अपनी हरगिला आर्मी के जरिए सारस पक्षी को विलुप्त होने से बचा रही है यह बायोलॉजिस्ट

By Rekha Balakrishnan
April 30, 2022, Updated on : Fri May 06 2022 06:03:54 GMT+0000
अपनी हरगिला आर्मी के जरिए सारस पक्षी को विलुप्त होने से बचा रही है यह बायोलॉजिस्ट
बायोलॉजिस्ट पूर्णिमा देवी बर्मन ने ग्रामीण असम में 10,000 से अधिक महिलाओं की एक हरगिला आर्मी तैयार की है ताकि विलुप्त होती सारसों की प्रजाती यानी ग्रेटर एडजुटेंट स्टॉर्क (हरगिला) को बचाया जा सके। यह एक जन आंदोलन है जिसने महिलाओं को नेता और संरक्षणवादी बनने का अधिकार भी दिया है।
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2007 में, जब पूर्णिमा देवी बर्मन ने ग्रेटर एडजुटेंट स्टॉर्क (Hargila) पर पीएचडी की शुरुआत की, तो उन्हें कम ही पता था कि वह जल्द ही एक जन आंदोलन को जन्म देंगी। एक ऐसे आंदोलन को जो न केवल पक्षी को विलुप्त होने से बचाएगा, बल्कि हजारों महिला संरक्षणवादियों की हरगिला आर्मी बनाने, मानसिकता बदलने और आजीविका प्रदान करने का काम करेगा। बता दें कि सारस को बंगाल और असम में हरगिला कहा जाता है।

पूर्णिमा देवी बर्मन


पंद्रह साल पहले, पूर्णिमा को असम के कामरूप जिले के दादरा गाँव से एक घबराहट भरा कॉल आया। वह एक विशाल कदंब के पेड़ को काट रहे लोगों को खोजने के लिए निकल पड़ीं। यह पेड़ सारस के घोंसलों का घर था और वह जमीन पर गिरे नौ सारस चूजों को बचाने में सफल रहीं।


वे कहती हैं, "तब मुझे एहसास हुआ कि ऐसी रिसर्च का कोई मतलब नहीं है अगर मुझे यह ही नहीं पता कि एक संरक्षणवादी कैसे बनना है। जब मैंने जमीन पर पक्षियों के नन्हे-मुन्नों बच्चों को देखा, तो इसका मुझ पर गहरा असर हुआ। मैं ढाई साल के जुड़वा बच्चों की माँ थी और मैं माँ की निराशा से खुद को जोड़ सकती थी।”


हालांकि, जब उन्होंने पक्षी के महत्व और प्रजनन के मौसम के बारे में बताया तो ग्रामीणों ने उनका मजाक उड़ाया। सभी ग्रामीणों ने सारस (या हरगिला, जैसा कि इसे स्थानीय भाषा में कहा जाता है) को एक अपशकुन, और एक ऐसे पक्षी के रूप में देखा जो आसपास के वातावरण को बदबूदार और गंदा करता है। केवल भारत और कंबोडिया में मौजूद सारस, असम और बिहार में कुछ जगहों तक ही सीमित है। यह एक विशाल पक्षी है, जिसकी ऊंचाई 145-150 सेमी होती है, यह एक स्कैवेंजर (मुर्दाखोर) है, और इसलिए इसे गांवों में 'गंदा' माना जाता है।


यह एक पक्षियों की लुप्तप्राय प्रजाति है। अनुमान लगाया गया है कि दुनिया में केवल 1,200 पक्षी बचे हैं। पूर्णिमा जानती थीं कि पक्षी को विलुप्त होने से बचाने के लिए मानसिकता बदलना ही एकमात्र रास्ता है।


वे कहती हैं, “मैं ग्रामीणों के पास जाती थी। जब वे मुझे देखते थे, तो ऐसी शक्ल बना लेते थे जैसे मैं भी पक्षियों की तरह महक रही थी क्योंकि मैं उनका (पक्षियों का) प्रतिनिधित्व कर रही थी। मैं निडर थी। मैं अपने मिशन के साथ आगे बढ़ी। मैं उन्हें समझाती रही कि ये पक्षी हमारी संस्कृति का हिस्सा हैं, ये हमारे परिवेश को साफ करते हैं और हमें इन्हें बचाना चाहिए।”


यही नहीं, उन्होंने उन पक्षियों की तुलना अपने बच्चों तक से की। उन्होंने लोगों से कहा कि अगर उनकी बेटियों ने गंदगी की है, तो उन्हें उन्हें साफ करने में खुशी होगी। उन्होंने ग्रामीणों से पक्षियों को अपनी तरह समझने का आग्रह किया।

हरगिला आर्मी

पूर्णिमा ने तब महिलाओं को शामिल करने और उन्हें संरक्षण बैठकों में शामिल होने के लिए प्रोत्साहित करने का फैसला किया, लेकिन उन्होंने उनके इस आइिया का भी मजाक उड़ाया।

महिलाओं को शिक्षित करते हुए पूर्णिमा

महिलाओं को शिक्षित करते हुए पूर्णिमा

वे कहती हैं, "स्वामित्व निर्माण महत्वपूर्ण था। मैंने खाना पकाने के उत्सवों, प्रतियोगिताओं का आयोजन करना शुरू कर दिया, उन्हें इसमें शामिल होने के लिए प्रोत्साहित किया जहां मैं समझाती थी कि पक्षी को बचाना क्यों महत्वपूर्ण है।"


जब वह एक ग्रामीण के घर गईं और उसकी गर्भवती पत्नी को गोद भराई के समय देखा, तो उन्हें एक और आइिया आया।


वे बताती हैं, “मैंने महिलाओं से कहा कि अगर गर्भवती महिलाओं को सम्मान मिल रहा है, तो हरगिला को भी सम्मान मिलना चाहिए नाकि उनके बच्चों को ऐसे फेंक देना चाहिए। मैंने उन्हें मंदिर, प्रार्थना कक्ष और अन्य स्थानों में हरगिला गोद भराई के लिए आमंत्रित करना शुरू कर दिया और इसे हरगिला को सेलिब्रेट करते हुए लोक और प्रार्थना गीतों के साथ एक जागरूकता अभियान में बदल दिया।”


धीरे-धीरे महिलाओं का आना-जाना शुरू हो गया। पूर्णिमा ने उन महिला बुनकरों के लिए करघे खरीदे, जिन्होंने हरगिला छापे के साथ सुंदर कपड़े तैयार किए जो अब दुनिया भर में बेचे जाते हैं।


महिलाओं का एक छोटा समूह एक जन सामाजिक आंदोलन और हरगिला आर्मी का केंद्र बन गया, जिसमें अब 10,000 से अधिक महिलाएं हैं, सभी सक्रिय संरक्षणवादी, एक अंतर बनाने के लिए सशक्त हैं।

बदलाव के लिए एक कदम

पूर्णिमा अपनी आंखों में आंसू नहीं रोक पाती हैं जब वह बताती हैं कि हरगिला सेना ने असम के दादरा, पचरिया और सिंगिमारी जिलों में क्या प्रभाव डाला है।


वे बताती हैं, “हर दिन, मैं हरगिला सेना का जश्न मनाती हूं। जब मैंने अपना आंदोलन खरोंच से शुरू किया, तो मुझे केवल पक्षी और दृढ़ संकल्प के लिए मेरा प्यार था। अब, यह एक सामाजिक आंदोलन है जहां गृहिणियां संरक्षणवादी बन गई हैं। वे ऐसी नेता हैं जो इसके लिए अपने परिवारों को भी शामिल कर रही हैं।”


बायोलॉजिस्ट और संरक्षणवादी (कंजर्वेशनिस्ट) अपने रास्ते में बाधाओं के बावजूद एक लंबा सफर तय किया है।


पूर्णिमा कहती हैं, “लोगों ने महिला कंजर्वेशनिस्ट को देखा। बहुत सारी चुनौतियों के साथ मेरा काम भी कठिन और शारीरिक था। लेकिन ग्रामीण महिलाओं को नेता बनने के लिए शिक्षित करना और कारण के स्वामित्व का दावा करना महत्वपूर्ण था। तभी चीजें बेहतर के लिए बदलेगी।”


जहां सारस एक लुप्तप्राय प्रजाति बना हुआ है, इसकी संख्या बढ़ रही है। 27 घोंसलों से, अब 250 हो गए हैं और हरगिला सेना और ग्रामीण आगे प्रजनन को सक्षम करने के लिए इसकी सुरक्षा सुनिश्चित कर रहे हैं।


पूर्णिमा को 2017 में नारी शक्ति पुरस्कार और यूके से व्हिटली पुरस्कार के साथ उनके काम को मान्यता मिली।


पूर्णिमा का जीवन और कार्य पृथ्वी दिवस पर शुरू किए गए नेशनल ज्योग्राफिक 'चेंज फॉर वन' अभियान का हिस्सा है।


वे बताती हैं, "यह न केवल मेरे लिए, बल्कि हरगिला पक्षी, हमारी सेना और मेरे समुदाय के लिए सम्मान की बात है, और उम्मीद है कि यह अन्य लोगों को संरक्षणवादी बनने के लिए प्रेरित करेगा।"


वह यह भी मानती हैं कि सामुदायिक संरक्षण एक कभी न खत्म होने वाली प्रक्रिया है।


पूर्णिमा कहती हैं, "मैं अपने काम को जारी रखना चाहती हूं और मैं अपनी आखिरी सांस तक इस उद्देश्य के लिए प्रतिबद्ध हूं। अगले चरण में, मैं चाहती हूं कि हरगिला सेना संरक्षण मॉडल को अन्य जगहों पर, सारस और पक्षियों की अन्य प्रजातियों के साथ दोहराया जाए।”


Edited by रविकांत पारीक

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