भारतीय स्टार्टअप को सिलिकॉन वैली से प्रेरित होने की जरूरत नहीं है- इंडियाकोशेंट के आनंद लूनिया

By Sampath Putrevu
February 24, 2020, Updated on : Mon Feb 24 2020 06:31:30 GMT+0000
भारतीय स्टार्टअप को सिलिकॉन वैली से प्रेरित होने की जरूरत नहीं है- इंडियाकोशेंट के आनंद लूनिया
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1998 में IIM लखनऊ से MBA करने के बाद, इंडियाकोशेंट (IndiaQuotient) के आनंद लूनिया ने ICICI के साथ एक फंड मैनेजर के रूप में अपना करियर शुरू किया, और विभिन्न लीडरशिप भूमिकाओं में Lionbridge और Hurix Technologies के साथ भी रहे।


इंडियाकोशेंट (IndiaQuotient) के आनंद लूनिया

इंडियाकोशेंट (IndiaQuotient) के आनंद लूनिया



उन्होंने डॉटकॉम बूम के आसपास अपनी पहली एडटेक कंपनी ब्रेनविसा (Brainvisa) शुरू की, जो भारत की सबसे बड़ी ई-लर्निंग कंपनियों में से एक में बदल गई। 2007 में, इसे Indecomm Global Services द्वारा अधिग्रहित किया गया था।


2007 और 2012 के बीच, आनंद एक एंजेल निवेशक बन गए और इंकफ्रूट, मायडेंटिस्ट और फासोस जैसे स्टार्टअप में निवेश किया। वह सीडफंड के साथ पार्टनर भी थे, जो एक अर्ली-स्टेज वेंचर कैपिटल फंड है जिसे कारवाले और रेडबस में अपने सफल एग्जिट के लिए जाना जाता है।


फिर, वह IndiaQuotient में बौतर फाउंडिंग पार्टनर की भूमिका निभाने के लिए जुड़े, जो वीसी फर्म है जिसने पिछले आठ वर्षों में अपनी 50 से अधिक पोर्टफोलियो कंपनियों में निवेश किया है। IndiaQuotient फिनटेक, एडटेक, सोशल नेटवर्किंग, लॉजिस्टिक्स, हेल्थकेयर और अन्य उपभोक्ता व्यवसायों पर ध्यान केंद्रित करता है।


आनंद की कुछ पोर्टफोलियो कंपनियों में शेयरचैट, क्लिप और लोनटैप शामिल हैं। द इंडस एंटरप्रिन्योर (TiE) के एक चार्टर्ड मेम्बर के रूप में, आनंद ने टीआईई मुंबई के बोर्ड में भी काम किया है। इसके अतिरिक्त, वे एक सेक्टर-एग्नोस्टिक और एनवायरनमेंट और क्लाइमेट चेंज-सेंट्रिक फंड मैसिव फंड में सलाहकर भी हैं। प्राइम वेंचर पार्टनर्स में कम्युनिटी हेड सिद्धार्थ अहलूवालिया ने 100X एंटरप्रेन्योर पॉडकास्ट के इस एपिसोड में आनंद बुलाया और उनसे खुलकर बात की। 100X एंटरप्रेन्योर पॉडकास्ट एक सीरीज है जिसमें फाउंडर्स, वेंचर कैपिटलिस्ट्स और एंजेल इनवेस्टर्स को बुलाया जाता है।


यहां सुनिए आनंद के साथ सिद्धार्थ की पूरी बातचीत:




भारत में उत्पादों को तर्कसंगत बनाना

आनंद इस बारे में विस्तार से बात करते हैं कि कैसे भारत में उपभोक्ता धीरे-धीरे एक निश्चित पैटर्न या उत्पाद से विकसित होते हैं और ये एक सांस्कृतिक चीज बन चुकी है। उन्होंने उन एनआरआई वीसी के बारे में भी बात है जो भारत लौटे और यहां के संस्थापकों के साथ उनके बुरे अनुभव रहे हैं। साथ ही आनंद ने इस बारे में भी बात की कि कैसे वे भारत आते हैं लेकिन एक पूर्वनिर्धारित मानसिकता के साथ- ओला और फ्लिपकार्ट के अर्ली वर्जन को उबर और अमेजॉन से तुलना करते हैं। उनका कहना है कि पहले ये कहा जाता था कि भारत में अच्छे प्रोडक्ट मैनेजर्स नहीं हैं, खासकर जब किसी को उपयोगकर्ता अनुभव के बारे में बात करनी हो तब।


वे कहते हैं,

"जब बात यूजर-एक्सपीरियंस की आती है तो, आज ओला ने उबर को पीछे छोड़ दिया है, तो इसी तरह उबर इसके फीचर्स और इंटीग्रेशन की कॉपी कर रही है। अमेजॉन के साथ भी यही है - फ्लिपकार्ट के स्वामित्व वाली Myntra के पास अमेजॉन और यहां तक कि फ्लिपकार्ट की तुलना में बेहतर यूजर-एक्सपीरियंस है जबकि अमेजॉन अभी भी 2013 के बाद से भारतीय ई-कॉमर्स में नंबर एक स्थान पर पहुंचने के लिए पकड़ बना रहा है।"


भारत में अपना बेस खड़ा करने की कोशिश कर रही अमेरिकी कंपनियों के बारे में बोलते हुए आनंद आगे कहते हैं कि फेसबुक व्हाट्सएप और इंस्टाग्राम से मिल रहे नंबर्स के कारण सर्वाइव कर रहा है, लेकिन भारतीय संस्कृति की संपूर्णता फेसबुक से ही आगे बढ़ी है।


इकोसिस्टम के आसपास जो कुछ भी हो रहा है, उसको लेकर आनंद कहते हैं कि इंडियाकोशेंट उन संस्थापकों और उत्पाद प्रबंधकों को सपोर्ट करना चाहता है जो इस छोटे चौराहे को पा रहे हैं।


इन्वेस्टमेंट थीसिस

जब IndiaQuotient शुरू हुआ, तो यह वास्तव में अपने साइंस और थीसिस के हिस्से के रूप में फंड मैनेजमेंट का फैक्टर नहीं था। वास्तव में बहुत ही सिंपल थंब रूल्स थे कि यह कितने निवेश कर सकता है। लेकिन, जब फर्म ने बाहर से पैसा जुटाना शुरू किया और अपने दोस्तों और परिवार के हलकों से बाहर निकलकर निवेश करना शुरू किया, तो जवाबदेही और जिम्मेदारी और बढ़ गई, और एक फंड रणनीति तैयार की गई।





इसका मतलब यह था कि फंड के लिए एक संतुलित पोर्टफोलियो की जरूरत थी, और सोशल मीडिया स्टार्टअप्स पर दांव लगाने के मुकाबले सफलता के बड़े अवसरों के साथ कंपनियों में रणनीतिक निवेश किया जाना था।


वे कहते हैं,

"धीरे-धीरे, हम समझ गए कि हम कुछ ऐसे स्पेसेस पर दांव लगाना चाहते हैं जहाँ हम किसी कंपनी में निवेश करने के लिए अपना अधिकार अर्जित कर सकें जैसे कि शेयरचैट। मतलब, हमारे पास इतनी आजादी तो होनी चाहिए कि हम असामान्य और अपरंपरागत दांव लगाने के लिए तैयार रहें। और ये दांव लगाने का विश्वास उधार देने वाली कंपनियों में निवेश करने से आया है।"


उन्होंने बताया कि इसी तरह से IndiaQuotient ने अपने लिए एक संतुलित पोर्टफोलियो बनाने के लिए एक रोडमैप की पहचान की। आनंद उन उद्योग लीडर्स में से एक हैं, जो दृढ़ता से इस बात के खिलाफ सलाह देते हैं कि भारतीय स्टार्टअप को सिलिकॉन वैली से प्रेरित होना चाहिए।


आनंद बताते हैं,

“केवल वे लोग जो भारतीय बाजार को नहीं समझते हैं, वे इस तरह की तुलना करते हैं। यह कभी-कभी उन लोगों को देखना हास्यप्रद लगता है जो कुछ सालों से यहां हैं और विदेशी पर्यटकों की तरह व्यवहार करते हैं, और जिन्हें लोकल दलालों ने ठगा होता और फिर वे भारत के बहुत छोटे होने की शिकायत करते हैं। लेकिन सच्चाई ये है कि अमेरिका में भी 300 मिलियन डॉलर का फंड अर्ली स्टेज की कंपनियों के लिए नहीं है। जब हम किसी की कीमत तय करते लेते हैं, तो हम क्रय शक्ति समता का उपयोग करते हैं। लेकिन जब धन जुटाया जाता है, तो समता की कोई अवधारणा नहीं होती है। केवल सही साइज के फंड ही अच्छा रिटर्न देंगे।”


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