हवा में जितनी CO2 आज है, इतिहास में कभी नहीं थी; क्या हम खुद को और पृथ्वी को बचा पाएँगे?

इस साल मई में कार्बन डायऑक्साइड की मात्रा 421 ppm तक पहुँच गयी. पिछले 25 लाख साल में ऐसा नहीं हुआ था.

हवा में जितनी CO2 आज है,  इतिहास में कभी नहीं थी; क्या हम खुद को और पृथ्वी को बचा पाएँगे?

Tuesday June 07, 2022,

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इतनी ज़हरीली कभी नहीं थी हवा 

हवाई में स्थित Mauna Loa Atmospheric Baseline Observatory की रिपोर्ट के मुताबिक़ इस साल मई में कार्बन डायऑक्साइड की मात्रा 421 पार्ट्स पर मिलियन [ppm] काउंट की गयी. हवाओं में कार्बन डायऑक्साइड की इतनी मात्रा मानव इतिहास में कभी और नहीं पायी गयी. यह मात्रा  औद्योगिकीकरण के पूर्व के वक़्त से 50 प्रतिशत जयादा है. तब से आज तक हमने लगभग 1.6 लाख करोड़ टन कार्बन डायऑक्साइड उत्पन्न किया है जो हज़ारों सालों तक अपना प्रभाव दिखाती रहेगी. आज से पहले आख़िरी बार कार्बन डायऑक्साइड स्तर 400 ppm के आस-पास  Pliocene युग में यानि 25 लाख से 50 लाख साल पहले था. उस वक़्त का तापमान आज से 2-3 डिग्री ज्यादा था और तब सी-लेवल 25 मीटर हुआ करता था. इतना सी-लेवल आज होता तो कई आधुनिक शहर डूब जाते. यही वह वक़्त था जब उत्तरी और दक्षिणी ध्रुवों के आसपास बर्फ जमा होना शुरू हुई थी और बहुत सारे ग्लेशिअर्स बने थे. यानि पृथ्वी के इतिहास में ऐसा दौर रहा है जब बिना फैक्टरियों, गाड़ियों और फ़ॉसिल फ़्यूल के भी कार्बन डायऑक्साइड का स्तर ज़हरीला था लेकिन उसके बाद पृथ्वी पर हवा फिर से स्वच्छ हो गयी क्यूँकि आज के जैसे उद्योग नहीं थे. 


क्या होता है कार्बन डायऑक्साइड का स्तर बढ़ने से? 

ग्लोबल वार्मिंग का एक प्रमुख कारण वातावरण में कार्बन डायऑक्साइड का अप्रत्याशित तरीके से बढ़ना है. और ग्लोबल वार्मिंग के परिणाम हैं – बेतहाशा गर्मी, सूखा, वन्यजीवन का खतरे में पड़ना और चक्रवाती तूफ़ानों की तीव्रता का बढ़ना. कोई भूल नहीं सकता कि कैसे कटरीना हरिकेन की 19 फुट लहरों ने अमेरिका के न्यू ओरलियोन शहर में दीवारों और घरों को बहा दिया था. 1800 लोगों की जानें गयी थी और लाखों लोग विस्थापित हो गए थे. भारत में सूनामी का विध्वंस ऐसा था कि अब वह शब्द बर्बादी के अर्थ में काम आने लगा है. वैज्ञानिकों का मानना है की अगर CO2 की इमिशन नहीं घटी तो आर्कटिक वार्मिंग और परमाफ्रॉस्ट के गायब हो जाने की वजह से कार्बन डायऑक्साइड और मीथेन गैस की इमिशन और बढ़ेगी जिसके ख़तरनाक प्रभाव का  अभी हम अंदाजा भी नहीं लगा सकते.


कार्बन डायऑक्साइड मुख्यतः दो कारणों से पैदा होती है: फॉसिल फ्यूल, ऑइल और गैस के जलाने से और ज्वालामुखी के विस्फोट से. उद्योगों जैसे पॉवर प्लांट्स, मोटर-गाड़ियाँ, कृषि, सीमेंट उत्पादक फैक्टरियाँ में फॉसिल फ्यूल का अंधाधुंध उपयोग ग्लोबिंग वार्मिंग का प्रमुख कारण है. 

कार्बन डायऑक्साइड ग्रीनहाउस गैस है जो धरती से उठने वाले रेडिएशन को स्पेस में पहुँचने से रोक देता है. नतीजन धरती का तापमान धीरे-धीरे बढ़ता जाता है. यह प्रकिया ग्लोबल वार्मिंग के प्रमुख कारणों में से एक है. यह ठीक वैसा ही है जैसे अगर आप एक जलती हुई लैंप या फर्नेस के सामने खड़े होते हैं तो उनसे निकलने वाली गर्मी आप देख तो नहीं सकते लेकिन महसूस जरूर करते हैं. हमारे वातावरण में फंसे यह ग्रीनहाउस गैस की वजह से सी-लेवल बढ़ता है, सी-सरफेस टेम्प्रेचर बढ़ता है, सुखा पड़ता है, सी-वाटर एसिडिक होता है और धरती गरम होती जाती है. 

कैसे बचेंगे हम और यह पृथ्वी जो हम सब का घर है

पर्यावरण, धरती और प्रक्रति को बचान के लिए कुछ सख्त कदम उठाने होंगे. वैज्ञानिको का मत है सबसे कारगर कदम हमारे एनर्जी सिस्टम में रिफार्म लाना रहेगा. विश्व के तमाम देशों को “ज़ीरो-इमिशन” पालिसी को अपनाना होगा. हमें ग्रीन एनर्जी, वैकल्पिक यातायात, पर्यावरण-संवेदी जीवन शैली और उद्योगों के लिए वनों का कटाव न करना कुछ ऐसे उपाय हैं. लेकिन फ़िलहाल बहुत-सी कोशिश तो हवा को इंसानों के साँस लेने लायक़ बचाये रखने की है और वह अपने में एक बहुत बड़ा काम है.