कैसे पुणे की इस लड़की के हाथों का हुनर बन गया सफल बिजनेस आइडिया

By Manisha Pandey
August 09, 2022, Updated on : Mon Aug 22 2022 04:17:47 GMT+0000
कैसे पुणे की इस लड़की के हाथों का हुनर बन गया सफल बिजनेस आइडिया
Ink N Bliss एक कैलिग्राफी और डिजाइन स्‍टूडियो है, जिसकी शुरुआत पूजा भागवत ने 2017 में की थी.
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नौकरी छोड़कर अपना स्‍टार्टअप शुरू करने के लिए हमेशा कोई धुंआधार बिजनेस आइडिया और ढेर सारा इन्‍वेस्‍टमेंट ही जरूरी नहीं होता. हाथों की कला और हुनर भी कई बार कमाल कर जाती है. पुणे के एक निम्‍न-मध्‍यवर्गीय परिवार में जन्‍मी पूजा के घर में कई पुश्‍तों तक कभी किसी ने चाकरी छोड़ अपना काम करने की नहीं सोची. खुद पूजा ने भी नहीं, लेकिन उनके हाथों में जादू था. वह रंग-बिरंगी कलम से कागज पर इतनी सुंदर आकृतियां बना देतीं, शब्‍दों को इस नजाकत और कलाकारी से लिखतीं कि आंखों को धोखा हो जाए. लगे कि ये लिखा नहीं, छपा हुआ है. बस यही हुनर एक दिन बिजनेस आइडिया में बदल गया और शुरुआत हुई Ink N Bliss की.  


Ink N Bliss एक कैलिग्राफी और डिजाइन स्‍टूडियो है, जिसकी शुरुआत 2017 में हुई. कैलिग्राफी एक आर्ट फॉर्म है, जिसमें रंगीन कलम से कागज पर शब्‍दों को खूबसूरत आकृतियों में ढाला जाता है. इसका इस्‍तेमाल कार्ड प्रिंटिंग से लेकर पोस्‍टर, वीडियो, फिल्‍मों और सभी तरह की एडवर्टाइजिंग में होता है. सिर्फ कागज ही नहीं, बल्कि प्‍लास्टिक, ग्‍लास, पॉटरी आदि पर भी कैलिग्राफी की जाती है. आज पूजा के पास कई परमानेंट क्‍लाइंट हैं और नए लगातार आ रहे हैं. जीरो इंवेस्‍टमेंट से शुरू हुआ स्‍टार्टअप 5 साल के भीतर खासे प्रॉफिटेबल बिजनेस में बदल गया है.   

साड़ी फॉल के कागज पर चित्र बनाने वाली लड़की

1988 में पुणे के एक निम्‍न-मध्‍यवर्गीय परिवार में पूजा का जन्‍म हुआ. पिता सरकारी दफ्तर में क्‍लर्क थे और मां हाउस वाइफ. लेकिन घर की माली हालत को देखते हुए मां साड़ी में फॉल लगाने, ब्‍लाउज और छोटे बच्‍चों के कपड़े सिलने का काम करती थीं. साड़ी फॉल के पैकेट में एक सादा पारदर्शी कागज आता है. मां पैकेट खोलकर फॉल निकालतीं और पूजा उस बचे कागज पर अपनी पेंसिल और मोम वाल रंग से कलाकारी करती. तरह-तरह के चित्र, आकृतियां. उन सुंदर आकृतियों को देख सभी सुखद आश्‍चर्य से भर जाते, तारीफ भी करते, लेकिन अंत में सवाल वही होता, जो हर बच्‍चे से पूछा जाता है, “होमवर्क का क्‍या हुआ? बहुत हो गई पेंटिंग, अब जाकर पढ़ाई करो.”


पूजा पढ़ाई में भी अच्‍छी थी, इसलिए घरवालों ने चित्र बनाने से कभी रोका नहीं. थोड़ी और बड़ी हुई तो थोड़ी जिद, थोड़े इसरार के बाद वॉटर कलर, स्‍केच कलर और सुंदर सफेद पन्‍नों वाली ड्रॉइंग बुक भी मिल गई. पूजा अखबारों से कार्टून, हीरो-हिरोइन की तस्‍वीरें देखकर उसकी हुबहू नकल उतार देती. हर वक्‍त चित्र बनाते रहने के लिए डांट तो नहीं पड़ती थी, लेकिन बहुत उत्‍साह भी नहीं बढ़ाया जाता. पूजा हंसकर कहती हैं, “घरवालों को यही राहत थी कि कम से कम घर की दीवारें मेरी चित्रकारी से बची हुई थीं.”

मुझे साइंस नहीं पढ़ना, आर्ट कॉलेज जाना है

10वीं में 86 पर्सेंट नंबर आए तो घरवालों को उम्‍मीद जगी कि बिटिया डॉक्‍टर-इंजीनियर बनेगी. लेकिन बिटिया ने ऐलान कर दिया कि मैं आर्ट कॉलेज जाऊंगी. मां ने थोड़ी नाराजगी दिखाई, फिक्र जताई. पेंटिंग सीखकर कौन सा कॅरियर बनता है भला. अंकल तो साइंस कॉलेज का फॉर्म भी ले आए थे. पिता ने भी बहुत दुनिया नहीं देखी थी. कॅरियर के नए आधुनिक विकल्‍पों का उन्‍हें कोई ज्ञान न था. लेकिन मां को धीरे से कहा, “वो जो करना चाहती है, उसे करने दो.”


पूजा ने 2005 में दसवीं के बाद पुणे के प्रतिष्ठित अभिनव कॉलेज ऑफ आर्ट्स में एडमिशन ले लिया. वो खुश थी क्‍योंकि अपने मन का काम कर रही थी. मां अब भी फिक्रमंद ही थीं क्‍योंकि घर पर दिन-रात लड़की सिर्फ चित्र बनाती रहती थी. घर में जो भी रिश्‍तेदार, मेहमान आएं, वो सब पूजा को पेंटिंग करता देख एक ही सवाल पूछें, “इस काम से पैसा मिलेगा क्‍या?”


एक समय के बाद मां का चिंता और पूजा का फ्रस्‍टेशन बढ़ने भी लगा, लेकिन वो हंसकर कहती हैं, “रिश्‍तेदारों के सवालों और तानों के बीच सिर्फ एक ही चीज ने मुझे बचा रखा था. मेरे घरवालों को लगता था कि लड़की है. कॅरियर का कुछ नहीं हुआ तो भी शादी तो हो ही जाएगी.” पूजा कहती हैं, “हमारे समाज में आज भी लड़की का कॅरियर ऑप्‍शनल ही है. वह अनिवार्यता नहीं है.”        

पढ़ाई आर्ट की और नौकरी कॉरपोरेट की

आर्ट कॉलेज से निकलने के बाद पूजा ने एक एडवर्टाइजिंग एजेंसी में नौकरी कर ली. पैसे अच्‍छे मिल रहे थे, लेकिन काम में रस नहीं था. एडवर्टाइजिंग के नाम पर जो आर्ट बनाना होता था, उसमें ब्रश, कलम और रंगों से ज्‍यादा मशीन की भ‍ूमिका थी. मानो कमाल मनुष्‍य के अपने दोनों हाथों, आंखों और मस्तिष्‍क का नहीं, बल्कि मशीन के आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस का हो. पूजा एक एडवर्टाइजिंग एजेंसी से दूसरी में जाती रहीं, लेकिन जिस रचनात्‍मक सुख की तलाश थी, वो पूरी नहीं हुई.


कंपनियां बदलती रहीं, पैसे बढ़ते रहे, इस बीच शहर भी बदल गया, लेकिन मन पहले से ज्‍यादा उदास और बेचैन रहने लगा. इस बीच पूजा ने कॉलेज के अपने एक सहपाठी से विवाह भी कर लिया. दोनों पुणे से मुंबई आकर रहने लगे. यहां पूजा DDB मुद्रा नाम की बड़ी ऐड एजेंसी में आर्ट डायरेक्‍टर बन गईं. लेकिन अब ये सवाल पहले से ज्‍यादा परेशान करने लगा कि कॉरपोरेट की नौकरी खा जाएगी. खुद को बचाना है.   

पूजा की डायरी

कॉरपोरेट की मशीनी जिंदगी से मन को थोड़ा सुकून देने के लिए पूजा अपनी डायरी में देर रात कैलिग्राफी किया करतीं. कोई सुंदर कोट, कोई कविता, शायरी या किसी किताब का अंश. वो डायरी अपने आप में एक आर्ट पीस था. एक बार ऑफिस में किसी ने नजर उस डायरी पर पड़ गई. आश्‍चर्य और खुशी का ठिकाना नहीं. जंगल की आग की तरह खबर पूरे दफ्तर में फैल गई. अब पूजा की डेस्‍क पर लोग वो डायरी देखने के लिए आते.

पहला कैलिग्राफिक असाइनमेंट

पहला कैलिग्राफिक असाइनमेंट इत्‍तेफाकन मिला था. ऑफिस में एक सहकर्मी ने पूछा, “कल छुट्टी है. मुंबई में एक इवेंट हो रहा है. उन्‍हें कैलिग्राफर की जरूरत है. कैंडल्‍स पर कुछ नाम लिखने हैं. तुम करोगी?”


पूजा ने हां कर दी और अगले दिन इवेंट वाली जगह पर पहुंच गईं. पहुंची तो पता चला कि वो मशहूर स्‍पेनिश फैशन ब्रांड मैसिमो दुत्ति का इवेंट था. उनका नया स्‍टोर खुला था. वहां एक बड़ी सी गोल मेज पर ढेर सारे रंग-बिरंगे खुशबू वाले कैंडल्‍स रखे थे. पूजा को बस इतना करना था कि आने वाले हर मेहमान का नाम उस कैंडल पर लिखना था. पूजा अपनी नाजुक, लंबी उंगलियों वाली सलोनी हथेलियों से उन कैंडल्‍स पर जिस तन्‍मयता और खूबसूरती से लोगों के नाम लिख रही थीं, उसने मेहमानों का मन मोह लिया. उनकी रुचि अब अपने उपहार से ज्‍यादा इस बात में थी कि कितनी अदा से उनका नाम मोमबत्‍ती पर उकेरा गया है.


पूजा ने उस शाम 200 कैंडल्‍स पर नाम लिखे. शाम खत्‍म होते-होते उंगलियां सुन्‍न पड़ गई थीं, लेकिन मन में अजीब सी खुशी और सुकून था. शाम बहुत अच्‍छी गुजरी. लेकिन उससे भी ज्‍यादा अच्‍छा तब लगा, जब इवेंट खत्‍म होने के बाद उनके हाथ में पेमेंट का चेक आया. एक शाम में पूजा ने उतने पैसे कमाए थे, जितनी उस वक्‍त उनकी महीने की तंख्‍वाह थी.


पूजा को अपना रास्‍ता मिल गया था. यही तो करना था उसे. अपने मन का, अपने सुख का काम.

इंक एंड ब्लिस की शुरुआत

वह 2016 की एक शाम थी और ठीक एक साल बाद नौकरी छोड़कर पूजा इंक एंड ब्लिस की शुरुआत कर चुकी थीं. डर तब भी था कि इस तरह सरवाइवल मुमकिन होगा या नहीं. नौकरी में थोड़ी गारंटी तो होती है. महीने के अंत में बंधी-बंधाई तंख्‍वाह आती है. ऐसे काम का क्‍या भरोसा. आया तो बहुत आया, नहीं आया तो बिलकुल सन्‍नाटा. लेकिन पूजा ने अगले चार महीने के खर्च लायक पैसे बचाकर रिस्‍क लेने की ठान ली थी.


शुरुआत अपना इंस्‍टाग्राम पेज बनाने से हुई. उस पेज पर उन्‍होंने अपना काम पोस्‍ट करना शुरू किया. हुनर के चर्चे होने लगे. बात फैलने लगी. पूजा के पास कैलिग्राफी के छोटे-छोटे असाइनमेंट आने लगे. किसी को अपनी गर्लफ्रेंड के लिए बर्थडे कार्ड लिखवाना होता, किसी को अपने पिता के रिटायरमेंट पर कोई नोट. इंडीविजुअल क्‍लाइंट धीरे-धीरे बड़े कॉरपोरेट क्‍लाइंट्स में बदलते चले गए. बल्‍क में ऑर्डर आने लगे. कभी एक साथ 500 कार्ड्स का ऑर्डर आ जाता. इतना काम आने लगा कि पूजा को दूसरे कैलिग्राफर्स को हायर करना पड़ा.


आज इंक एंड ब्लिस की अपनी वेबसाइट है. अब उनका काम ज्‍यादा व्‍यवस्थित ढंग से हो रहा है. वेबसाइट पर बाकायदे एक स्‍ट्रक्‍चर्ड प्राइस लिस्‍ट है. कितने शब्‍दों का कितना पैसा. पूजा किताबों के कवर, प्रोडक्‍ट्स के मास्‍टहेड, नाम वगैरह भी डिजाइन कर रही हैं. उन्‍होंने एक छोटा सा होम स्‍टूडियो बनाया है. जल्‍द ही काम इतना बढ़ने की संभावना है कि होम स्‍टूडियो से मैनेज करना मुश्किल होगा.  


पूजा से बात करो तो लगता नहीं कि उसमें बिजनेस का हुनर है. बातों में सरलता और आंखों में ईमानदारी. खुशी हाथों से काम करके मिलती है. अपनी कहानी सुनाते हुए एक जगह पूजा कहती हैं कि बात सिर्फ पेंटिंग करने, चित्र बनाने की नहीं थी. बात हाथों और उंगलियों के साथ मन के रिश्‍ते की थी. बचपन से मां को हाथ से काम करते देखा. साड़ी में फॉल लगाना, छोटे बच्‍चों के कपड़े, ब्‍लाउज सिलना. सूई, धागे के साथ उनके हाथ और उंगलियों का बड़ा आत्‍मीय रिश्‍ता था. जैसे दोनों एक-दूसरे के इशारों पर चलते हों. काम तो बहुत सारे होते हैं, बहुत सारे काम में बहुत सारा पैसा भी होता है, लेकिन हाथ के काम की बात ही अलग है. यह मेडिटेशन की तरह है. यह सुख है.