‘डोरस्टेप स्कूल',छात्रों तक पहुंचने वाला स्कूल, शिक्षा को हर दहलीज तक पहुंचाने की अनोखी कोशिश

29th Feb 2016
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एक पुरानी कहावत है--'प्यासे को कुएं के पास जाना पड़ता है, कुंआ प्यासे के पास कभी नहीं जाता'। लेकिन अगर इससे उलट हो जाए तो? कुछ ऐसा ही हुआ है। यक़ीन नहीं आता तो इस हकीक़त को ज़रूर पढ़िए।

‘शिक्षा का अधिकार’ भले ही देश भर में लागू हो गया हो लेकिन आज भी लाखों बच्चे ऐसे हैं जो अलग-अलग वजहों से स्कूल नहीं जाते। ऐसे बच्चों की संख्या अब छोटे शहरों की जगह बड़े शहरों में एक बीमारी का रूप ले रही है, जहां बच्चे अपने परिवार के साथ स्लम में रहते हैं, फुटपाथ पर सोते हैं या फिर ऐसी जगहों पर रहने को मजबूर होते हैं, जहां पर कोई निर्माण का काम चल रहा होता है। इसी बात को ध्यान में रखते हुए मुंबई में रहने वाली बीना शेट्टी लश्करी ने ‘डोरस्टेप स्कूल’ की शुरूआत की। ताकि जो बच्चे पढ़ने के लिए स्कूल नहीं जा सकते, उन तक स्कूल खुद पहुंचे। यही वजह है कि 50 बच्चों के साथ शुरू हुआ उनका ये प्रोजेक्ट आज 1 लाख बच्चों के बीच पहुंच गया है। खास बात ये है कि ‘डोरस्टेप स्कूल’ मुंबई के अलावा थाणे और पुणे में भी काम कर रहा है।


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बीना शेट्ट लश्करी ने ‘डोरस्टेप स्कूल’ की शुरूआत साल 1988 में तब की जब वो मास्टर्स इन सोशल वर्क के तौर पर एक छात्रा थीं। उस दौरान इन्होंने देखा की कई बच्चे स्कूल जाने की जगह अपने परिवार का गुजारा करने के लिए काम पर जाने को मजबूर थे। इतना ही नहीं उन्होंने देखा की जो बच्चे पढ़ाई छोड़ काम धंधा कर रहे थे उनकी उम्र 8 से 10 साल के बीच थी ऐसे में उनको स्कूल लाना काफी मुश्किल काम था। तब इन्होंने सोचा की क्यों ना ऐसे बच्चों को उन्हीं के पास जाकर पढ़ाया जाए। बीना ने अपने इस काम की शुरूआत मुंबई के कफ परेड इलाके के बाबा साहब अंबेडकर नगर से शुरूआत की थी।


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‘डोरस्टेप स्कूल’ नाम की ये संस्था स्लम में रहने वाले बच्चों के लिए कई तरह के कार्यक्रम चलाती है। इनमें से एक कार्यक्रम है ‘स्कूल ऑन व्हील’। इसके तहत एक खास तरह की डिजाइन की हुई बस होती है। जिसमें क्लासरूम का माहौल तैयार किया गया है। ये बस सुबह आठ बजे से शाम आठ तक पहले से तय अलग-अलग जगहों पर रोज़ जाती है। एक बस, एक दिन में चार अलग अलग जगहों पर जाती है और इस बस में आकर बच्चे पढ़ाई करते हैं। इस बस में लगने वाली क्लास ढ़ाई से तीन घंटे की होती है। जिसके बाद बच्चे अपने काम या घर लौट जाते हैं। खास बात ये है कि एक बस में करीब 20 से 25 बच्चे एक साथ बैठकर पढ़ाई कर सकते हैं। इस बस में पढ़ने के लिए आने वाले बच्चों की उम्र 6 साल से 18 साल तक के बीच की होती है। जिसके बाद उनको अलग अलग ग्रुप में बैठाकर पढ़ाया जाता है। इस बस में ऑडियो विजुअल के साथ, पानी, लाइब्रेरी के साथ रिक्रिएशन मेटिरियल भी होता है। ताकि यहां आने वाले बच्चों की प्रतिभा निखर सके।


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इन बसों में बच्चों को हिन्दी और गणित पढ़ाये जाते हैं। बीना ने योरस्टोरी को बताया, 

"बसों में पढ़ने के लिए आने वाले बच्चों को ना सिर्फ पढ़ना-लिखना सिखाया जाता है बल्कि उनमें साफ सफाई की आदत भी डाली जाती है। साथ ही उनको सिखाया जाता है कि गंदी भाषा को छोड़ अच्छी भाषा में बातचीत, कैसे अपनी बात को सामने वाले से मनवाया जा सकता है। जो बच्चे यहां पर पढ़ाई में अच्छा करते हैं उनको बाद में ये सरकारी या दूसरे स्कूल में दाखिला कराते हैं, ताकि वो पढ़ लिख कर कुछ बन सके।" 

'डोरस्टेप' बच्चों के साथ उनके माता पिता की भी काउंसलिंग करते हैं। माता-पिता को बच्चों की पढ़ाई के प्रति मानसिकता बदलने की कोशिश करते हैं। बीना का कहना है कि 

“हमारे पास ऐसी पांच बसें मुंबई और तीन बसें पुणे में हैं। इन बसों के अलावा हमारे सौ से ज्यादा स्टडी सेंटर विभिन्न स्लम बस्तियों में काम कर रहे हैं।”


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‘स्कूल ऑन व्हील’ प्रोजेक्ट के अलावा ‘डोरस्टेप स्कूल’ नाम की ये संस्था सौ से ज्यादा स्टडी सेंटर भी चलाती है। जहां पर एक क्लास ढ़ाई से तीन घंटे के होती है। बच्चों की क्लास सोमवार से शुक्रवार तक चलती है और एक टीचर दिनभर में दो क्लास लेती है। हर क्लास का अपना पाठ्यक्रम होता है और उसी के मुताबिक स्लम और फुटपाथ में रहने वाले बच्चों को पढ़ाने का काम किया जाता है। यहां पर आने वाले बच्चों को साइंस, मैथ्स, कंम्प्यूटर और विभिन्न भाषाओं का ज्ञान दिया जाता है। बस की तरह स्टडी सेंटर में बच्चे ना सिर्फ पढ़ना लिखना सीखते हैं बल्कि डांस, ड्रॉमा और गाना भी सीखते हैं। ये स्टडी सेंटर ऐसे बच्चों के लिए हैं जो बच्चे नियमित स्कूल में जाते हैं। ये उनको एक्ट्रा कोचिंग देने का काम करते हैं। बीना के मुताबिक “इसका मकसद ये है कि ये पहली पीढ़ी होती है जो पढ़ाई के लिए आगे आती है और घर में उसकी पढ़ाई में कोई मदद करने वाला नहीं होता। ऐसे में घर से मदद ना मिलने के कारण कई बार ना चाहते हुए भी बच्चे को अपनी पढ़ाई बीच में छोड़नी पड़ती है। इसलिए ऐसा ना हो इसी सोच के साथ हम ये स्टडी सेंटर चलाते हैं।”


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बीना का कहना है कि बच्चों को ‘स्कूल ऑन व्हील’ या स्टडी सेंटर तक लाना किसी चुनौती से कम नहीं होता। इसके लिए स्टडी सेंटर में पढ़ाने वाली टीचर बच्चों के घर जाती हैं और हर बच्चे को अपने साथ लेकर स्टडी सेंटर में लेकर लाती है। हालांकि इस क्षेत्र में सालों से काम करने के कारण कई बच्चे खुद ही पहुंच जाते हैं बावजूद बच्चों को स्टडी सेंटर या बस तक लाना बड़ी चुनौती है। इसके अलावा कई तरह की मोटिवेशनल एक्टिविटी भी चलाते हैं ताकि बच्चे उससे आकर्षित होकर पढ़ने के लिए इनके पास आ सकें। आज इनके पढ़ाये कई बच्चे अपना संगठन चला रहे हैं, चाटर्ड एकाउंटेंट बन चुके हैं, खेलों से जुड़ चुके हैं या फिर विभिन्न बड़े संगठनों में अच्छे पदों पर काम कर रहे हैं।

आज ‘डोरस्टेप स्कूल’ संस्था 100 से ज्यादा विभिन्न सरकारी स्कूलों के साथ मिलकर भी काम कर रही है। ताकि बच्चों को क्वॉलिटी एजुकेशन मिल सके। ‘डोरस्टेप स्कूल’ की टीम में 500 से ज्यादा लोग हैं। फिलहाल ये संस्था मुंबई, थाणे और पुणे में काम कर रही है। अब इनकी कोशिश मुंबई और उसके आसपास नवी मुंबई और कल्याण जैसे इलाकों में काम करने की है। साथ ही जो संस्थाएं दूसरे राज्यों या इलाकों में काम कर रही हैं उनको ट्रेनिंग देने की है, ताकि वो और बेहतर तरीके से अपने काम को अंजाम दे सकें।

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