इंडिया के स्टार्टअप को क्यों समलैंगिक और ट्रांस व्यक्तियों को नौकरी देनी चाहिए

By Debolina Biswas
June 18, 2022, Updated on : Wed Jul 06 2022 13:22:09 GMT+0000
इंडिया के स्टार्टअप को क्यों समलैंगिक और ट्रांस व्यक्तियों को नौकरी देनी चाहिए
कुछ ऐसे स्टार्टअप और बिजनेसेज के बारे में जानिए जो दूसरों के लिए उदाहरण बन रहे हैं.
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बेंगलुरु के मराथहल्ली इलाके में वेल्स फ़ार्गो सेंटर का सतरंगी गेट बताता है कि वित्तीय मामलों में काम करने वाला ये बहुराष्ट्रीय संस्थान 'प्राइड मंथ' मना रहा है. कुछ ही किलोमीटर आगे HSBC के डाटा प्रोसेसिंग ऑफिस के सामने बड़ा सा सतरंगी झंडा लगा हुआ है. ये सतरंगी झंडा LGBTQIA+ का प्रतीक है. एक प्रतीक जो बताता है कि हर जेंडर और हर तरह की सेक्शुअल ओरिएंटेशन नॉर्मल है और इसे लेकर शर्मिंदा नहीं होना चाहिए. जून के महीने में, जिसे प्राइड मंथ कहते हैं, कई ऐसे संस्थान हैं जो सतरंगी झंडे बुलंद करते हैं, कई बार अपनी ब्रांडिंग सतरंगी कर लेते हैं.


लेकिन जून के महीने के बाद क्या होता है? YourStory में हमने समझने की कोशिश की है कि इंडिया के अलग अलग संस्थानों में समलैंगिक और ट्रांस लोगों के प्रति क्या रवैया है, इस समुदाय को अपनाने और बढ़ावा देने के लिए संस्थान क्या कर रहे हैं.

कंपनियां जो आगे हैं

ग्लासडोर ने 2020 में एक सर्वे किया जिसमें ये सामने आया कि 76% लोगों के लिए ये महत्वपूर्ण है कि जिस कंपनी में वो नौकरी करने वाले हैं, वहां सभी समुदायों को बराबरी के मौके देने का कितना कल्चर है.


इंडिया वर्कप्लेस इक्वलिटी इंडेक्स 2021 ने उन कंपनियों की लिस्ट बनाई है जो भर्तियों से लेकर भविष्य की प्लानिंग तक में LGBTQIA+ समुदाय को ध्यान में रखते हैं. इनमें एक्सेंचर, बेन एंड कंपनी, बॉस्टन कंसल्टिंग ग्रुप, डेलॉइट, IBM, टाटा स्टील और थॉटवर्क्स जैसे नाम शामिल हैं.


डिजिटल पेमेंट सलूशन कंपनी पेयू ने हाल में प्राइड मंथ मनाते हुए कुछ कदम उठाए और अपनी इंश्योरेंस पॉलिसी में हॉर्मोन थेरेपी और जेंडर अफरमेशन सर्जरी जैसे कवर जोड़े.


2019 में टाटा स्टील ने क्रांतिकारी कदम उठाते हुए LGBTQIA+ कर्मचारियों और उनके पार्टनर्स के लिए कई HR पॉलिसीज़ शुरू कीं. जैसे चाइल्ड केयर लीव, मेडिकल बेनिफिट्स, इंप्लॉई असिस्टेंस प्रोग्राम, जॉइंट हाउस पॉइंट्स, हेल्थ चेकअप, ट्रांसफ़र एंड रीलोकेशन बेनिफिट्स और ट्रेवल पॉलिसी. इसके पहले कंपनी ने 2018 में WINGS नाम का एक LGBTQIA+ इंप्लॉई रीसोर्स शुरू किया और अपने कलिंगनगर प्लांट में 12 LGBTQIA+ लोगों की भर्ती की. इंडिया के वर्कप्लेस इक्वलिटी इंडेक्स में टाटा स्टील 2020 से टॉप पर बना हुआ है.


बीते साल एक्सिस बैंक ने ऑल जेंडर टॉयलेट शुरू किए. साथ ही हर इंप्लॉई के पार्टनर को इंश्योरेस कवर देना शुरू किया, चाहे वे गैर-शादीशुदा हों या समलैंगिक.

infographic 1

छोटे और मंझोले बिजनेस

इन संस्थानों में भी बदलाव देखा जा रहा है. राजस्थान के सराफ फर्नीचर ने 'जेंडर अफरमेशन एंड सेक्शुअल हैरासमेंट प्रिवेंशन पॉलिसी' लागू की है.


इस D2C फर्नीचर ब्रांड ने यूनिसेक्स टॉयलेट शुरू किए हैं और फ़िलहाल एक वेलफेयर कमिटी बनाने की ओर काम कर रहा है जो LGBTQIA+ इंप्लॉईज के हक़ में काम कर सके. साथ ही अवेयरनेस और ट्रेनिंग प्रोग्राम चलाकर ऑफिस के मौजूदा कर्मचारियों में बराबरी और आपसी सम्मान की भावना बढ़ाने की ओर प्रयास कर रहा है.


सराफ फर्नीचर लगभग 2 साल से LGBTQIA+ लोगों की हायरिंग का भी घनघोर प्रयास कर रहा है. कंपनी के फाउंडर रघुनंदन सराफ ने YourStory को बताया कि बीते साल उन्होंने 234 ऐसे लोगों की हायरिंग की जो क्वियर कम्युनिटी से हैं, जिनमें से 198 आज भी संस्थान में काम कर रहे हैं.


साइंस-टेक कंपनी मर्क इंडिया ने भी इसी तरह के कुछ कदम उठाए हैं. Merk India के HR हेड शिव कुमार बताते हैं, "छोटी छोटी बातों के नतीजे कई बार बड़े गहरे होते हैं. हमारी सभी पॉलिसीज़ में हम जेंडर न्यूट्रल प्रोनाउन और भाषा का इस्तेमाल करते हैं. मसला है लोगों को जागरूक करने का. साथ ही समलैंगिक कर्मचारियों के पार्टनर्स को इंश्योरेंस कवर भी मिलता है.

स्टार्टअप

स्टार्टअप भी इस मामले में पीछे नहीं हैं. फ़िलहाल फ़ोनपे में चार ट्रांसजेंडर इंप्लॉई काम करते हैं. इनकी भी इंश्योरेंस पॉलिसी समलैंगिकों को ध्यान में रखकर बनाई गई हैं. और नवजात के प्राइमरी केयरगिवर को उतनी ही लीव मिलती है, जितनी मैटरनिटी लीव होती है. HR हेड मनमीत संधू बताती हैं: "फोन पे में जेंडर न्यूट्रल बाथरूम हैं और यहां भर्ती के दौरान अपनी सेक्शुअल ओरिएंटेशन अपनी मर्ज़ी से बताने और न बताने, दोनों का प्रावधान है."


इसी तरह को-लिविंग स्टार्टअप 'इस्थारा' ने अपनी को-लिविंग प्रॉपर्टी 'अनन्य' लॉन्च की, जिससे ट्रांस व्यक्तियों को रहने के लिए घर मिल सके. संस्थापक कृष्ण कुमार YourStory से हुई बातचीत में बताते हैं: किसी भी आम सोसाइटी में हर किसी को रहने का अधिकार है. हमारा लक्ष्य ये है कि घर ढूंढ रहे लोगों के साथ धर्म, जाति या जेंडर के हिसाब से भेदभाव न हो.


ये प्रॉपर्टी जल्द ही कस्टमर्स के लिए खुलने वाली है. कृष्ण बताते हैं: "इस प्रोजेक्ट के 50% पैट्रन्स ट्रांसजेंडर समुदाय से हैं.


इस फील्ड में और जानकारी के लिए ये इन्फोग्राफिक देखें:

infographic 2

2019 में ज़ोमैटो ने अपने ऐप में 'LGBTQIA+ फ्रेंडली' रेस्तरां का ऑप्शन दिया.


लेकिन सभी स्टार्टअप्स को DI&B की जानकारी नहीं है. लेकिन नौकरी खोज रहे युवा वर्ग को बदलाव की तलाश है.

दफ्तरों को संवेदनशील कैसे बना सकते हैं?

आंत्रप्रेन्योर अपने काम करने के तरीके को बेहतर बना सकते हैं. उसका पहला जरिया है जागरूकता और ट्रेनिंग. साथ ही साथ LGBTQIA+ समुदाय के लोगों को हायर करना.


सराफ फर्नीचर के रघुनन्दन कहते हैं: “समय समय पर कर्मचारियों को जानकारी देते रहना, नेटवर्क ग्रुप बनाना, सेमिनार और कॉन्फ्रेंस करवाते रहना—इन सब चीजों का काफी फर्क पड़ता है.”


ऐमेज़ॉन की पूर्व प्रिंसिपल HR मनमीत बताती हैं कि कर्मचारियों के लिए माहौल बेहतर बनाने का सबसे अच्छा तरीका तीन कदम का है:


पहला, जागरूकता—जो ट्रेनिंग, पढ़ाई, बातचीत और चर्चाओं से ही आ सकती है. ऐसा करने से हर तरह के व्यक्ति के लिए एक बेहतर माहौल बनेगा.


दूसरा, स्टार्टअप इस दिशा में कदम उठाएं और निश्चय कर लें कि हर टीम में विविधता लाएंगे ही. साथ ही इस तरह के कदम उठाएंगे कि क्वियर लोग नौकरी के लिए ज्यादा से ज्यादा संख्या में अप्लाई करें.


और अंततः, किसी भी तरह के भेदभाव के खिलाफ ज़ीरो टॉलरेन्स पॉलिसी रहे जिससे हर समुदाय से आने वाले कर्मचारी को आश्वासन रहे कि वे सुरक्षित हैं.

एक बड़ी खाई

विविधता की बात हर जगह होती है, लेकिन जब इसे दफ्तरों के रोज़ के काम-काज में उतारना होता है तो अन्धकार छा जाता है. HR-टेक स्टार्टअप ‘राइजबर्ड टैलेंट सलूशन’ के संस्थापक आशुतोष सेठ बताते हैं, “हर कोई D&I को जगह देना चाहता है. लेकिन जब हायरिंग की बात आती है तो कोई भी स्टार्टअप रिस्क नहीं लेना चाहता.”


YourStory से हुई बातचीत में कई आंत्रप्रेन्योर्स ने बताया कि उन्हें LGBTQIA+ समुदाय से ऐसे लोग ढूंढने में तकलीफ होती है जो नौकरी के लिए अप्लाई करें. वहीं आशुतोष का मानना है कि विविधता लाने के लिए स्टार्टअप सबसे अच्छी जगह है क्योंकि वे युवाओं को बिना उनके बैकग्राउंड को जज किए उनकी भर्ती कर सकता है.


फोन पे की मनमीत बताती हैं: हमारे कर्मचारियों के लिए अपनी सेक्शुअल ओरिएंटेशन बताना ज़रूरी नहीं है. लेकिन हम ‘प्राइड सर्कल’ जैसे ग्रुप के साथ टाई-अप में काम करते हैं. जिससे हमें पता चलता है कि LGBTQIA+ समुदाय के लोग कहां से मिल सकते हैं. इसी तरह सराफ के रघुनंदन कहते हैं, “हम हायरिंग सोशल मीडिया के ज़रिये ही करते हैं, खासकर लिंक्डइन या दूसरी एग्रीगेटर वेबसाइट."

infographic 3

किरण कलाकुंतल, हेल्थ-टेक प्लेटफॉर्म एकिनकेयर के संस्थापक के मुताबिक़, ग्लोबल और मैच्योर कंपनियों में हमेशा बेहतर माहौल होता है. किरण बताते हैं कि डेलॉइट ने एकिनकेयर से गुजारिश की कि अपने प्लेटफॉर्म पर वो ‘थर्ड जेंडर’ और ‘ज़ाहिर नहीं करना’ जैसे विकप्ल जोड़ें.


किरण के मुताबिक़, स्टार्टअप छोटे होते हैं और उनके पास इतने संसाधन नहीं होते कि विस्तृत पॉलिसीज़ बन सकें. पर क्या पॉलिसी का होना ज़रूरी है? “बिलकुल है”, मनमीत कहती हैं. “इससे न सिर्फ ओपन कल्चर बनाने में मदद मिलती है बल्कि कंपनी का नज़रिया आधिकारिक तौर पर साफ़ होता है.


रघुनन्दन के मुताबिक़, “पॉलिसीज कर्मचारियों के साथ एक बेहतर रिश्ता बनाने में मदद करती हैं.”


किरण की ये सलाह है कि जो स्टार्टअप विस्तृत पॉलिसी नहीं बना सकते तो कम से कम इतना करें कि अपने प्रोडक्ट क्वियर फ्रेंडली रखें. जिससे बाहर ये सन्देश जा सके कि एक संस्थान के तौर पर आप LGBTQIA को लेकर मुखर हैं और आपकी मेहनत सिर्फ एक महीने की सतरंगी रीब्रांडिंग तक सीमित नहीं है.


लेकिन सवाल वही है, कि क्या भारतीय स्टार्टअप क्वियर फ्रेंडली हो पा रहे हैं? “दूर-दूर तक नहीं”, इस्थारा के कृष्णा कहते हैं. हमें विदेशी कंपनियों जैसे ANZ (ऑस्ट्रेलिया एंड न्यूजीलैंड बैंकिंग ग्रुप) से सीखना चाहिए.


हम असल मायने में इन्क्लूज़िव और संवेदनशील तब बनेंगे जब इसके बारे में महज़ बात करना बंद कर बोल्ड कदम उठाएंगे, क्वियर समुदाय को ‘नॉर्मल’ से अलग मानना बंद कर देंगे और ये सोचना बंद कर देंगे कि क्वियर फ्रेंडली पॉलिसी बनाने का उन्हें खुद क्या लाभ होगा.


Edited by Prateeksha Pandey

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