भारत के पास अब 100 यूनिकॉर्न, स्टार्टअप इकोसिस्टम में वैल्यूएशन के लिए इसके क्या मायने हैं?

By Sindhu Kashyaap
May 03, 2022, Updated on : Sat Aug 13 2022 14:05:23 GMT+0000
भारत के पास अब 100 यूनिकॉर्न, स्टार्टअप इकोसिस्टम में वैल्यूएशन के लिए इसके क्या मायने हैं?
इस साल अभी तक 15 यूनिकॉर्न बन चुके हैं, जो साल 2021 में बने कुल 44 यूनिकॉर्न का करीब 34.09 फीसदी है। इसके साथ ही अब देश यूनिकॉर्न की संख्या 100 पहुंच गई है। आखिर भारतीय स्टार्टअप इकोसिस्टम के लिए इसके क्या मायने हैं?
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यूनिकॉर्न एक पौराणिक जीव है, जिसका जिक्र सिर्फ किस्सों-कहानियों में आता है। हालांकि स्टार्टअप इकोसिस्टम में इसका दिखना आम होता जा रहा है। आंकड़ों को देखें तो पता चलता है कि भारतीय स्टार्टअप इकोसिस्टम में हर दो हफ्ते एक नए स्टार्टअप की यूनिकॉर्न क्लब में एंट्री हो रही है। जो इस शब्द से परिचित नहीं है, उन्हें बता दें कि जिन स्टार्टअप की वैल्यूएशन 1 अरब डॉलर के पार चली जाती है, उन्हें यूनिकॉर्न कहा जाता है।


ग्रोथ स्टेज वाले स्टार्टअप में निवेश करने वाली फर्म आयरन पिलर के मैनेजिंग पार्टनर आनंद प्रसन्ना कहते हैं:


“किसी स्टार्टअप के लिए यूनिकॉर्न बनना एक बड़ी उपलब्धि या एक मील का पत्थर है। एक निवेशक के रूप में, हम इसे अधिक लंबे समय तक चलने वाले स्टार्टअप के रूप में देख सकते हैं। यूनिकॉर्न का कॉन्सेप्ट काफी लंबे समय (शायद 16 शताब्दियों तक) रहा है और हमारा मानना है कि ग्रोथ की गति और दूसरे पहलुओं को देखते हुए ऐसे स्टार्टअप लंबे समय तक चल सकते हैं। हालांकि हमेशा यह जरूरी नहीं है कि ये स्टार्टअप लंबे समय तक टिके और यहां तक कि कई बार इनके वैल्यूएशन में भी आगे चलकर गिरावट देखी जा सकती है।"


YourStory Research के अनुसार , भारत में फिलहाल 92 एक्टिव यूनिकॉर्न हैं।


Open, यूनिकॉर्न बनने वाला देश का 100वां स्टार्टअप है। इस दौरान Flipkart और Bigbasket जैसे यूनिकॉर्न का क्रमश: Walmart और Tata Group ने अधिग्रहण कर लिया है। Info Edge (India) और MakeMyTrip शेयर बाजार में लिस्ट हो चुके हैं। वहीं Hike, Shopclues, Snapdeal और Quikr जैसे स्टार्टअप वैल्यूएशन में गिरावट के चलते अपना यूनिकॉर्न का तमगा खो चुके हैं।


साल 2022 में अभी तक 15 यूनिकॉर्न बन चुके हैं, जो साल 2021 में बने कुल 44 यूनिकॉर्न का करीब 34.09 फीसदी है। यह साफ बताता है कि 2022 अभी स्टार्टअप्स और विशेष रूप से ग्रोथ के स्टेज में मौजूद स्टार्टअप के लिए एक शानदार साल रहा है।

Unicorns 2022

B2B के हाथ लग रही बाजी

इस साल, प्रतिष्ठित 1 अरब डॉलर के वैल्यूएशन क्लब में शामिल होने के लिए बिजनेस-टू-कंज्यूमर (B2C) बनाम बिजनेस-टू-बिजनेस (B2B) स्टार्टअप्स की दिलचस्प दिख रही है। जहां बी2सी स्टार्टअप सालों से निवेशकों के ध्यान के साथ स्टार्टअप्स को मिले कुल फंडिंग का एक बड़ा हिस्सा अपनी ओर आकर्षित करते रहे हैं। वहीं बी2बी स्टार्टअप भी 2011 के बाद से काफी प्रासंगिक हो गए हैं।


हालांकि जब नए यूनिकॉर्न के बिजनेस मॉडल की बात आती है, तो लगता है कि 2022 में इसने तालिकाओं को बदल दिया है। इस साल जो 15 स्टार्टअप यूनिकॉर्न बने हैं, उनमें से 13 बी2बी हैं। इस साल जनवरी और मार्च में सिर्फ दो बी2सी स्टार्टअप ही यूनिकॉर्न क्लब में शामिल हुए हैं। इससे दोनों के बीच अनुपात 87:13 हो जाता है।


सिकोइया कैपिटल इंडिया के मैनेजिंग डायरेक्टर जीवी रविशंकर कहते हैं कि, सेक्टर्स के संदर्भ में वेंचर कैपटलिस्ट्स (VC) अब उन सेक्टर्स में दिलचस्पी दिखा रहे हैं, जहां टेक्नोलॉजी एक बड़ा अंतर ला सकती है। उदाहरण के लिए, सॉफ्टवेयर-एज़-ए-सर्विस (SaaS) भारत का एक सिद्ध मॉडल है जो वैश्विक सॉफ्टवेयर मार्केट में बढ़ रहा है। Freshworks के सफल आईपीओ के जरिए इसे दिखाया भी जा चुका है।

Unicorns 2022

वे कहते हैं, “फ्रेशवर्क्स ने रास्ता दिखाया है कि आप भारत से बाहर ग्लोबल स्तर पर मल्टीपल वैल्यूएशन कंपनियों का निर्माण कर सकते हैं। इसने यह भी दिखाया है कि भारत से बाहर भी लाखों करोड़ों डॉलर के रेवेन्यू देने वाले प्रोडक्ट को खड़ा किया जा सकता है। हमें लगता है कि अधिक लोग भारत से बाहर ग्लोबल SaaS कंपनियों का निर्माण करेंगे।”


उन्होंने आगे कहा कि सिकोइया, फिनटेक सेक्टर् को भी करीब से देख रहा है क्योंकि वित्तीय सेवाएं एक बड़ा बाजार है जिसमें लाभ कमाने के पर्याप्त मौके हैं, और वेंचर कैपटलिस्ट्स (VC) पहले ही भारत और दक्षिण पूर्व एशिया में इस सेक्टर में करीब 40-50 कंपनियों में निवेश कर चुके हैं ।


रविशंकर कहते हैं, "इस क्षेत्र में जो समस्याएं हैं वो काफी विशाल आकार की हैं। इनका टारगेट वर्ग काफी बड़ा है। ऐसे में हमें विश्वास है कि इस सेक्टर्स में हमें आगे भी बहुत अधिक इनोवेशन दिखता रहेगा। ये इनोवेशन पेमेंट्स, लोन, बीमा तकनीक और वित्तीय सेवाओं के सभी पहलुओं पर होगा।"


प्राइवेट इक्विटी फर्म इन्वेस्टकॉर्प के पार्टनर वरुण लाउल कहते हैं, “भारत में आज अमेरिका और चीन के बाद तीसरी सबसे अधिक संख्या में यूनिकॉर्न हैं, और भारतीय स्टार्टअप इकोसिस्टम लगभग सभी ग्लोबल निवेशकों के लिए एक उच्च प्राथमिकता है। यह भारतीय आंत्रप्रेन्योर्स की क्षमताओं और तेजी से ग्रोथ हासिल करने दिखाना और भारतीय डिजिटल व तकनीक-आधारिक व्यवसायों की गुणवत्ता का एक मजबूत सत्यापन है। हमारा मानना है कि भारतीय आंत्रप्रेन्योर्स को इस ग्लोबल दिलचस्पी का लाभ उठाना चाहिए और उन अधिक गुणवत्ता वाले और लंबी अवधि के ग्रोथ के लिए निवेश करने वाले निवेशकों को आकर्षित करना चाहिए, जिनका ग्रोथ स्टेज में स्टार्टअप का मदद करना अच्छा इतिहास रहा है। इन्वेस्टकॉर्प के रूप में, हमारा लक्ष्य ग्रोथ के चरण में बिजनेसों के लिए यह वैल्यू जोड़ने वाला पार्टनर बनना है।”

एक दशक के विकास और कड़ी मेहनत का नतीजा

संस्थापक हां और ना दोनों कहते हैं।


डी2सी यूनिकॉर्न Licious के सह-संस्थापक अभय हंजुरा कहते हैं, "यह ग्रोथ भारतीय इकोसिस्टम में एक मौलिक बदलाव का संकेत है। एक तरफ स्टार्टअप सभी सेगमेंट में रोजगार पैदा कर रहे हैं और ये रोजगार सफेद और नीले कॉलर दोनों तरह के हैं। दूसरी ओर, वे उपभोक्ता की उभरती जरूरतों को पूरा करने के लिए लगातार इनोवेशन कर रहे हैं। यूनिकॉर्न ने सभी व्यावसायिक क्षेत्रों में पार्टनर्स और स्टेकहोल्डर्स के लिए इकोसिस्टम को विकसित करने में भी अहम भूमिका निभाई है।"


इसके अलावा फिनटेक यूनिकॉर्न Oxyzo की सह-संस्थापक और सीईओ रुचि कालरा के मुताबिक वैल्यूएशन मुद्दा हमेशा बहस का विषय रहता है। वह कहती हैं कि जब कोई भारतीय स्टार्टअप इकोसिस्टम को देखता है तो उसे यह भी देखना चाहिए कि आज जो यूनिकॉर्न बने रहे हैं, वे करीब 10 साल पहले शुरू किए गए स्टार्टअप के काम और प्रयासों का एक नतीजा है।


वह कहती हैं, "उदाहरण के लिए अगर कोई गांव यह फैसला करे कि वे गांव के सभी बच्चे कम से कम ग्रेजुएशन तक की शिक्षा दिलाएंगे और बच्चों को उच्च शिक्षा के लिए बाहर भेजना शुरू कर दें, तो आप 12-15 सालों में अचानक देखेंगे कि गांव में शिक्षा का स्तर और स्नातकों की संख्या काफी बढ़ गई है। लेकिन यह रातों रात नहीं हुआ है, यह काफी समय से किए गए कार्यों का नतीजा है।"


इसी तरह, आज हमारे चारों तरफ बड़ी संख्या में यूनिकॉर्न हैं क्योंकि इनमें से कई स्टार्टअप ने पांच से 10 साल पहले काम करना शुरू कर दिया था।


रुचि बताती हैं, “उदारीकरण के बाद के युग में कई ब्रांड अचानक से आ गए। हालांकि इन ब्रांड्स को पहचाना तब जाने लगा जब ये लंबे समय तक बाजार में बने रहे। बेशक, आपके पास कई सफलताएं है। लेकिन अगर आप देखेंगे तो ऑफबिजनेस हो या आक्सीजो, इन पर 2015 यानी सात पहले काम शुरू हुआ था।


वरुण बताते हैं कि इन्वेस्टकॉर्प ने नए जमाने की इकोनॉमी वाले कुछ प्रमुख भारतीय स्टार्टअप्स में निवेश किया है, इनमें Xpressbees और FreshToHome आदि शामिल हैं। वे कहते हैं कि बतौर निवेशक वे मौलिक व्यापार मूल्य बनाने वाले स्टार्टअप को देखतें हैं और उनका मानना है कि वैल्यूएशन इन कंपनियों के ग्रोथ और बिजनेस मॉडल के टिकाऊपन और परिपक्वता का नतीजा है।


वरुण कहते हैं, “इसलिए, मेरे विचार में अगर भारतीय स्टार्टअप अपने ग्रोथ को इसी तरह हासिल करना जारी रखते हैं और टिकाऊ बिजनेस को बनाने पर फोकस करते हैं, तो वे दुनिया भर के निवेशकों को आकर्षित करेंगे, और तब यूनिकॉर्न का दर्जा हासिल करना एक सहज प्रक्रिया बन जाएगा। हमारे पोर्टफोलियो में शामिल सभी कंपनियों के लिए हमारा मार्गदर्शक सिद्धांत है- 'समय से मूल्य निर्माण' पर जोर दें न कि 'मूल्यांकन के लिए समय' पर जोर दें।

ग्रोथ इंजन का निर्माण करना

रविशंकर कहते हैं, "आज यूनिकॉर्न्स की संख्या 10 साल पहले की तुलना में काफी अधिक है। फ्लिपकार्ट से पहले तक, शायद ही कोई स्टार्टअप था जिसकी कीमत एक अरब डॉलर से अधिक थी।"


वह कहते हैं कि हर बार जब कोई कंपनी यूनिकॉर्न की उपलब्धि को हासिल करती है, तो पहले से अधिक लोगों में विश्वास आता है कि वे भी ऐसा ही कर सकते हैं। किसी को तो रास्ता दिखाना होगा और लोग जितना रास्ता अधिक दिखाएंगे हैं, उतने ही अधिक संख्या में लोग इन उपलब्धियों को हासिल करना शुरू कर देते हैं।


रविशंकर कहते हैं, "एक और अहम बात यह है कि एक बार जब ये वैल्यूएशन वास्तविक मूल्यों में बदल जाते हैं, तो अधिक संख्या में लोगों रिवॉर्ड पाते हैं, जो बदले में इकोसिस्टम में नए टैलेंट पैदा करता है। साथ ही यह स्टार्टअप में अधिक लोगों के शामिल होने के लिए राह खोलता है।"


स्टार्टअप यूनिकॉर्न साथ भारत का ताजा रिश्ता 2011 में शुरू हुआ जब एडटेक स्टार्टअप InMobi ने प्रतिष्ठित एक अरब डॉलर का वैल्यूएशन हासिल किया। इसके बाद के सालों रुक-रुक नए यूनिकॉर्न बनते रहे। साल 2013 में MuSigma दूसरा यूनिकॉर्न बना। तो वहीं 2015 में Ola, Paytm और Zomato ने एक साथ यूनिकॉर्न की हैट्रिक लगा दी।


फिर 2017 में क्लीनटेक सेक्टर की दिग्गज कंपनी ReNew Power को भारत का अगला यूनिकॉर्न बनते देखा है। स्टार्टअप्स के यूनिकॉर्न बनने में निरंतरता असल में 2018 में शुरू हुई, जब एक साल में आठ स्टार्टअप एक अरब-डॉलर वैल्यूएशन क्लब में शामिल हुए। इसके बाद 2019 में भी आठ यूनिकॉर्न बने।


2020 में, पहली बार दहाई की संख्या से अधिक 11 स्टार्टअप्स, यूनिकॉर्न के क्लब में शामिल हुए और 2020 के अंत तक देश में कुल यूनिकॉर्न की संख्या 33 पहुंच गई। फिर 2021 में 44 नए यूनिकॉर्न बने, जो पिछले साल तक बने कुल स्टार्टअप्स की तुलना में 133 फीसदी अधिक था।


इस साल अभी ही 15 नए यूनिकॉर्न बन चुके हैं और 2022 भी यूनिकॉर्न के लिए एक और शानदार साल रहने की संभावना है।

unicorns 2021

पूंजी की उपलब्धता

बड़े स्तर पर, भारतीय स्टार्टअप इकोसिस्टम में जितनी अधिक सफलता दिखेगी, उतनी ही अधिक पूंजी देश में आएगी। साथ ही ये उपलब्धियां अन्य सभी भारतीय स्टार्टअप्स को बड़ा करने के लिए सकारात्मक तौर पर प्रेरित करेंगी।


आज दूसरों की तुलना में अधिक स्टार्टअप हैं, इसके पीछे एक महत्वपूर्ण कारण है यह है कि आज इस सेक्टर में प्राइवेट कैपिटल की लंबी अवधि के लिए उपलब्धता है। आनंद कहते हैं, “यह बदले में निजी मूल्यांकन मैट्रिक्स के तहत अधिक यूनिकॉर्न बनाने में मदद करता है। इसका मतलब है कि अब मूल्य और रिटर्न के मामले में स्टार्टअप इकोसिस्टम को लेकर में कोई संदेह नहीं है।”


वह कहते हैं कि तीन साल पहले तक, भारत को एक शीर्ष बाजार नहीं माना जाता था। इसकी जगह, लोग चीन या दक्षिण पूर्व एशिया के दूसरे देशों में देखते थे। आज भारत एक खुला बाजार है जहां एक अरब से अधिक लोगों की युवा आबादी है, जो एक वैश्विक दावेदार है।

इकोसिस्टम में बदलाव

अभय कहते हैं, “यह बढ़ोतरी भारतीय इकोसिस्टम में एक मौलिक बदलाव का संकेत है। एक ओर, स्टार्टअप सफेद और नीले-कॉलर दोनों तरह के रोजगार पैदा कर कर रहे हैं। दूसरी ओर, वे उभरती उपभोक्ता जरूरतों को पूरा करने के लिए सक्रिय रूप से इनोवेशंस कर रहे हैं। यूनिकॉर्न्स ने साझेदार और हितधारकों के लिए इकोसिस्टम विकसित करने में भी अहम भूमिका निभाई है।"


वह कहते हैं कि यूनिकॉर्न का एक और फायदा यह है कि वे अपने स्वयं के सब-इकोसिस्टम का निर्माण करते हैं। लगातार व्यापार में ग्रोथ उन्हें सहज रूप से बाजार में और विस्तार करने व मर्जर एंड एक्विजिशन (अधिग्रहण व विलय) के विकल्पों का पता लगाने के लिए प्रेरित करती है।


रुचि ने बताया कि भारतीय इकोनॉमी में एक बदलाव का बिंदु रहा है। वह कहती हैं, “जहां दुनिया भर में अर्थव्यवस्था गिरी है, वहीं कोरोना महामारी ने दिखाया कि भारत में उपभोक्तावाद काफी अधिक है। अगर आप आज 25-35 साल के बच्चों को देखें, तो उनकी खर्च करने योग्य आय कुछ साल पहले की समान आयु वर्ग की तुलना में काफी अधिक है।"


वह प्राकृतिक रूप से तरक्की, अधिक पूंजी और बढ़ती अर्थव्यवस्था जैसे कई पहलुओं के मिश्रण को वजह बताती है, जिसने इस बुलिश ट्रेंड को लाने में योगदान दिया है।

unicorns

लेकिन इसका दूसरा पहलू क्या है?

अभय कहते हैं, "मैं इस टेक्नोलॉजी आधारित स्टार्टअप इकोसिस्टम को आर्थिक ग्रोथ के एक बहुमूल्य चालक के रूप में देखता हूं। एक अत्यधिक उत्साही इकोसिस्टम में, कोई भी विकास का पीछा करने के लिए इच्छुक हो सकता है। हालांकि सबसे बेहतर तरीके से तरक्की हासिल करने के लिए ग्रोथ और मुनाफे के पैमाने को संतुलित करना अहम है।”


इकोसिस्टम में यूनिकॉर्न की बढ़ती संख्या का क्या यह मतलब है कि यूनिकॉर्न्स की विशिष्टता कम हो जाती है? आनंद और रुचि स्पष्ट करते हैं कि इसका सीधा सा मतलब है कि आने वाले समय में अधिक मूल्य वाले स्टार्टअप - डेकाकॉर्न (10 अरब से अधिक वैल्यूएशन के स्टार्टअप) बनाने पर ध्यान केंद्रित किया जाएगा।


रविशंकर कहते हैं कि अगर हम मान लें कि अंतर्निहित मूल्य वही है जो मूल्यांकन में दिखता है, तो एक अरब डॉलर की कंपनी बनाना एक लंबी अवधि का मामला है। वह कहते हैं, "यह एक ऐसी स्थिति है जहां आप टॉप 100-200 स्थितियों में प्रवेश कर रहे हैं, खासकर जब आप इसकी तुलना किसी भी लिस्टेड कंपनियों से करते हैं, और यही इसे दुर्लभ बनाता है।"


उन्होंने आगे कहा, "दूसरा पक्ष यह है कि असली बिजनेस खड़ा करने की जगह आंकड़ों को हासिल करना ही व्यवसाय बन जाता है। आपके हासिल किए पैमाने और आंकड़े किसी व्यवसाय का अंतिम परिणाम नहीं हो सकता। ऐसे में व्यवसाय के मौलिक मूल्य के निर्माण से ध्यान हट जाता है और तभी समस्या पैदा होती है।”


इस प्रकार, वे बताते हैं, यह तय करने पर अधिक ध्यान केंद्रित किया जाना चाहिए कि मूल्यांकन एक व्यर्थ मीट्रिक नहीं बनता है, बल्कि व्यवसायों की एक अंतर्निहित गुणवत्ता है जो राजस्व और पैमाने बनाते हैं, और लाभदायक और स्थायी हैं।


वरुण कहते हैं, "भारतीय यूनिकॉर्न्स की संख्या में बढ़ोतरी देश के लिए एक सकारात्मक पहलू है। यह बिजनेस इनोवेशन और अच्छे टैलेंट वाले लोगों का एक अच्छा चक्र बनाता है, जो ग्लोबल पूंजी और ज्ञान को आकर्षित करते हैं और जो फिर आंत्रप्रेन्योर्स की अगली पीढ़ी को नए व्यवसाय शुरू करने के लिए प्रेरित करती है। हालांकि, सिर्फ वैल्यूएशन पर फोकस करना और यूनिकॉर्न / डेकाकॉर्न क्लब में हासिल होने को ही लक्ष्य बनाने को अच्छा नहीं कहा जा सकता है।"


उन्होंने आगे कहा, "यह पूरे इकोसिस्टम पर अत्यधिक और अनावश्यक दबाव डालता है और कुछ मामलों में अल्पकालिक और अस्थिर व्यावसायिक फैसला लेने का कारण बन सकता है। इन्वेस्टकॉर्प में हम चाहते हैं कि हमारे संस्थापक सही और टिकाऊ तरीके से व्यवसायों के निर्माण पर ध्यान केंद्रित करें, हमारे विचार में मूल्यांकन इसके बाद अपने आप आएगा।”


आज वैल्यूएशन में सुधार शुरू हो चुका है और रविशंकर का मानना है कि इस साल बाद के चरण में किया जाना वाला निवेश कुछ धीरा होगा। इसके चलते यूनिकॉर्न क्लब में आने वाले स्टार्टअप्स की संख्या में भी कमी आएगी।


तो इसका मतलब है कि अब जब लोग पूंजी की तलाश में बाहर जाएंगे, तो वे देखेंगे कि वैल्यूएशन कम है। उदाहरण के लिए, यदि इस साल आपका रेवेन्यू ग्रोथ X है, तो आपका मूल्यांकन भी 10X तक बढ़ जाएगा। लेकिन धीरे-धीरे आप देखेंगे कि जब आपका रेवेन्यू ग्रोथ 2X पहुंचेगा, तो मूल्यांकन इसी के अनुपात में बढ़कर 20X को नहीं छूएगा, बल्कि यह सिर्फ केवल 12X तक बढ़ सकता है।


रविशंकर कहते हैं, "आप जो नहीं चाहते हैं, वह यह है कि आज 100 यूनिकॉर्न हों और तीन साल बाद, इनमें से केवल आधे ही अपनी यूनिकॉर्न के दर्ज को बचाए रख पाएं।"


उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि ये बातें यह तय करने के लिए हैं कि आप एक यूनिकॉर्न बनने के लिए किए गए वादे पर कायम रहें।


(पायल गांगुली से इनपुट्स के साथ)


Edited by Ranjana Tripathi