वैश्विक भूख सूचकांक में पाकिस्तान और नेपाल से भी पीछे भारत, जानिए 121 देशों में कौने से स्थान पर रहा

By Vishal Jaiswal
October 15, 2022, Updated on : Sat Oct 15 2022 09:38:15 GMT+0000
वैश्विक भूख सूचकांक में पाकिस्तान और नेपाल से भी पीछे भारत, जानिए 121 देशों में कौने से स्थान पर रहा
वैश्विक भूख सूचकांक (GHI) के जरिए वैश्विक, क्षेत्रीय और राष्ट्रीय स्तरों पर भूख पर नजर रखी जाती है और उसकी गणना की जाती है. 29.1 अंकों के साथ भारत में भूख का स्तर ‘‘गंभीर’’ है.
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16 अक्टूबर को दुनियाभर में एक साथ वर्ल्ड फूड डे मनाया जाता है लेकिन उससे दो दिन पहले 14 अक्टूबर को जारी हुई वैश्विक भूख सूचकांक में भारत की हालत पहले से भी खराब हो गई है. वैश्विक भूख सूचकांक (Global Hunger Index) 2022 में भारत 121 देशों में 107वें नंबर पर है. भारत 2021 में 116 देशों में 101वें नंबर पर था जबकि 2020 में वह 94वें पायदान पर था.


वैश्विक भूख सूचकांक (GHI) के जरिए वैश्विक, क्षेत्रीय और राष्ट्रीय स्तरों पर भूख पर नजर रखी जाती है और उसकी गणना की जाती है. 29.1 अंकों के साथ भारत में भूख का स्तर ‘‘गंभीर’’ है.

पाकिस्तान, नेपाल से भी खराब हालत

पड़ोसी देश पाकिस्तान (99), बांग्लादेश (84), नेपाल (81) और श्रीलंका (64) भारत के मुकाबले कहीं अच्छी स्थिति में हैं. एशिया में केवल अफगानिस्तान ही भारत से पीछे है और वह 109वें स्थान पर है.

चाइल्ड वेस्टिंग रेट में भारत सबसे आगे

इसमें कहा गया है, ‘‘भारत में ‘चाइल्ड वेस्टिंग रेट’ (ऊंचाई के हिसाब से कम वजन) 19.3 प्रतिशत है जो दुनिया के किसी भी देश में सबसे अधिक है और भारत की बड़ी आबादी के कारण यह इस क्षेत्र के औसत को बढ़ाता है.’’


रिपोर्ट में कहा गया है कि दुनिया में सबसे अधिक भूख के स्तर वाले क्षेत्र, दक्षिण एशिया में बच्चों में नाटापन की दर (चाइल्ड स्टंटिंग रेट) सबसे अधिक है. भारत, पाकिस्तान और अफगानिस्तान में बच्चों में नाटापन की दर (चाइल्ड स्टंटिंग रेट) 35 से 38 फीसदी के बीच है और क्षेत्र में अफगानिस्तान में यह दर सबसे अधिक है.

भारत में 22.43 करोड़ की आबादी अल्पपोषित

भारत में अल्पपोषण की व्यापकता 2018-2020 में 14.6 प्रतिशत से बढ़कर 2019-2021 में 16.3 हो गयी है. इसका मतलब है कि दुनियाभर के कुल 82.8 करोड़ में से भारत में 22.43 करोड़ की आबादी अल्पपोषित है.


पांच साल की आयु तक के बच्चों में मृत्यु दर के सबसे बड़े संकेतक ‘चाइल्ड वेस्टिंग’ की स्थिति भी बदतर हुई है. 2012-16 में 15.1 प्रतिशत से बढ़कर 2017-21 में यह 19.3 प्रतिशत हो गया है.


जीएचआई ने कहा, ‘‘अनुसंधानकर्ताओं ने चार भारतीय राज्यों छत्तीसगढ़, गुजरात, ओडिशा और तमिलनाडु में 2006 से 2016 के बीच नाटेपन की स्थिति में गिरावट के लिए जिम्मेदार कारकों की पड़ताल की.’’


रिपोर्ट में कहा गया है कि अनुसंधानकर्ताओं ने पाया कि स्वास्थ्य एवं पोषण की स्थिति, घरेलू स्थिति (जैसे कि सामाजिक-आर्थिक स्थिति एवं खाद्य सुरक्षा) और मातृत्व कारक (जैसे कि माताओं का स्वास्थ्य और शिक्षा) में सुधार आने के कारण नाटेपन की दर में गिरावट आयी.

संघर्ष, जलवायु संकट बड़ी बाधा

जीएचआई ने कहा कि दुनिया संघर्ष, जलवायु संकट और यूक्रेन में युद्ध के साथ ही कोविड-19 महामारी के आर्थिक परिणामों के साथ भूख को खत्म करने के प्रयासों में गंभीर चुनौती का सामना कर रही है.


रिपोर्ट में आगाह किया गया है कि वैश्विक संकट के बढ़ने पर हालात और बिगड़ सकते हैं. इसमें कहा गया है, ‘‘संभावित समाधान और आवश्यक निवेश का पैमाना ज्ञात और परिमाणित है. इसके बजाय, समस्या नीति के क्रियान्वयन में है और दुनिया में राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी है.’’

सरकार ने पिछले साल कहा था- GHI भूख मापने का गलत पैमाना

पिछले साल खाद्य एवं उपभोक्ता मामलों की राज्य मंत्री साध्वी निरंजन ज्योति ने एक सवाल के लिखित जवाब में राज्यसभा में कहा था कि वैश्विक भूख सूचकांक (जीएसआई) भारत की वास्तविक स्थिति नहीं चित्रित करता क्योंकि यह भूख मापने का गलत पैमाना है.


मंत्री ने कहा था कि वैश्विक भूख सूचकांक की गणना चार संकेतकों - कुपोषण, बच्चों का बौनापन, बच्चों में अवरूद्ध विकास और शिशु मृत्यु दर के आधार पर की जाती है. केवल एक संकेतक यानी बच्चों में कुपोषण ही भूखमरी से सीधे संबंधित है. उन्होंने कहा था कि शायद ही ऐसे कोई साक्ष्य हैं जिससे यह पता चलता हो कि चौथा संकेतक यानी शिशु मृत्यु दर भूखमरी का नतीजा है.


साध्वी ने जोर दिया था कि सरकार ने देश में भूख के निराकरण के लिए राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून 2013 लागू किया है और साथ ही प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना के तहत खाद्य सुरक्षा कानून के दायरे में आने वाले लाभार्थियों को प्रति व्यक्ति प्रति माह अतिरिक्त पांच किलोग्राम खाद्यान्न निशुल्क दिया जाता है.

विपक्ष ने सरकार पर हमला बोला

भूख सूचकांक में भारत की स्थिति को लेकर सामाजिक कार्यकर्ताओं और नेताओं ने सरकार पर निशाना साधा है.

मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के वरिष्ठ नेता सीताराम येचुरी ने कहा कि सरकार को 8.5 वर्ष में भारत को अंधकार के इस युग में लाने की जिम्मेदारी लेनी चाहिए.


उन्होंने ट्वीट किया, ‘‘2014 के बाद से वैश्विक भूख सूचकांक में भारत की खतरनाक, तेज गिरावट. मोदी सरकार भारत के लिए विनाशकारी है. ‘बफर स्टाक’ से ऊपर बेहद कम खाद्य भंडार की वजह से महंगाई बढ़ रही है. 8.5 वर्ष में भारत को अंधकार के इस युग में लाने की जिम्मेदारी सरकार को लेनी चाहिए.’’


कांग्रेस नेता पी. चिदंबरम ने कहा, ‘‘माननीय प्रधानमंत्री बच्चों में कुपोषण, भूख, नाटेपन और ‘चाइल्ड वेस्टिंग रेट’ जैसे वास्तविक मुद्दों से कब निपटेंगे? भारत में 22.4 करोड़ लोगों को अल्पपोषित माना जा रहा है.’’


उन्होंने एक अन्य ट्वीट में कहा, ‘‘2014 के बाद से मोदी सरकार के आठ वर्ष में हमारा ‘स्कोर’ खराब हुआ है, 16.3 प्रतिशत भारतीय अल्पपोषित हैं जिसका मतलब है कि उन्हें पर्याप्त भोजन नहीं मिलता है. हिंदुत्व, हिंदी थोपना और नफरत फैलाना भूख मिटाने की दवा नहीं है.’’