रक्षा उत्पादन में आत्मनिर्भर बनने के लिए मेक इन इंडिया समेत अनेक पहल : पर्रिकर

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    रक्षा उत्पादन में आत्मनिर्भर बनने के लिए ‘मेक इन इंडिया’ समेत अनेक उपाए किये गए हैं। पिछले तीन वर्षों के दौरान भारतीय सेना द्वारा पूंजीगत अर्जन पर कुल व्यय का 75 प्रतिशत से अधिक आर्डर भारतीय फर्मो को दिये गए हैं।

    लोकसभा में नित्यानंद राय के प्रश्न के लिखित उत्तर में रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर ने कहा कि सार्वजनिक एवं निजी क्षेत्र की क्षमताओं का उपयोग करके रक्षा उत्पादन में आत्म निर्भरता प्राप्त करने के लिए कई कदम उठाये गए हैं।


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    उन्होंने कहा कि रक्षा उत्पादन में हर क्षेत्र में स्वदेशी उत्पादन संभव नहीं है क्योंकि कई चीजों की हमें कम मात्रा में जरूरत होती है और इसके उत्पादन का खर्च अधिक होगा जबकि खुले बाजार में यह उपलब्ध होता है। हालांकि रक्षा क्षेत्र में स्वदेशी उत्पादन को प्रोत्साहित करने की दिशा में हम लगातार आगे बढ़ रहे हैं।

    रक्षा मंत्री ने कहा कि इन उपायों के तहत भारतीय विक्रेताओं से अधिप्राप्ति को प्राथमिकता और तरजीह प्रदान किया जाना, लाइसेंसिंग प्रणाली का उदारीकरण तथा रक्षा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की सीमा को बढ़ाते हुए भारतीय उद्योग के लिए आधुनिक एवं अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी पहुंच उपलब्ध कराना है।

    पर्रिकर ने कहा कि वर्तमान में अधिकांश नौसैनिक पोतों और पनडुब्बियों का निर्माण भारतीय शिपयार्ड में किया जाता है।

    उन्होंने कहा कि पिछले तीन वषरे के दौरान भारतीय सेना द्वारा पूंजीगत अर्जन पर कुल व्यय के 75 प्रतिशत से अधिक आर्डर भारतीय फर्मो को दिये गए हैं।

    उन्होंने कहा कि नई रक्षा अधिप्राप्ति 2016 भी एक अप्रैल 2016 से प्रभावी हो गई है। इसके तहत ‘मेक इन इंडिया’ को तरजीह दी गई है। मेक इन इंडिया के तहत लघु उद्यमों हेतु 10 करोड़ रूपये :सरकार द्वारा वित्तपोषित: और 3 करोड़ रूपये :उद्योग द्वारा वित्त पोषित: विकास लागत वाली परियोजनाओं को चिन्हित किया गया है।

    रक्षा मंत्री ने कहा कि मुख्य रूप से अमेरिका, रूस, इस्राइल और फ्रांस जैसे देशों के विदेशी विक्रेताओं को जारी किये गए आर्डरों में 2013.14 में व्यय 35082 करोड़ रूपये था जो 2014.15 में घटकर 24992 करोड़ रूपये हो गया और 2015.16 में यह 22422 करोड़ रूपये रह गया। पर्रिकर ने कहा कि रक्षा उपस्कर के आयात के लिए कोई लक्ष्य निर्धारित नहीं किया जाता है और इसलिए ऐसे लक्ष्यों हेतु अलग से कोई बजटीय आवंटन नहीं होता है।


    पीटीआई

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