'हिंदी कविता' के माध्यम से लोगों को हिन्दी और उर्दू साहित्य से जोड़ रहे हैं न्यूयॉर्क से वापस लौटे फिल्ममेकर मनीष गुप्ता

By प्रियांशु द्विवेदी
August 13, 2020, Updated on : Fri Aug 14 2020 05:13:16 GMT+0000
'हिंदी कविता' के माध्यम से लोगों को हिन्दी और उर्दू साहित्य से जोड़ रहे हैं न्यूयॉर्क से वापस लौटे फिल्ममेकर मनीष गुप्ता
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मनीष का मानना है कि साहित्य का दायरा लगातार बढ़ रहा है और आने वाले वर्षों में इसमें अपार संभावनाएं हैं। आज बड़ी तादाद में किताबों और ऑडियोबुक्स के जरिये लोगों तक साहित्य को पहुंचाने का काम किया जा रहा है, हो सकता है आने वाले समय में इसके माध्यम बदलते रहें, लेकिन साहित्य की पहुंच लोगों तक लगातार बनी रहेगी।

जाने-माने अभिनेता नसीरुद्दीन शाह के साथ मनीष गुप्ता

नसीर साहब के साथ मनीष गुप्ता (फाउंडर- 'हिन्दी कविता')



देश में आई डिजिटल क्रान्ति के बाद लोगों के पास मनोरंजन के विकल्पों की उपलब्धता जितनी अधिक हो गई, साहित्य में लोगों की रुचि उसी के साथ निरंतर कम होना शुरू हो गई है। आज आसानी से इंटरनेट पर उपलब्ध मनोरंजन सामग्री के दौर में आमजनमानस को साहित्य के साथ जोड़ने के उद्देश्य से फिल्ममेकर और नॉवेलिस्ट मनीष गुप्ता बड़ी ही सराहनीय पहल के साथ आगे बढ़ रहे हैं।


योरस्टोरी के साथ हुई बातचीत में मनीष ने इस बात पर ज़ोर देकर कहा कि आज लोगों के बीच भाषा को लेकर गंभीरता खत्म हो रही है, वे हिन्दी और अंग्रेजी के बीच कहीं झूल रहे हैं और यही कारण है कि साहित्य उनकी पहुँच से दूर होता जा रहा है।


न्यूयॉर्क में फिल्में बनाने और मायामी में नाइटक्लब के संचालन के बाद मनीष कुछ साल पहले जब भारत वापस लौटे तब उन्होने इस खाईं को पाटने और हिन्दी साहित्य को नए कलेवर के साथ लोगों तक पहुंचाने के उद्देश्य से हिन्दी कविता मंच की स्थापना की।


मनीष कहते हैं,

'हमारे देश में लोग हिन्दी, मराठी या अन्य भाषाएँ भी सही ढंग से क्यों नहीं बोल पा रहे हैं! हमारे यहाँ बोली जाने वाली अंग्रेजी भी औसत है, जिसमें कुल मिलाकर 300-400 शब्द ही हैं। अगर हमारे पास भाषा का ज्ञान नहीं होगा, तो हमारे सोच सकने की सीमा भी सीमित हो जाएगी।’

मनीष के अनुसार 'हमारा अन्य भाषाओं के साथ जुड़ाव, खासकर अंग्रेजी, जिसका आज अधिकतर जगह वर्चस्व हैं, ये एक हद तक जरूरी है, लेकिन हमें हमारी अपनी भाषाओं के साथ भी जुड़े बने रहना उससे कहीं अधिक जरूरी है।'


वो उस समय को भी याद करते हैं जब लोगों की दिलचस्पी उपन्यास और मैगजीन में अधिक हुआ करती थी और टीवी की पैठ आम घरों तक नहीं थी। बच्चों के हाथ में कॉमिक्स होती थीं। मनीष कहते हैं कि ‘फिर जब दूरदर्शन आया तब लोग कृषि दर्शन जैसे कार्यक्रमों को भी सारा दिन देखना पसंद करते थे। दूरदर्शन ने कई साहित्यकारों की रचनाओं पर भी सिरीज़ आदि का निर्माण किया, हालांकि उसकी क्वालिटी उतनी अच्छी नहीं थी, लेकिन उसके बाद फिर धीरे-धीरे हिन्दी साहित्य का दायरा सिकुड़ता चला गया।'


वर्तमान साहित्यकारों खासकर उपन्यास लेखकों का जिक्र करते हुए मनीष कहते हैं कि आज अधिकांश लेखक भले ही बेस्टसेलर्स हैं, लेकिन वो साहित्य को लेकर उतने गंभीर नहीं हैं, बल्कि वो आमतौर पर पल्प फिक्शन में ही उलझे हुए हैं।


मशहूर थिएटर और फिल्म अभिनेत्री सुरेखा सीकरी के साथ मनीष गुप्ता

मशहूर थिएटर और फिल्म अभिनेत्री सुरेखा सीकरी के साथ मनीष गुप्ता


ऐसी रही शुरुआत

जब मनीष ने वास्तविक हिन्दी साहित्य को आम-जनमानस तक पहुंचाने के लक्ष्य के साथ आगे बढ़ने का फैसला किया तब उन्हे उनके आस-पास मौजूद लोगों से कोई समर्थन हासिल नहीं हुआ, बल्कि लोगों ने इसका मज़ाक भी उड़ाना चाहा।


मनीष उस समय को याद करते हुए कहते हैं,

“लोग मुझे संबोधित करते हुए कहते थे कि मैं एक NRI हूँ जो आदर्शवाद लेकर घूम रहा है। इन बातों के बावजूद मैं यूं ही हार स्वीकार करके बैठना नहीं चाहता था, तो मैंने अपने निर्णय के आधार पर आगे बढ़ने का फैसला किया।”

उस समय मनीष उन लोगों से मिले जिनके भीतर साहित्य को लेकर स्वीकार्यता थी। इन लोगों में अधिकांश लोग एनएसडी जैसे कॉलेज से थे और साहित्य में अधिक दिलचस्पी रखते थे। इस तरह कई लोगों ने मनीष के सहयोग को लेकर अपनी स्वीकृति दी और मनीष अपने लक्ष्य की तरफ एक कदम और आगे बढ़ गए।


जब तमाम लोगों ने मनीष के सहयोग के लिए हामी भरी तब उन्हे यह भी समझ आया कि दरअसल अभी तक उन लोगों के पास कोई इस तरह का विचार लेकर गया ही नहीं था, जबकि उनके दिल में साहित्य को लेकर एक खास जगह है और वे आज के परिवेश में भी साहित्य को आगे बढ़ते हुए देखना चाहते हैं।


मनीष बताते हैं,

“शुरुआत में हमने अपने साथ लोगों को जुड़ने का निमंत्रण खुद ही दिया, लेकिन इस यात्रा की शुरुआत के कुछ ही समय के भीतर कई बड़े जाने-माने नाम हमारे साथ जुड़ने के लिए खुद राज़ी हो गए।”

'हिन्दी कविता' में बड़ी संख्या में कवियों ने अपने रचनाएँ प्रस्तुत की हैं, इसी के साथ साहित्य और सिनेमा से जुड़े कई बड़े कलाकारों जैसे नसीरुद्दीन शाह, मनोज बाजपेयी, इम्तियाज़ अली, वरुण ग्रोवर, मानव कौल और स्वरा भास्कर ने मंच पर अपने पसंदीदा कवियों की रचनाओं को मंच पर पढ़ा है।


कवि दुष्यंत कुमार की कविता ‘हो गई पीर पर्वत सी’ पढ़ते हुए अभिनेता मनोज बाजपेयी-




लोगों ने दिखाई दिलचस्पी

मनीष कहते हैं,

“लोग बड़े नामों को देखकर मंच पर आते हैं, लेकिन मंच पर उपलब्ध सामग्री की विस्तृत श्रंखला उन्हे अपने साथ बांधे रखती है।”

हिन्दी कविता मंच को लोगों के बीच अपनी जगह बनाने में अधिक समय नहीं लगा। हिन्दी कविता के वीडियो व्हाट्सऐप और अन्य सोशल मीडिया पर भी शेयर किए जाने लगे और मंच ने साहित्य को पसंद करने वाले लोगों के बीच अपनी एक खास जगह बना ली, लेकिन मनीष के अनुसार यह यात्रा अनवरत जारी है और देश के हर कोने तक साहित्य को लेकर जाने के उद्देश्य से आगे बढ़ रही है।


मंच की शुरुआत के साथ मनीष से बड़ी संख्या में लोगों ने संपर्क साधते हुए मंच से जुड़ने का आग्रह किया। इनमें से अधिकतर लोग इंजीनियर्स और डॉक्टर्स थे, जो साहित्य में दिलचस्पी रखते थे।


मनीष बताते हैं,

“हमने इन लोगों से उनके ही शहर में साहित्य को लेकर कुछ करने का आग्रह किया, ताकि उन शहरों से भी साहित्य का संचार हो सके और नए साहित्यकारों और कवियों को मौका मिल सके।”

इस मुहिम के आगे बढ़ने के साथ ही बड़ी तादाद में इन शहरों से लोग सामने आए और उन्होने 'हिन्दी कविता' मंच पर अपनी प्रस्तुति देने की इच्छा जाहिर की, जिसका मनीष ने दिल से स्वागत किया।


प्रोजेक्ट के बारे में बात करते हुए मनीष कहते हैं कि,

“इस मंच से वित्तीय लाभ लेने का हमारा उद्देश्य कभी नहीं रहा, लेकिन समय बीतने के साथ लोगों ने इसे बेहद पसंद किया और (हँसते हुए) अब तो लोग इसे क्लासिक भी कहने लगे हैं।”

मनीष कहते हैं,

“मैंने कई फिल्में बनाई, मैंने अमेरिका में नाइट क्लब भी चलाये इसलिए मेरी जिंदगी रंगों से भरी हुई रही है, लेकिन यहाँ जो प्यार मिला उसे शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता है।”

हिन्दी कविता के साथ ही मनीष ने उर्दू स्टूडिओ मंच की भी शुरुआत की, जिसे भारत समेत पाकिस्तान में भी खूब पहचान मिली। इसी के साथ क्षेत्रीय साहित्य को आगे लाने के उद्देश्य से छत्तीसगढ़ स्टूडिओ और पंजाबी स्टूडिओ की भी शुरुआत की। कोरोना महामारी के चलते शुरू हुए लॉकडाउन के दौरान पंजाबी स्टूडिओ में बड़ी संख्या में कलाकारों और साहित्यकारों ने लाइव प्रस्तुति दी और इस दौरान इसने भारत के साथ ही पाकिस्तान में भी खूब चर्चा बटोरी।  


हिन्दी कविता के वीडियो में कलाकार अपनी प्रस्तुति देते हुए दिखते हैं और मनीष के अनुसार इससे उन कलाकारों को भी लाभ मिलता है। हिन्दी कविता मंच पर उनकी प्रस्तुति को देखकर बड़े निर्देशक भी उन अभिनेताओं को अपने साथ जोड़ने के लिए तैयार रहते हैं और इस तरह मंच उन कलाकारों के लिए नए रास्ते भो खोल देता है।


अशोक वाजपेई की ‘कितने दिन और बचे हैं’ कविता पढ़ते हुए मनीष गुप्ता-




भविष्य की योजना

मनीष ने इस मंच के भविष्य के बारे में बात करते हुए बताया कि अब वे अन्य भाषाओं में भी इसे लेकर आगे बढ़ना चाहते हैं। आज बड़ी तादाद में लोग साहित्य से जुड़ने के लिए इस मंच की ओर आकर्षित हो रहे हैं।


मनीष मानते हैं कि वो किसी अन्य मंच के साथ प्रतियोगिता में नहीं हैं, बल्कि उनका कहना है कि

'इस समय साहित्य को बहुत अधिक समर्थन की आवश्यकता है ऐसे में जितने अधिक लोग इस मुहिम से सीधे तौर पर जुड़ सकेंगे, साहित्य के लिए उतना ही अच्छा रहेगा।'

मंच को आगे बढ़ने के लिए जरूरी फंड के बारे में बात करते हुए मनीष बताते हैं कि उन्होने अपनी सारी जमा पूंजी इसमें लगाई है, हालांकि आज कई बड़े नाम इस मंच से जुड़ने और पैसा लगाने के लिए तैयार हैं, लेकिन मनीष सिर्फ व्यापार और मुनाफे के उद्देश्य से किसी को बतौर निवेशक मंच के साथ जोड़ने को लेकर सहज नहीं हैं।


मनीष का मानना है कि साहित्य का दायरा लगातार बढ़ रहा है और आने वाले वर्षों में इसमें अपार संभावनाएं हैं। आज बड़ी तादाद में किताबों और ऑडियोबुक्स के जरिये लोगों तक साहित्य को पहुंचाने का काम किया जा रहा है, हो सकता है आने वाले समय में इसके माध्यम बदलते रहें, लेकिन साहित्य की पहुंच लोगों तक लगातार बनी रहेगी।