्यापन के अतिरिक्त विभिन्न महत्त्वपूर्ण संस्थाओं और प्रतिष्ठानों से जुड़कर उन्होंने हिंदी साहित्य में श्रीवृद्धि की। वह साहित्य प्रेमियों में ही नहीं अपितु सामान्य लोगों में भी बहुत लोकप्रिय थे। शहर में किसी अज्ञात-अजनबी व्यक्ति के लिए रिक्शे वाले को यह बताना काफ़ी था कि उसे सुमन जी के घर जाना है। 

उनके जीवन का सबसे महत्त्वपूर्ण क्षण वह था जब उनकी आँखों पर पट्टी बांधकर उन्हे एक अज्ञात स्थान पर ले जाया गया। जब आँख की पट्टी खोली गई तो वह हतप्रभ थे। उनके समक्ष स्वतंत्रता संग्राम के महायोद्धा चंद्रशेखर आज़ाद खड़े थे। आज़ाद ने उनसे प्रश्न किया था, क्या यह रिवाल्वर दिल्ली ले जा सकते हो। सुमन जी ने बेहिचक प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। आज़ादी के दीवानों के लिए काम करने के आरोप में उनके विरुद्ध वारंट ज़ारी हुआ। 

जिन्होंने सुमनजी को सुना है वे जानते हैं कि 'सरस्वती' कैसे बहती है। सरस्वती की गुप्त धारा का वाणी में दिग्दर्शन कैसा होता है। जब वे बोलते थे तो तथ्य, उदाहरण, परंपरा, इतिहास, साहित्य, वर्तमान का इतना जीवंत चित्रण होता था कि श्रोता अपने अंदर आनंद की अनुभूति करते हुए 'ज्ञान' और ज्ञान की 'विमलता' से भरापूरा महसूस करता था। वह अंदर ही अंदर गूंजता रहता था और अनेकानेक अर्थों की 'पोटली' खोलता था। वे प्रगतिशील कवि थे। वे वामपंथी थे। लेकिन 'वाद' को 'गठरी' लिए बोझ नहीं बनने दिया। उसे ढोया नहीं, वरन्‌ अपनी जनवादी, जनकल्याण, प्रेम, इंसानी जुड़ाव, रचनात्मक विद्रोह, सृजन से 'वाद' को खंगालते रहे, इसीलिए वे 'जनकवि' हुए वर्ना 'वाद' की बहस और स्थापनाओं में कवि कर्म, उनका मानस, कर्म कहीं क्षतिग्रस्त हो गया होता। हिन्दी कविता की वाचिक परंपरा की लोकप्रियता के साक्षी, देश के काव्य-प्रेमियों को अपने गीतों की रवानी से अचंभित कर देने वाले सुमन जी 27 नवंबर 2002 को हमेशा के लिए मौन हो गए।

सुमन जी की इस कविता की पहली दो पंक्तियां आज भी मुहावरे की तरह व्यक्त की जाती हैं-

मैं नहीं आया तुम्हारे द्वार पथ ही मुड़ गया था।

गति मिली मैं चल पड़ा

पथ पर कहीं रुकना मना था,

राह अनदेखी, अजाना देश

संगी अनसुना था।

चांद सूरज की तरह चलता

न जाना रात दिन है,

किस तरह हम तुम गए मिल

आज भी कहना कठिन है,

तन न आया मांगने अभिसार मन ही जुड़ गया था।

देख मेरे पंख चल, गतिमय

लता भी लहलहाई

पत्र आँचल में छिपाए मुख

कली भी मुस्कुराई।

एक क्षण को थम गए डैने

समझ विश्राम का पल

पर प्रबल संघर्ष बनकर

आ गई आंधी सदलबल।

डाल झूमी, पर न टूटी किंतु पंछी उड़ गया था।

भगवती चरण वर्मा के 75वें जन्म दिन पर आयोजित कवि सम्मेलन में बच्चन जी

भगवती चरण वर्मा के 75वें जन्म दिन पर आयोजित कवि सम्मेलन में बच्चन जी


'मधुशाला' के अमर कृतिकार 'हालावाद' के प्रवर्तक और सदी के नायक अमिताभ बच्चन के पिता हरिवंश राय बच्चन को भला कौन नहीं जानता होगा। उन्होने इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अध्यापन किया। बाद में भारत सरकार के विदेश मंत्रालय में हिन्दी विशेषज्ञ रहे। अनन्तर राज्य सभा के मनोनीत सदस्य। उनकी गिनती हिन्दी के सर्वाधिक लोकप्रिय कवियों में होती है। उनको बचपन में प्यार से परिजन 'बच्चन' कहा करते थे, जिसका शाब्दिक अर्थ 'बच्चा' या 'संतान' होता है। बाद में वह इसी नाम से मशहूर हुए। उनकी कृति 'दो चट्टानें' को 1968 में साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। उसी वर्ष उन्हें सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार तथा एफ्रो एशियाई सम्मेलन के कमल पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया। बिड़ला फाउण्डेशन ने उनकी आत्मकथा के लिये उन्हें सरस्वती सम्मान दिया। उनको भारत सरकार द्वारा 1976 में साहित्य एवं शिक्षा के क्षेत्र में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया था।

अपनी एक रचना में बच्चन जी ने अपना आत्मपरिचय कुछ इस तरह चित्रित किया है-

मैं जग-जीवन का भार लिए फिरता हूँ,

फिर भी जीवन में प्‍यार लिए फिरता हूँ;

कर दिया किसी ने झंकृत जिनको छूकर

मैं सासों के दो तार लिए फिरता हूँ!

मैं स्‍नेह-सुरा का पान किया करता हूँ,

मैं कभी न जग का ध्‍यान किया करता हूँ,

जग पूछ रहा है उनको, जो जग की गाते,

मैं अपने मन का गान किया करता हूँ!

मैं निज उर के उद्गार लिए फिरता हूँ,

मैं निज उर के उपहार लिए फिरता हूँ;

है यह अपूर्ण संसार ने मुझको भाता

मैं स्‍वप्‍नों का संसार लिए फिरता हूँ!

मैं जला हृदय में अग्नि, दहा करता हूँ,

सुख-दुख दोनों में मग्‍न रहा करता हूँ;

जग भ्‍ाव-सागर तरने को नाव बनाए,

मैं भव मौजों पर मस्‍त बहा करता हूँ!

मैं यौवन का उन्‍माद लिए फिरता हूँ,

उन्‍मादों में अवसाद लए फिरता हूँ,

जो मुझको बाहर हँसा, रुलाती भीतर,

मैं, हाय, किसी की याद लिए फिरता हूँ!

कर यत्‍न मिटे सब, सत्‍य किसी ने जाना?

नादन वहीं है, हाय, जहाँ पर दाना!

फिर मूढ़ न क्‍या जग, जो इस पर भी सीखे?

मैं सीख रहा हूँ, सीखा ज्ञान भूलना!

मैं और, और जग और, कहाँ का नाता,

मैं बना-बना कितने जग रोज़ मिटाता;

जग जिस पृथ्‍वी पर जोड़ा करता वैभव,

मैं प्रति पग से उस पृथ्‍वी को ठुकराता!

मैं निज रोदन में राग लिए फिरता हूँ,

शीतल वाणी में आग लिए फिरता हूँ,

हों जिसपर भूपों के प्रसाद निछावर,

मैं उस खंडर का भाग लिए फिरता हूँ!

मैं रोया, इसको तुम कहते हो गाना,

मैं फूट पड़ा, तुम कहते, छंद बनाना;

क्‍यों कवि कहकर संसार मुझे अपनाए,

मैं दुनिया का हूँ एक नया दीवाना!

मैं दीवानों का एक वेश लिए फिरता हूँ,

मैं मादकता नि:शेष लिए फिरता हूँ;

जिसको सुनकर जग झूम, झुके, लहराए,

मैं मस्‍ती का संदेश लिए फिरता हूँ!

बच्चन जी कई वर्षों तक इलाहाबाद विश्वविद्यालय के अंग्रेज़ी विभाग में प्राध्यापक रहे। कुछ समय के लिए आकाशवाणी के साहित्यिक कार्यक्रमों से सम्बद्ध रहे। फिर 1955 में वह विदेश मंत्रालय में हिन्दी विशेषज्ञ होकर दिल्ली चले गये। विश्वविद्यालयों के दिनों में उन्होंने कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय जाकर अंग्रेज़ी कवि यीट्स पर शोध प्रबन्ध लिखा, जो काफ़ी प्रशंसित हुआ। 'बच्चन' की कविता के साहित्यिक महत्त्व के बारे में अनेक मत हैं। 'बच्चन' के काव्य की विलक्षणता उनकी लोकप्रियता है।

यह नि:संकोच कहा जा सकता है कि आज भी हिन्दी के ही नहीं, सारे भारत के सर्वाधिक लोकप्रिय कवियों में 'बच्चन' का स्थान सुरक्षित है। इतने विस्तृत और विराट श्रोतावर्ग का विरले ही कवि दावा कर सकते हैं। उनकी पुस्तक 'तेरा हार' पहले भी प्रकाशित हो चुकी थी पर उनका पहला काव्य संग्रह 1935 में 'मधुशाला' से ही प्रकाशित माना जाता है। इसके प्रकाशन के साथ ही उनका नाम पूरे साहित्य जगत में छा गया।

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