भिखारियों को उद्यमी बना रहा है वाराणसी का यह स्टार्टअप: उनके काम से प्रेरित कुछ सोच-विचार राज्य, क़ानून, पूँजी और भिक्षावृत्ति के बारे में

भिक्षावृत्ति का आधुनिक इतिहास राज्य, क़ानून और पूँजी द्वारा स्वाधीन चेतना वाले श्रमिक को ‘आवारा’ और ‘अपराधी’ के रूप में चित्रित करने का आख्यान है. शर्म, विवशता और भर्त्सना की इस कथा में उद्यमिता की क्या भूमिका हो सकती है?

भिखारियों को उद्यमी बना रहा है वाराणसी का यह स्टार्टअप: उनके काम से प्रेरित कुछ सोच-विचार राज्य, क़ानून, पूँजी और भिक्षावृत्ति के बारे में

Tuesday August 30, 2022,

22 min Read

(नोट: इस आलेख के तीन हिस्से हैं: पहला भिखारियों के प्रति मध्यवर्गीय प्रतिक्रिया को व्यक्त करता है, दूसरा वाराणसी के एक अनोखे स्टार्टअप ‘बेगर्स कॉर्पोरेशन’ के काम के बारे में उसके संस्थापक चंद्र मिश्र से बातचीत है और तीसरा, जो पाँच उप-अध्यायों में फैला है, भिक्षावृत्ति के संबंध में चौदहवीं सदी के इंग्लैंड से आज के भारत तक राज्य, क़ानून और पूँजी की कथा कहता है)

वह जो किसी को भीख माँगते न देख सके और खुद दर-ब-दर भीख माँगे वह मैं हूँ.

-मिर्ज़ा असदुल्लाह खाँ “ग़ालिब”, अपने एक ख़त में

हम जब भिखारियों को देखते हैं तो क्या सोचते हैं?

“इनको हमारी ज़रूरत है!.”

उनका झुका व्यक्तित्व, बेचमक आंखें और भूखी काया देखकर बरबस ही हमारा हाथ अपने पैंट की पॉकेट या पर्स में जाकर कुछ सिक्के निकाल कर उनके हाथ में रख देता है. दोनों हाथों का मिलना, वह क्षण जिसमें हमारी कई तरह की ग़ैर-बराबरियाँ दर्ज होती हैं, और उसके बाद हमारे कदमों का उन्हें पीछे छोड़ते हुए आगे बढ़ जाना, इस एहसास के साथ कि आज ‘मैंने’ कुछ अच्छा किया, हमारे बारे में कुछ और भी कहता है.

खुद से कुछ अच्छा करने की चाहत में हम कई बार इंसानों और जानवरों के भेद को भी भूल जाते हैं. यह सही है कि जानवर और मनुष्य में इतना ही फ़र्क है कि मनुष्य सामाजिक है, और पशु नहीं. पर मनुष्य पशु नहीं है. रोटी के टुकड़े, कुछ चिल्लर, अपने प्लेट में बची जूठन, और हमारे सालों तक पहने हुए कपड़ों का दान; मनुष्य और पशु के भेद को मिटाने के लिए काफी नहीं है. उत्थान का एक दूसरा पहलू भी हो सकता है जिसमे इंसानों को उनके पेट और शरीर से इतर देखने की कोशिश होती है.

हममें से कई लोगों का यह मानना है जो भीख मांगते हैं वो खुद ही काम नहीं करना चाहते. अपने हालात के लिए वो खुद ही ज़िम्मेदार हैं. ऐसा हो ही सकता है. पर यह तो भिखारियों के व्यवहार और दृष्टिकोण की बात हो गयी कि वो कैसे हैं और कितने गलत हैं.

पर हमारा क्या?

क्या हमने कभी उन्हें काम देने की कोशिश की है? हमें कैसे इतनी पुख़्तगी से पता है कि भिखारी आलसी होते हैं या बहुत अमीर होते हैं वगैरह वगैरह.

मगर एक कोशिश है, वाराणसी के चन्द्र मिश्र की, जिन्होंने इंसान को जानवर न समझने की कोशिश की. वे अपनी संस्था के जरिये अपनी कोशिशों से इस भेद को मिटाने के साथ-साथ बनारस के भिखारियों को सम्मानपूर्वक जीवन जीने के गुर भी सिखा रहे हैं.

वाराणसी एक प्राचीन शहर होने के साथ-साथ प्रधानमंत्री मोदी का लोकसभा क्षेत्र भी है. यहां विश्वप्रसिद्ध काशी विश्वनाथ मंदिर है. जहां धर्म होता है, वहां अक्सर भिखारी भी होते हैं. लेकिन धर्म, कर्म से परिपूर्ण होता है. कहा भी गया है- “उद्यमेन ही सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथै:” अर्थात् कार्य की सिद्धि केवल इच्छा से नहीं वरन् कठिन परिश्रम से होती है.

कर्म एक अजीबोगरीब वस्तु है, क्योंकि यह जीवित व्यक्तियों का एक गुण है, क्योंकि अपने जीवित शरीर में मनुष्य स्वयं इसका स्वामी होता है. भिखारियों को दान देकर कहीं न कहीं हम उनके जीवन की सबसे मूल्यवान चीज़ से उनको बेदखल कर रहे होते हैं.

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एक स्टार्टअप भिखारियों के लिए: बेगर्स कॉर्पोरेशन और चंद्र मिश्र

हम उस देश के वासी हैं जहां ग़ैर-बराबरियाँ हर वक़्त मुंह बाए खड़ी रहती हैं. विश्व की 5वीं सबसे बड़ी इकॉनमी वाला देश भारत ग़ैर-बराबरी में विश्व में दूसरे पायदान पर है, जहां टॉप के 1 प्रतिशत के पास देश की 58.4 प्रतिशत संपत्ति है. और 80 प्रतिशत जनता के पास देश की कुल 1 प्रतिशत संपत्ति है. ऐसे देश में भीख मांगने का पेशा होगा ही और दान देने की परंपरा चलती ही रहेगी. बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन और रोहिणी निलेकनी फाउंडेशन की 2017 की रिपोर्ट के मुताबिक़ भारतीय 34,242 करोड़ रुपये दान करते हैं. लेकिन मानव श्रम कभी भी सिर्फ ‘आर्थिक’ या ‘व्यावसायिक’ नहीं होता, वह एक नैतिक और सांस्कृतिक पहचान भी होता है.

‘बेगर्स कॉरपोरेशन’ की टैगलाइन - Don't Donate, Do Invest (दान मत कीजिए, निवेश कीजिए) - श्रम या कर्म की संस्कृति को परिपूर्ण करने का काम कर रही है. विकट शारीरिक या मानसिक बाधा न हो तो हर कोई काम कर सकता है. जरुरत है काम के लिए संभावनाएं इजाद करने की. ‘बेगर्स कॉरपोरेशन’ उन्हीं संभावनाओं को तलाशने और बनाने के प्रयास का नाम है; सड़क पर भीख मांगते हुए भिखारियों का कौशल विकास कर उन्हें अपने लिए रोजगार और सम्मानपूर्ण सामाजिक पहचान हासिल करने में सहयोग करने के प्रयास का नाम है.

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योरस्टोरी हिंदी ने चन्द्र मिश्र से उनके और भिखारियों को सशक्त बनाने के उनके इस महत्त्वपूर्ण और प्रेरक प्रयास के बारे में बात की. पेश हैं उस बातचीत के कुछ महत्त्वपूर्ण पहलू.

प्रेरणा भारद्वाज: रोज़गार या आर्थिक सशक्तिकरण को लेकर इतनी संवेदनशीलता क्यों?

चन्द्र मिश्र: 2020 के कोविड लॉकडाउन के दौरान रोज़गार हमारे जीवन जीने की शर्त बन गया था. लोगों की छंटनी किये जाने की, प्रवासी मजदूरों को वापस पाने घर भेजे दिए जाने की खबरें लगातार आ रही थी. तभी मैंने फेसबुक पर रोज़गार को लेकर एक सर्वे लॉन्च किया. उस सर्वे में 27 हज़ार युवाओं ने हिस्सा लिया. मैंने वाराणसी के कलेक्टर को पत्र लिख कर उनसे दरख़्वास्त की कि अगर वो सपोर्ट करें तो वाराणसी में मैं क़रीब १ लाख जॉब्स क्रिएट कर सकता हूं. कुछ एक महीने बाद, ट्विटर पर बेरोज़गारी पर एक चर्चा चलाई, जिसमें भी लोगों का पार्टिसिपेशन अच्छा था. पर जिला प्रशासन की तरफ से कोई खबर नहीं आई.

मैं खुद ही वाराणसी गया. विश्वनाथ के दर्शन से पहले भिखारियों के दर्शन हुए. गंगा-आरती के वक़्त 200-300 मीटर लम्बी भिखारियों की कतारें दिखीं. अगली सुबह जब विश्वनाथ मंदिर पहुंचा तो मंदिर के सामने भीख मांगती एक औरत दिखी, उन्हीं से बातचीत की शुरुआत की. शारीरिक रूप से अक्षम एक व्यक्ति दिखा और भगवान् शिव के बाने में भीख मांगता एक बच्चा भी दिखा. इस दृश्य के साथ ही शायद मेरी यात्रा की शुरुआत हो चुकी थी.

पर वे तैयार नहीं थे.

प्रेरणा भारद्वाज: अगर अपने हालात बदलने को लेकर वे खुद तैयार नहीं हुए, तो आपने यह राह कैसी बनाई?

चन्द्र मिश्र: मैंने काशी की तंग गलियों के दुकानदारों के बीच एक सिग्नेचर कैम्पेन शुरू किया. इस मेमोरैंडम में काशी को भिखारी-मुक्त बनाने की अपील थी. इस मेमोरैंडम को माननीय प्रधानमंत्री के दफ़्तर भी भेजा. वहां से भी निराशा हाथ लगी.

लेकिन इस बीच भिखारियों को उठाने की घटनाएं हुईं. और तब उन में से कुछ ने मुझसे संपर्क किया. वहां से असल में बातचीत शुरू हुई.

प्रेरणा भारद्वाज: समाज के किसी भी निचले तबके में आने वाले लोगों से बात करने पर कहीं न कहीं उनके अस्तित्व, उनकी उपयोगिता पर बात करनी ही पड़ती है, जो कहने के साथ-साथ सुनने में बेहद तकलीफदेह होती है. यह बातचीत कैसे संभव हुई?

चन्द्र मिश्र: कहीं न कहीं उन्हें उनका ‘सच’ दिखाने की जरुरत पड़ी ही. और वो समझते हैं यह सब. भीख नहीं मांगना नहीं चाहते, पर काम नहीं करना चाहते. आर्थिक परिस्थितियों और भविष्य को लेकर सभी जागरूक होते हैं. ये भी थे. मैंने उन्हें याद दिलाया कि उनकी आमदनी पर सब कुछ का, राजनीति, शहर, महामारी यहां तक कि मौसम का कंट्रोल है, सिर्फ़ उनका नहीं. ख़राब मौसम या कोविड के दौरान उनका काम ठप पड़ जाता है. बच्चों को यह ज़िन्दगी नहीं देनी है इस पर भी सबकी सहमति थी. क्योंकि अगर वर्तमान पर नहीं भी हो, भविष्य पर तो सबका बराबर का हक़ है.

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उस भविष्य की दिशा में अगले ही कुछ दिनों में मैंने घाट पर बच्चों को पढ़ना शुरू किया. कुछ वॉलंटियर्स जुड़े. कुछ समय बाद, उनके माता-पिता भी जुड़े. उन्हीं में कुछ के साथ बात करके पहला बैच शुरू किया. अब यह स्कूल ‘स्कूल ऑफ़ लाइफ़’ के नाम से जाना जाता है.

प्रेरणा भारद्वाज: ‘बेगर्स कॉरपोरेशन’ ऐसे ही वुजूद में आ गई? किस तरह के चैलेंजेज का सामना हुआ?

चन्द्र मिश्र: नाम तो ‘बेगर्स कॉरपोरेशन’ है, पर मैं योरस्टोरी के माध्यम से यह बात कहना चाहता हूं कि इस काम की पूरी परिकल्पना स्टार्ट-अप की है. पहला है काम करने का एटिट्यूड, जो स्टार्ट अप की पहली कंडीशन होती है. दूसरा, ट्रेनिंग प्रोग्राम्स चलाये जाते हैं, जिससे काम में बेहतर करने, इनोवेट करने का कॉनफ़िडेंस आता है. और तीसरा अपने बनाए हुए प्रोडक्ट्स को मार्केट में उतार उससे रेवेन्यु जेनेरेट करना. ‘बेगर्स कॉरपोरेशन’ इन तीनो चीजों को कर रहा है.

‘बेगर्स कॉरपोरेशन’ की स्थापना जनवरी 2021 में हुई थी हम इसे वाराणसी के एक सामाजिक संगठन ‘कॉमन मैन ट्रस्ट’ के तहत चला रहे हैं.

प्रेरणा भारद्वाज: ‘कॉमन मैन ट्रस्ट’ नाम बहुत दिलचस्प है, इसके पीछे की कोई कहानी है?

चन्द्र मिश्र: मैं ओडिशा से हूं. आप जो कर रही हैं, लम्बे समय तक मैंने भी वही किया. अपने पत्रकारिता के दिनों में हम ‘सिटिजन जर्नल’ चलाते थे, जिसमें हम प्रतिदिन आम लोगों से उनकी जगहों से उनके मुद्दे पर खबर लिखने को कहते और उसे छापते भी थे. कॉमन मैन के साथ ट्रस्ट तब से ही है, अब इसने इस ‘ट्रस्ट’ का रूप ले लिया है.

प्रेरणा भारद्वाज: क्या प्रोडक्ट्स बनाये जाते हैं, उनकी क्या विशेषता है? कहां बेचे जाते हैं?

चन्द्र मिश्र: हम कपड़े के बैग्स बनाते हैं. हमारे शहर की गंगा को सबसे बड़ा खतरा प्लास्टिक से है. लाखों श्रद्धालु काशी आते हैं, पूजा-पाठ का सामान कैरी करने के लिए आमतौर पर प्लास्टिक की पन्नियों को इस्तेमाल में लाया जाता है. इसे ध्यान में रखते हुए हम कपडे के बैग्स बनाते हैं. ‘वेजिटेबल बैग्स, ‘बुक बैग्स,’ ‘लैपटॉप बैग्स’, ‘कॉन्फ्रेंस बैग’ इत्यादि. इनकी खपत आम लोगों के साथ-साथ, बहुराष्ट्रीय कंपनियों और वाराणसी के होटलों में भी हो रही है.

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वाराणसी में प्रतिदिन 25 हज़ार बैग्स की डिमांड है. हम 1 हज़ार बैग्स हर दिन बना रहे हैं. कॉरपोरेशन का लक्ष्य इस सेगमेंट में डेली डीमांड की आपूर्ति करना है.

प्रेरणा भारद्वाज: लोगों की संख्या से सफलता का आंकलन करना सही नहीं है, लेकिन फिर भी यह बताएं आज इसमें कितने लोग काम कर रहे हैं? और कितने लोगों को जोड़ना है, भविष्य की क्या योजनाएं हैं?

चन्द्र मिश्र: फिलहाल, 12 परिवारों के 55 भिखारी कोर्पोरेशन के साथ हैं. ‘बेगर्स कॉरपोरेशन’ ‘फॉर प्रॉफिट’ के तहत रजिस्टर हो चुका है. “दान नहीं देना है, काम देना है” के मोटो को वाराणसी के ‘बेगर्स कॉरपोरेशन’ के माध्यम से पूरे देश के लिए मॉडल बनाना है.

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भविष्य में “लिविंग रुद्राक्ष” नामक एक कैम्पेन चलाना है. योरस्टोरी के माध्यम से मैं यह बात लोगों तक पहुंचाना चाहता हूं कि वे “लिविंग रुद्राक्ष” प्रोजेक्ट में इन्वेस्ट करके भिखारियों को ऑन्त्रप्रेन्योर बना कर पुण्य कमा सकते हैं. जैसे रुद्राक्ष की माला में 108 रुद्राक्ष होते हैं वैसे हम 108 लोगों से अपील करते हैं कि वो इसमें 2 साल तक इन्वेस्ट करें. और दो साल बाद अपना लगाया हुआ पैसा वापस ले जाएं.

मैं यह समझता हूं कि 7,500 करोड़ रुपये में भारत को भिखारी-रहित किया जा सकता है. और हम यह एक समाज के तौर पर हासिल कर सकते हैं. अलग से कुछ खर्च करने की जरुरत नहीं है, हम डोनेशन में जितना खर्च करते हैं उसका मात्र 25 प्रतिशत भी अगर सोशल इम्पैक्ट इन्वेस्टमेंट में इन्वेस्ट करें तो भारत से भिखारी प्रथा का उन्मूलन किया जा सकता है. मैं अपनी बात एन इसाबेल थैकरे रिची के उपन्यास ‘मिसेज दाइमोंड’ की एक बात से ख़त्म करना चाहूंगा कि “अगर आप एक मनुष्य को एक मछली देते हैं, वो कुछ घंटों में फिर भूख का शिकार हो जायेगा. लेकिन अगर आप उसको मछली पकड़ना सिखा देते हैं तो आप उसके लिए बहुत कुछ कर गुज़रते हैं.” ऑन्त्रप्रेन्योरशिप की स्पिरिट यही होती है जिसके लिए हम प्रयासरत हैं.

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क्रिएटिव: सोनाक्षी सिंह

कौन होता है भिखारी?

भिखारी होना मनुष्य होने की, अस्तित्व की किस सम्भावना को व्यक्त करता है?

भिखारियों को देखते ही, या उनके बारे में सोचते हुए हम अक्षमता और श्रम, चयन और विवशता, शर्म और आत्म-सम्मान, समाजिकता और अपराध के बारे में सोचते हैं. सोचने की यह बाइनरी श्रेणियाँ एक भिखारी को ऐसे मनुष्य के तौर पर देखती है जो या तो इस अर्थ में अक्षम है कि उसमें कौशल का अभाव है या इस अर्थ में विवश है कि वह शारीरिक श्रम नहीं कर सकता, विकलांग है. दूसरी तरह के भिखारियों के भिखारी होने को हम सहानुभूति या दया-जन्य औचित्य प्रदान कर देते हैं, और लगभग उसी तर्क से पहली तरह के भिखारियों को हम भर्त्सना से भाव से देखते हैं. भर्त्सना का स्रोत उनके कौशल के अभाव से नहीं कौशल अर्जित करने का प्रयत्न न करने से, श्रम न करने के चयन के प्रति होता है. चयन का एक और प्रकार उस भर्त्सना को तीखा करता है और वह चयन है शर्म को त्यागने का, श्रम की सामाजिकता को त्यागने का, अपने आत्म सम्मान को त्यागने का.

हमारे लिए भर्त्सना का अधिकारी वह भिखारी है जो चयनपूर्वक भिखारी है - जो चयनपूर्वक श्रम करने से इंकार करता है, जो चयनपूर्वक समाजिकता और (आत्म)-सम्मान का त्याग करता है. भर्त्सना उस भिखारी के प्रति भी व्यक्त होती है जिसके बारे में हमें संदेह होता है कि वह एक अपराधी है. लेकिन चयनपूर्वक ‘बेकार', ‘बेशर्म’, ‘निठल्ला’, ‘आत्महीन’ होने के प्रति व्यक्त होने वाली हमारी भर्त्सना ‘अपराधी’ होने के प्रति हमारी भर्त्सना से भिन्न भी होती है और कम तीखी भी.

लेकिन क्यों?

शायद इसलिए कि जो चयनपूर्वक भिखारी है, वह हमारे अपने जीवन के सबसे बुनियादी अभाव, उससे उत्पन्न विवशता और उसके परिणमास्वरूप मिले अलगाव को उजागर कर देता है. अपने श्रम के उपयोग में चयन का अभाव, उस श्रम के मूल्य निर्धारण में हमारी कोई भूमिका नहीं होने की विवशता और उस ‘बेमन' से किए श्रम से मुआवज़े की तरह अर्जित हमारी सामाजिक पहचान को (आत्म)-सम्मान की तरह देखने की प्रक्रिया में उपजा अलगाव - जिसे संसार में पहली बार कार्ल मार्क्स ने अपने अभूतपूर्व विश्लेषण में पहचाना था.

जो चयनपूर्वक भिखारी है, वह श्रम और उसकी (अर्थ)-व्यवस्था से मुक्त है. यूँ ही भिखारी अक्सर संसार, अस्तित्व और पैसे के बारे में मुक्त भाव से गाते हुए नहीं मिलते, अगर आप उन्हें गाते हुए देखकर पैसे देते हैं तो आप उनके श्रम [गायन] का नहीं अपने अलगाव का अतिरिक्त मूल्य चुका रहे होते हैं.

लेकिन यह सब अर्थ-लीला भिखारी को अपराधी मानते ही ग़ायब हो जाती है. और ऐसा होना स्वाभाविक है क्यूँकि एक भिखारी के बारे में, भीख माँगने के ‘कर्म’ के बारे में हमारी यह समूची समकालीन, ‘आधुनिक’ प्रतिक्रिया दरअसल अपराध, क़ानून, राज्य और मुनाफ़ा पूँजी की ऐसी कथा है जिसने पिछले छह सौ सालों में भिक्षावृत्ति को एक ‘दंडनीय अपराध’ की तरह परिभाषित किया है.

वरना ऐसा क्यूँ होता कि विद्यार्थियों, सन्यासियों और ब्राह्मणों के भिक्षा माँगकर जीवन यापन करने को एक चयन, एक मूल्य की तरह देखने वाली दुनिया, बुद्ध के उपदेश से भिक्षुक बनने वालों के चयन को सम्मान देने वाली दुनिया, भिखारियों और अजनबियों को देवता Zeus का भेजा प्राणी मान कर आतिथ्य और सत्कार देने वाली दुनिया, यीशू की चरम निर्धनता को उनके देवत्व की निशानी मानने वाली दुनिया, उससे प्रेरित फ्रांसिसकन और मेंडिकेंट भिखारियों के भिक्षा-चयन और भिक्षा-गर्व को स्वीकार करने वाली दुनिया, घर-बार छोड़ कर गीत गाते बंजारों, फ़क़ीरों, मलंगो में काया और जीवन के जंजाल से मुक्ति की राह देखने वाली दुनिया आधुनिक समय में भिखारियों को ‘बेकार', ‘बेशर्म’, ‘निठल्ला’, ‘आवारा’ और ‘अपराधी’ मानने लगी?

यह आधुनिक कथा यद्यपि पूर्णतः आधुनिक नहीं है. प्लेटो के ‘रिपब्लिक’ में भिखारियों को अपराधियों के साथ एक श्रेणी में रखा गया था हालाँकि प्राचीन ग्रीस में भिखारियों के बारे में सम्मान और भर्त्सना दोनों तरह के सामाजिक व्यवहार प्रचलित थे. दास अर्थव्यवस्था [slave economy] पर टिकी प्राचीन यूरोपीय सभ्यताओं में भिखारी ‘free-born' और नागरिक थे, इसलिए उनके प्रति घृणा और उनके मानव अधिकारों के प्रति स्वीकृत सामाजिक अवमानना वैसी नहीं थी जैसी दासों के प्रति थी.

भिखारियों के प्रति दृष्टिकोण की आधुनिक, राज्य और उसके क़ानून द्वारा निर्देशित लेकिन पूँजी द्वारा नियंत्रित कहानी भी यूरोप में ही शुरू होती है. इसके लिए हमें चौदहवीं शताब्दी में जाना पड़ेगा.

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प्लेग से प्लेग तक: श्रम, चयन और क़ानून

1394 में इंग्लैंड में भिक्षावृत्ति के बारे में पहला क़ानून - “Statute of Labourers” - पारित किया गया. दिलचस्प यह है कि इसमें भिक्षा माँगने वाले को नहीं, भिक्षा देने वाले को दंड देने का प्रावधान था. प्लेग और किसानों के शहरों की ओर विस्थापन के बाद, देहात में मज़दूरों की कमी के कारण ज़मींदारों के हितों की रक्षा के लिए यह क़ानून बना था जिसका उद्देश्य था हर सक्षम शरीर वाले व्यक्ति को बलपूर्वक श्रम के लिए विवश करना.

चौदहवीं शताब्दी के इंग्लैंड में बलपूर्वक श्रम के मुक़ाबले चयनपूर्वक माँगने वाले भिखारी हुए थे.

सामंती अर्थव्यवस्था और उसकी सामाजिक संरचना से बच कर भागने वाले श्रमिकों को ‘आवारा’ [vagrant] कहा जाने लगा और “Statute of Labourers” के दायरों को सोलहवीं शताब्दी के शुरू में फैलाकर उनके तहत भिक्षा देने वालों की जगह हर उस व्यक्ति को दंडनीय घोषित कर दिया गया जो “निठल्ला है और जिसे यह नहीं पता कि वह अपनी आजीविका कैसे कमाएगा”. इतिहासकारों का मानना है कि vagrancy से सम्बंधित क़ानून श्रमिकों के ‘आवारापन’ यानि उनके सामंती व्यवस्था से विस्थापित हो कर शहर जाने को रोकने के लिए बनाए गए थे. इसे ऐन हमारे दौर के साथ रखकर देखना दिलचस्प होगा जिसमें श्रमिक नहीं, अमेरिकी और यूरोपीय पूँजी एक दूसरे अर्थ में ‘आवारा’ हो गयी है और सस्ते श्रम की तलाश में तीसरी दुनिया जा रही है.

अगले दो सौ साल में इंग्लैंड और उसकी ही तरह फ़्रांस और अन्य यूरोपीय देशों में vagrancy क़ानून नए-नए रूपों में दंड के दायरे को और फैलाते गये, दंड को और कठोर बनाते गये और दंड देने की प्रक्रिया को पूरी तरह मनमानी बनाते गये. सत्रहवीं शताब्दी में सूखे और युद्ध के कारण उत्पन्न श्रम की कमी से निपटने के लिए स्थानीय प्रशासनों को अपने अपने जिले से उन सब ‘बाहरी’, ‘अजनबी’ लोगों को निर्वासित करने के आदेश दे दिए गए जो उनसे मदद माँगने आएँ. अठारहवीं शताब्दी के मध्य में हर उस व्यक्ति को गिरफ़्तार करके बलपूर्वक श्रम में लगा दिया जाने लगा जो किसी “सराय, शराबखाने, घर या खुले आसमान के नीचे भटकता हुआ पाया जाए और जो अपनी कोई ठीक पहचान न बता पाएँ”. बिना कोई अपराध किए, सिर्फ़ करने की सम्भावना का संदेह होने पर गिरफ़्तारी और दंड की व्यवस्था तो उससे पिछले शताब्दी में ही हो चुकी थी.

लेकिन ऐसे मनमाने और शोषण आधारित क़ानूनों के बावजूद इंग्लैंड में ‘आवारा’ लोगों की संख्या बढ़ती जा रही थी. एक सरकारी रिपोर्ट ने उन्नीसवीं शताब्दी के शुरू में बताया कि तमाम सख़्त क़ानूनों के बावजूद ‘आवारों’ और भिखारियों की संख्या बेहद बढ़ गयी है. और तब 1824 में “The Vagrancy Act of 1824” पारित किया गया जिसमें पुराने सारे क़ानूनों के प्रावधान रद्द करके नए ढंग से निठल्ले [idle], बदमाश [rogue], आवारा और घुमंतू [vagrant and vagabond] और आदेश न मानने वाले अव्यवस्थितों [disorderly] को परिभाषित करके दंड के दायरे में लाया गया. पहली बार इसके दायरे में सार्वजनिक भद्रता और नैतिकता के उल्लंघन को भी शामिल किया गया. मूलतः पूँजी द्वारा बलपूर्वक श्रम कराए जाने से बचते हुए सामाजिक रूढ़ियों को तोड़ने वाले आचरण और व्यक्तियों को अपराध घोषित कर दिया गया.

ब्रिटिश व्यापारियों के बाद जब ब्रिटिश शासन अमेरिका, एशिया, अफ़्रीका पहुँचा तो ब्रिटिश उपनिवेशों में भी यह क़ानून पहुँच गये.

भारत में ‘आवारा' भिखारियों को दंडित करने के लिए पहला क़ानून - “European Vagrancy Act” - 1869 में बना. दिलचस्प यह है कि यह भारत में रहने वाले श्रमिक गोरों को दंडित करने के लिए बनाया गया था जो 1857 के ग़दर के बाद नेवी और दूसरी जगहों से नौकरी से निकाले गए थे. बेरोज़गारी और एक पराये देश में अलगाव से त्रस्त यह ‘गरीब गोरे’ भारत के ब्रिटिश प्रशासन के लिए ‘शर्मिंदगी’ बन गए थे क्यूँकि ये छोटे-मोटे अपराध और वसूली करके आजीविका चला रहे थे. अपने ‘white man's burden’ को औपनिवेशिक लूट और दमन के लिए एक औचित्य की तरह देखने वाले और उसके सहारे भारतीयों को ‘सभ्य’ बनाने का दावा करने वाले नस्लभेदी प्रशासन के लिए इधर-उधर, ज़्यादातर बॉम्बे में, भटकते और छोटे-मोटे अपराध करते ‘गरीब गोरे’ ‘शर्मिंदगी' बनने ही थे.

‘आवारा’ और ‘भिखारी’ भारतीयों के लिए कोई क़ानून कई सालों तक ब्रिटिश प्रशासन ने नहीं बनाया. उन्हें उसकी ज़रूरत तब महसूस हुई जब उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में बंगाल, हैदराबाद, मैसूर और दक्षिण के अन्य शहरों में महा-अकाल, मलेरिया, प्लेग और इनफ़्लुएंज़ा से हुई विकराल तबाही और लाखों मनुष्यों के मरने के बाद इन जगहों से पलायन करके शरणार्थी देश के दूसरे बड़े शहरों और ख़ासकर बॉम्बे में आने लगे.

राज्य, क़ानून और पूँजी द्वारा श्रमिकों को नियंत्रित करने की जो कहानी चौदहवीं शताब्दी के अंत में इंग्लैंड में प्लेग से शुरू हुई वो वो लगभग साढ़े पाँच सौ साल बाद बॉम्बे के प्लेग के साथ ख़त्म होती है. बॉम्बे के प्लेग ने 1945 में उस क़ानून को जन्म दिया जिसे हमने आज़ाद भारत में कई संशोधनों के साथ 1959 में पास किया.

बॉम्बे में प्लेग से पहली मौतें 1896 में हुईं. ब्रिटिश प्रशासन ने प्लेग फैलने के लिए झुग्गियों में रहने वाले शरणार्थियों को ज़िम्मेवार मानना शुरू किया. उसका एक कारण उस समय का अविकसित रोग विज्ञान और हायजीन सम्बंधित धारणाएँ थीं. ब्रिटिश प्रशासकों का नस्लभेदी, सुप्रीमेसिस्ट मानस तो एक बड़ा कारण था ही लेकिन पिछले साढ़े पाँच सौ वर्षों में ‘आवारा' श्रमिकों के प्रति, घुमंतू सामाजिक विद्रोहियों के प्रति बनी ऐतिहासिक समझ भी थी जो इस आशंका से ग्रसित रहती थी कि ‘आवारा' श्रमिक और सामाजिक रूढ़ियों से विचलन करने वाले सत्ता के पूरे ढाँचे को गिरा सकते हैं. और उसे रोकने का जो तरीक़ा पहले इंग्लैंड में, फिर भारत में ‘गरीब गोरों’ के लिए बार-बार आज़माया गया था, वही इस बार भी आज़माया गया.

1897 में “Epidemic Disease Act” अस्तित्व में आया जिसने नगरपालिकाओं को यह अधिकार दे दिया कि वह किसी भी रिहाईशी इमारत को रहने के लिए अस्वच्छ घोषित कर दे. अगले पाँच साल में प्रशासन को यह लगने लगा कि सड़कों पर घूमते भिखारी प्लेग के सबसे ख़तरनाक वाहक हैं और 1902 में “Bombay City Police Act” के ज़रिये पुलिस को सड़क, फुटपाथ, काफ़ी हाउस, रेस कोर्स, थिएटर जैसी किसी भी सार्वजनिक जगह भीख माँगते देख कर गिरफ़्तार किया जा सकता था. भिखारी अपराधियों के लिए महीने भर की क़ैद और आर्थिक जुर्माने का प्रावधान किया गया.

लेकिन इंग्लैंड की ही तरह क़ानून भारत में भी प्रभावी नहीं रहा.

1918 में बॉम्बे सरकार की वार्षिक रिपोर्ट में पन्द्रहवीं-सोलहवीं शताब्दी में जैसे इंग्लैंड में ‘आवारों’ को वापिस उनके ज़िले भेजा जाता था, वैसा बॉम्बे आये शरणार्थियों के साथ करने का सुझाव दिया गया था. उस रिपोर्ट में ‘डिटेंशन सेंटर’ बनाने की सिफ़ारिश भी की गयी थी. यहाँ फिर से हम ऐन अभी के कोविड अनुभव को रखकर देख सकते हैं जिसमें पलायन कर रहे प्रवासी मज़दूरों को महामारी के प्रसार के लिए जितना ज़िम्मेवार समझा गया उतना कभी उन सम्पन्न लोगों को नहीं जो विदेश यात्राओं से बीमारी लेकर आए थे.

इन और प्रशासन की बाद के सालों की सिफ़ारिशों के कारण 1945 में “Bombay Beggars Act” पास किया गया और इसे ही आज़ाद भारत में 1959 में कई संशोधनों के साथ “Bombay Prevention of Begging Act” के रूप में पास कर भारत में भिक्षावृत्ति को ग़ैर-क़ानूनी और जुर्म घोषित कर दिया गया.

आधुनिकता की अधूरी कहानी

लेकिन आधुनिकता की कहानी सिर्फ़ इतनी भर, इतनी इकहरी कहाँ?

दूसरे यूरोपीय महायुद्ध के दौरान हुए यहूदी जनसंहार ने पहली बार मनुष्यता को ‘यूनिवर्सल’ मानव अधिकार के विचार और अनुभव तक पहुँचाया. संयुक्त राष्ट्र संघ बना, और उसके साझे बैनर से मनुष्य के इतिहास में पहली बार एक ऐसे रेडिकल, क्रांतिकारी विचार पर अंतर्राष्ट्रीय सहमति हुई जिसने सभी मनुष्यों को उनकी पहचान से परे जन्मना बराबर माना. ‘मानव अधिकार’ मूलभूत अधिकारों की तरह परिभाषित हुए और नए बन रहे राष्ट्र राज्यों ने उनको संवैधानिक और क़ानूनी बुनियाद के तौर पर स्वीकार किया.

भिक्षावृत्ति और ‘आवारापन’ को लेकर बने सब पुराने क़ानूनों को ब्रिटेन और दुनिया भर में मानव अधिकारों के मूल्य पर संशोधित किया गया अथवा वापिस ले लिया गया. इंग्लैंड में यह प्रक्रिया इक्कीसवीं शताब्दी तक चलती रही.

भारत में बॉम्बे एक्ट को राज्यों ने दशकों तक लागू रखा लेकिन कोई देशव्यापी क़ानून नहीं बना. 2010 में दिल्ली उच्च न्यायालय ने बॉम्बे और दिल्ली एक्ट [1960 में दिल्ली को शामिल कर लिया गया था] के प्रावधानों को मानव अधिकारों के आधार पर प्रश्नांकित किया और 2016 में इसी आधार पर भिक्षावृत्ति को अपराध की श्रेणी से निकाल दिया.

दिल्ली हाई कोर्ट ने जहां मानव अधिकारों पर ज़ोर दिया वहीं 2021 में भारत के सुप्रीम कोर्ट ने भिखारियों को कोविड-19 के दौरान सभी सार्वजनिक स्थानों से हटाये जाने सम्बन्धी एक याचिका पर अपना मत रखते हुए कहा कि कोर्ट भिक्षा के संबंध में एक ‘इलीटिस्ट’ रवैया नहीं ले सकता क्यूँकि भिक्षावृत्ति की जड़ में ग़रीबी है. सुप्रीम कोर्ट का यह कहना भारत में भिखारियों के मानव अधिकारों, श्रम, उसकी गरिमा के साथ-साथ भिक्षावृत्ति को ग़रीबी के एक परिणाम की तरह देखने के कारण भावी सरकारी नीति निर्माण के लिए दिशा भी देता है.

भारत के 20 राज्यों में अभी भी भिक्षावृत्ति एक अपराध है और दुनिया के कई देशों में इसे लेकर कोई न कोई क़ानून या प्रावधान है; हालाँकि वे अधिकांशतः दंडात्मक प्रकृति के नहीं हैं.

आधुनिकता की यह कहानी तभी पूरी होगी जब पूरे संसार में भिक्षावृत्ति को अपराध नहीं माना जाएगा. जब राष्ट्र राज्य रोज़गार, बराबर अवसर और सर्वांगीण विकास के अपने आधुनिक, लोकतांत्रिक प्रॉमिस पर खरा उतरेंगे. जब भिक्षावृत्ति को केवल एक मानसिकता नहीं, एक सरंचनात्मक, सिस्टेमिक फ़ेनॉमिना की तरह, सामूहिक ज़िम्मेवारी की तरह देखा जा सकेगा.

बनारस में चंद्र मिश्र सामूहिक ज़िम्मेवारी को आकार देने की कोशिश कर रहे हैं. ‘बेगर्स कोरपोरेशन’, इस स्टार्ट-अप समय में श्रम, पूँजी और आत्मनिर्भरता के अंतरसंबंधों को अपने तरीक़े से परिभाषित करने की कोशिश कर रहा है.

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सभ्यता का पैमाना

कहते हैं कि एक समाज की असली परख इस बात से होती है कि वह अपने सबसे क़मज़ोर सदस्यों के साथ कैसा सुलूक करता है. यह कथन अक्सर महात्मा गांधी का माना जाता है लेकिन इसकी पुष्टि हम नहीं कर पाए हैं. क्या भिखारी समाज के सबसे क़मज़ोर सदस्य होते हैं? शायद हाँ, शायद नहीं. लेकिन वे यदि चयनपूर्वक भिखारी हैं तो वे हमारी समूची अर्थ-व्यवस्था के सम्मुख एक रेडिकल प्रश्न की तरह खड़े ज़रूर हो जाते हैं.

बनारस में चंद्र मिश्र उस रेडिकल प्रश्न का समाधान ढूँढने की कोशिश रहे हैं.

अर्थ-विस्तार

चंद्र और उनका सोशल स्टार्टअप शायद एक और बुनियादी काम भी कर रहा है, वह भीख माँगने के अर्थ को उद्यमिता के अर्थ से मिला रहा है. हिंदी जैसी भाषा और उसके बनारस जैसे केंद्र में इसकी एक अलग भूमिका होगी. जिस भाषा में भीख माँगने का सबसे मार्मिक प्रयोग ‘प्राणों की भीख माँगना’ और अपना ‘आँचल फैला देने’ के लिए होता है, उसमें भीख माँगने का अर्थ रोटी के टुकड़ों, चंद चिल्लर, उतरन के कपड़ों से करना, मनुष्य को पशु समझने जैसा है. और जैसा हमने देखा, चंद्र और उनकी संस्था मनुष्य को मनुष्य की तरह देखने, उसके लिए श्रम करने और श्रम को एक चयन में बदलने का काम कर रहे हैं.

वे चाहते हैं यह मॉडल देश भर में लागू हो, हम कहेंगे यह पूरी दुनिया में लागू हो.