पर्यावरण प्रेम: स्कूल के बच्चों ने जलकुंभी से बनाया सैनिटरी नैपकिन

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sanitary napkin

जलकुंभी एकत्र करते बच्चे (तस्वीर साभार- एनडीटीवी)

भारत की एक बड़ी आबादी आज भी मासिक धर्म पर बात करने से कतराती है। इस पर बात करना एक तरह से निषेध माना जाता है। मासिक धर्म के स्वास्थ्य को अक्सर अनदेखा किया जाता है और समाज में दूसरों के बीच चर्चा नहीं की जाती है। इसके कई गंभीर परिणाम हमें देखने को मिलते हैं। आपको जानकर हैरानी होगी कि 2.3 करोड़ लड़कियां सिर्फ मासिक धर्म स्वच्छता प्रबंधन सुविधाओं की कमी के कारण स्कूल छोड़ देती हैं। मासिक धर्म स्वच्छता के बारे में जागरूकता की कमी से कई तरह की मुश्किलों का सामना करना पड़ता है।


ग्रामीण क्षेत्रों में स्थिति और भी बुरी है। अधिकांश महिलाओं के पास सैनिटरी उत्पादों तक पहुंच नहीं है, और वे उन्हें उपयोग करने के बारे में बहुत कम जानती हैं। गांव की महिलां और लड़कियां ज्यादातर कपड़े का इस्तेमाल करती हैं जो कि स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होता है। ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं के लिए इस समस्या का एक व्यावहारिक समाधान खोजा है केरल के अहमद कुरीक्कल मेमोरियल हायर सेकेंडरी स्कूल के दसवीं कक्षा के छात्रों का एक समूह ने।


स्टूडेंट्स की टीम ने पानी में पैदा होने वाली जलकुंभी का उपयोग करके एक ऐसा सैनिटरी नैपकिन बनाया है, जो कि पर्यावरण-अनुकूल है। साथ ही यह नियमित सैनिटरी पैड की तुलना में 12 गुना ज्यादा पानी को अवशोषित कर सकता है। जलकुंभी को दुनिया की सबसे खराब जलीय खरपतवार के रूप में माना जाता है। जलकुंभी तेजी से पानी में फैलती है और जलीय सतह पर एक घनी परत बनाती है, जिससे जलीय जंतुओं का जीवन मुश्किल हो जाता है।


स्टूडेंट्स के इस अनोखे प्रॉजेक्ट के पीछे स्कूल के जीव विज्ञान के शिक्षक सारत केएस का भी हाथ था। एनडीटीवी से बात करते हुए उन्होंने कहा, 'पूरी दुनिया में जलकुंभी की मदद से कई सारे उत्पाद बनाए जा रहे हैं जिसमें दरी से लेकर लैंप तक शामिल हैं। सवाल ये था कि हमारा प्रयास बाकियों से अलग कैसे होगा? हमारा विचार जलकुंभी के कचरे की मदद से पर्यावरण अनुकूल सामान बनाने का था। हमने नैपकिन बनाने का फैसला किया।'





टीम में ई अश्वती, पीवी हिना सुमी और एस श्रीजेश वैरियर शामिल थे। उन्होंने खरपतवार से सैनिटरी नैपकिन का उत्पादन करने के तरीकों का अध्ययन किया। सबसे पहले उन्होंने पर्यावरणिद खादीजा नर्गीज से बात की। इसके बाद स्थानीय लोगों से भी राय ली गई। छात्रों ने इसके बाद लैब में अपने प्रयोग शुरू किया। उन्होंने केरल के रंधतानी, केजुमुरू और एरक्का जैसे इलाकों में तालाबों में उपस्थित जलकुंभी का अध्यन किया।


प्रक्रिया के बारे में बताते हुए सरथ ने कहा, 'हमारा दूसरा कदम सैनिटरी नैपकिन के उपयोग और निपटान की विधि को समझना था। इस पर स्पष्टता पाने के लिए, छात्रों ने स्वास्थ्य विशेषज्ञों से बात की और 100 घरों में जाकर एक छोटा सा सर्वेक्षण किया। सर्वेक्षण में पता चला कि 71 प्रतिशत परिवार सैनिटरी नैपकिन का उपयोग करते हैं और 97 प्रतिशत प्लास्टिक आधारित सैनिटरी नैपकिन पर भरोसा करते हैं। इसके अलावा, जबकि 48 प्रतिशत उपयोग किए गए पैड को जलाते हैं, 11 प्रतिशत इसे फ्लश करते हैं। निष्कर्षों ने हमारे लिए बायो-डिग्रेडेबल पैड्स का उत्पादन करना और सभी को उसके लिए उसे उपयोग लायक बनाना महत्वपूर्ण बना दिया।'


परियोजना के अंतिम चरण में, छात्रों को खरपतवार को इकट्ठा करना, उसे साफ करना, उसे काटना, उसकी नसबंदी करना और खरपतवार के डंठल और कपास का उपयोग करके एक शोषक परत को फिर से भरना था। कॉटन को शोषक परत के ऊपर और नीचे जोड़ा गया था और बीज़वैक्स का उपयोग करके सील कर दिया गया था।


अभी इस नैपकिन को व्यावसायिक तौर पर नहीं लॉन्च किया गया है। क्योंकि पेटेंट का इंतजार हो रहा है। सरथ बताते हैं कि इस डिस्पोजेबल पैड की कीमत 3 रुपये है, और इसे इस्तेमाल के बाद खाद में बदला सकता है क्योंकि यह प्राकृतिक उत्पादों से बना है। इस खोज को काफी प्रशंसा मिल रही है। जिले स्तर की विज्ञान प्रदर्शनी में इस प्रॉजेक्ट ने पहला स्थान हासिल किया।





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