दिमाग़ नहीं अवचेतन बनाता है अमीर: नेपोलियन हिल की Think and Grow Rich का गुरुमंत्र

By Prerna Bhardwaj
June 20, 2022, Updated on : Tue Jun 21 2022 06:20:39 GMT+0000
दिमाग़ नहीं अवचेतन बनाता है अमीर: नेपोलियन हिल की Think and Grow Rich का गुरुमंत्र
आज की तारीख़ में भी अमेजन पर हिंदी की टॉप 50 बेस्टसेलर किताबों में में शामिल नेपोलियन हिल की यह किताब चौरासी साल पहले लिखी गयी थी. इसने सिखाया कि अमीर बनने लिए सबसे ज़्यादा ज़रूरी होता है अपने अवचेतन मस्तिष्क को ट्रेन करना.
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थॉमस एडिसन ने 10,000 प्लान बनाए थे. और उसके बाद ही बिजली के बल्ब का आविष्कार करने वाला प्लान बना पाए थे. उनके सफल होने के पीछे यह सबसे बड़ी वजह थी कि उन्होंने कभी प्लान करना नहीं छोड़ा. सफल होने की गारंटी अगर कोई चीज़ दे सकती है तो वह है प्लानिंग.


नेपोलियन हिल की किताब “थिंक एंड ग्रो रिच” [Think and Grow Rich] यह बताती है कि ऐसा करने का सबसे प्रभावी तरीक़ा क्या है? प्लानिंग यह नहीं है कि अमुक लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए अमुक लोगों को अमुक काम एक तय समय सीमा में करना है. हिल के मुताबिक़ असली प्रभावी प्लानिंग वह होती है जिसमें हम अपनी इच्छाओं को अवचेतन के स्तर पर समझ कर प्लान करना सीख जाते हैं. ऐसी प्लानिंग को यह किताब सफ़लता का मूल-मंत्र मानती है. 1937 में पहली बार प्रकाशित हुई इस किताब की अब तक 100 मिलियन से ज्यादा प्रतियां बिक चुकी हैं. इस किताब को सेल्फ-हेल्प केटेगरी या मोटीवेशनल किताबों का पितामह माना जाता है क्योंकि यह अमीर या सफल कैसे बने सिखाने वाली पहली किताब थी.


जीतने वालों का एटिट्यूड समझने और समझाने वाली इस किताब को लिखने में हिल को 20 से 25 साल लग गए. हिल ने दुनिया के सबसे अमीर 500 लोगों के इंटरव्यू किये. उनसे बात करते हुए हिल ने उन सबकी सोच में एक पैटर्न देखा जिसका सार उन्होंने 13 सीख के रूप में इस किताब में प्रस्तुत किया. लेकिन जो बात इस किताब को और सभी किताबों से अलहदा करती है वो है अवचेतन मस्तिष्क के महत्त्व को प्लानिंग से जोड़ना.


किताब की शुरुआत में ही रीडर्स को निर्णय लेने की ताकीद दी जाती है. हिल लिखते हैं, सबसे पहले यह तय कीजिये आपको कितनी दौलत चाहिए, किस तारीख तक चाहिए, और साथ ही साथ यह भी तय कीजिये कि उतनी दौलत पाने के लिए आप क्या-क्या खोने के लिए तैयार हैं.


हिल के मुताबिक़, अगर आप अपने दिमाग़ को दिन-ब-दिन एक लक्ष्य के लिए ट्रेन कर लेते हैं तो समझिये आपने आधी लड़ाई जीत ली है. जो ख़याल आपके दिमाग़ को डोमिनेट करता है, दिमाग़ आपकी सोच को उस ख़याल की दिशा में मोड़ देता है और आपको उसे पूरा करने में लगा देता है. इसीलिए हर दिन लगभग 30 मिनट जो आपका चाहते हैं उसकी कल्पना करने में लगाने चाहिये.


दिमाग़ की ट्रेनिंग तभी तभी होगी जब अवचेतन मस्तिष्क में भी वही चीज़ चलती रहे जो दिमाग़ में चल रही हो. लेकिन हिल लिखते हैं कि अवचेतन मस्तिष्क की ट्रेनिंग बाक़ी मस्तिष्क की ट्रेनिंग से अलग होती है. अवचेतन मस्तिष्क उन विचारों को ग्रहण करता है जिन्हें आप सिर्फ़ सोचते नहीं बल्कि महसूस भी करते हैं.


हिल कहते हैं कि अपनी सोच या विचारों को महसूस करने के लिए हमें उनमे शिद्दत से यकीन रखना पड़ता है, उनके प्रति पैशनेट होना होता है. इस तरह की शिद्दत को हिल “बर्निंग डिजायर” कहते हैं. ऐसा अक्सर होता है कि हम ख्वाहिश (wishful thinking) को कामना समझ लेते हैं. सघन कामना बहुत कम लोगों में होती है. विशफुल थिंकिंग वो होती है जब हम दूसरों की तरक्की या सफलता देखकर खुद के बारे में कुछ वैसा ही चाहने-सोचने लग जाते हैं. पर हिल चेतावनी देने हैं कि ऐसा सोचना-चाहना हमारा अपना नहीं होता. और अवचेतन मस्तिष्क इस पर प्रतिक्रिया नहीं देता क्यूँकि वह उसी कामना को लेकर सक्रिय होता है जो हमारी अपनी होती है, जिसे हम खुद शिद्दत से महसूस करते हैं. यह चैप्टर इस किताब की रीढ़ है क्योंकि हिल ने उन 500 अमीर लोगों के बीच यही पैटर्न पाया कि उन सभी 500 लोगों में एक “बर्निंग डिजायर” थी.


मुंगेरी लाल के हसीन सपने वाली बात तो सुनी होगी आपने. हिल के मुताबिक़ हसीन सपने देखना, खयाली पुलाव् पकाना अवचेतन मस्तिष्क को ट्रेन करने के लिए जरूरी होता है. क्योंकि कल्पना मस्तिष्क का “वर्कशॉप” होती है.


लेकिन जो हमारे दिमाग के भीतर चल रहा है उसे आकार कैसे दिया जाए? हमारी तरह सोचने वालों लोगों के साथ रहने से, उसी तरह के माहौल में रहने से इन ख़यालों को बल मिलता है.


निर्णय लेना यानि दस तरह के ख़यालों को मस्तिष्क पर काबिज नहीं होने देना दिमाग़ पर कण्ट्रोल होने का मुख्य सूचक है इसीलिए निर्णय लेने की क्षमता को हिल ने सफ़ल लोगों की प्रमुख पहचानों में एक बताया है.


आख़िर में, हिल इन सारे प्रयासों को मेडिटेशन के द्वारा पुख्ता करने की सलाह देते हैं. हिल इसे छठी इंद्रिय [सिक्स्थ सेंस] को डेवेलप करने की प्रक्रिया की तरह देखते हैं जिससे आपको गट-फीलिंग, अवसर को पहचानने की सलाहियत हासिल होती है.


यह किताब अमेरिका में महामंदी [‘द ग्रेट डिप्रेशन’] के दौर में लिखी गयी थी इसलिए कहीं कहीं यह थोड़ी पुरानी और अप्रासंगिक लगती है. उसका मुख्य कारण है पिछले 80 सालों में फायनेंस सेक्टर का बहुत जटिल हो गया है, उस समय के निवेश के नुस्ख़े आज उतने कारग़र शायद न लगे. लेकिन 1937 के 500 सबसे अमीर लोगों की कहानियाँ और उनसे मिलने वाली सीखें आज भी लोगों को प्रेरित कर रही हैं. लिखे जाने के चौरासी साल बाद आज 20 जून 2022 को भी यह किताब अमेजन पर हिंदी की टॉप 50 बेस्टसेलर में शामिल है.