मनमोहन सिंह के वो पांच बड़े फ़ैसले जिन्होंने देश और उसकी इकॉनमी को बदल दिया

By Prerna Bhardwaj
September 26, 2022, Updated on : Mon Sep 26 2022 10:02:25 GMT+0000
मनमोहन सिंह के वो पांच बड़े फ़ैसले जिन्होंने देश और उसकी इकॉनमी को बदल दिया
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1990 के दशक में आमूलचूल आर्थिक स्थिति में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करने वाले मशहूर अर्थशास्त्री और भारत के13वें प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का आज जन्मदिन है. 


26 सितम्बर 1932 को अविभाजित भारत के पंजाब प्रान्त के एक गाँव में जन्मे मनमोहन सिंह ने 22 मई 2004 को प्रधानमंत्री पद की शपथ ली और और 22 मई 2009 को दूसरी बार प्रधानमंत्री बने. उनका राजनीतिक जीवन पी. वी. नरसिम्हा राव के कार्यकाल के दौरान शुरू हुआ जब उन्होंने रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया के इस भूतपूर्व गवर्नर को अपना वित्त मंत्री बनाया.  मनमोहन 1991 से 1996 तक भारत के वित्त मंत्री रहे. 


जब पी वी नरसिम्हा राव 21 जून 1991 को भारत के प्रधानमंत्री बने, उस वक़्त भारत बहुत बुरे दौर आर्थिक दौर से गुज़र रहा था. देश की आर्थिक व्यवस्था इतनी खस्ताहाल थी कि कि भारत डिफ़ॉल्टर होने की कगार पर था.  उनके वित्तमंत्री मनमोहन सिंह ने 21 जुलाई को अपने पहले बजट में ऐसा कुछ पेश किया जिसने भारत की आर्थिक व्यवस्था बदल कर रख दी. मनमोहन सिंह द्वारा 24 जुलाई 1991 को पेश किये इस बजट को भारतीय इतिहास में गेम चेंजर बजट भी कहा जाता है क्योंकि इस बजट ने वैश्विक बाजार के लिए भारत के दरवाजे खोल दिए थे. मनमोहन सिंह ने तीन बड़े बदलाव किए - उदारीकरण, वैश्वीकरण और निजीकरण जिसके अंतर्गत वि‍देश व्‍यापार उदारीकरण, वि‍त्तीय उदारीकरण, कर सुधार और वि‍देशी नि‍वेश जैसे बदलाव किये गए थे. 


डॉ. मनमोहन सिंह आर्थिक विचारक और विद्वान के रूप में प्रसिद्ध है. उनकी अकादमिक उपलब्धियों की फेरहिस्त काफी लम्बी है. भारत के इतिहास में मनमोहन सिंह सबसे ज्यादा पढ़े-लिखे प्रधानमंत्री हैं. आइये एक नज़र डालते हैं उनके सफ़र पर. 


मनमोहन सिंह ने 1948 में पंजाब यूनिवर्सिटी से मैट्रिक परीक्षा पास की. उसके बाद ऑनर्स की डिग्री यूनिवर्सिटी ऑफ कैम्ब्रिज, ब्रिटेन से 1957 में अर्थशास्त्र में प्रथम श्रेणी के साथ हासिल की. फिर डॉ. सिंह ने 1962 में ऑक्सफर्ड यूनिवर्सिटी के नफील्ड कॉलेज से अर्थशास्त्र में डी. फिल किया. पंजाब यूनिवर्सिटी और बाद में प्रतिष्ठित दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर रहे.


फिर वे संयुक्त राष्ट्र व्यापार और विकास सम्मेलन सचिवालय में सलाहकार भी रहे. 1971 में डॉ.मनमोहन सिंह भारत के वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय में आर्थिक सलाहकार के तौर पर नियुक्त किए गए. इसके तुरंत बाद 1972 में उन्हें वित्त मंत्रालय में मुख्य आर्थिक सलाहकार बनाया गया. बाद के वर्षों में वे योजना आयोग के उपाध्यक्ष, रिजर्व बैंक के गवर्नर और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के अध्यक्ष भी रहे. 1987 तथा 1990 में जेनेवा में साउथ कमीशन में सचिव रहे.


मूलतः एक अर्थशास्त्री होने के नाते अपने प्रधानमंत्री के कार्यकाल के दौरान भी उन्होंने देश की अर्थवयवस्था पर पूरा ध्यान दिया, और उस मंत्रालय का काम अपनी देख रेख में ही रखा. उनके कार्यकाल के पाँच हाइलाइट: 


  1. 2007 में भारत की ग्रॉस डोमेस्टिक प्रोडक्ट (GDP) की ग्रोथ 9% पहुँचना जिसके साथ भारत दुनिया का दूसरा सबसे तेज जीडीपी ग्रोथ वाला देश बन गया था. 
  2. 2005 में मनमोहन ने सेल्स टैक्स को हटाकर VAT टैक्स लागू किया. 
  3. मनमोहन सिंह के कार्यकाल में ही राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (National Rural Employment Guarantee Act- NREGA) सितम्बर 2005 पारित हुआ. यह एक्ट ग्रामीण क्षेत्रों से रोजगार की तलाश में बड़े स्तर पर होने वाले पलायन को रोकने और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को न्यूनतम आधार देने के इरादे से लाया गया था.  यह विश्व की एकमात्र ऐसी योजना है जो 100 दिन रोजगार की गारंटी देती है. 2 अक्टूबर 2009 में इसका नाम बदलकर महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (MGNREGA) कर दिया गया. 
  4. 4. ग्रामीण जनता के कल्याण के लिए राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन योजना की शुरुवात. यह योजना देश विदेश सभी जगह सराही गई. 
  5. 5. अमेरिका के राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश के साथ इंडो-यू.एस न्यूक्लिअर डील. इस अग्रीमेंट के तहत इंडिया ने अपने सिविल और मिलिटरी न्यूक्लिअर अलग रखने और साथ ही साथ सारे सिविल न्यूकिलियर फैसेलिटी को इंटरनेशनल अटामिक एनर्जी एजेंसी (IAEA) के अंतर्गत इस्तेमाल करने का करार किया था. मनमोहन सिंह के इस निर्णय का देश में काफी विरोध हुआ था. 


मनमोहन सिंह इस साल 90 बरस के हो गए हैं. उनकी उपलब्धियों और पुरस्कारों की सूची लम्बी है. उनका दूसरा कार्यकाल भ्रष्टाचार के आरोपों और उनकी कार्यशैली के लिए बहुत विवादित रहा.  यद्यपि खुद उन पर भ्रष्टाचार का कोई आरोप नहीं लगा लेकिन उनके नेतृत्व पर प्रश्न उठे. उन्होंने तब अपने एक प्रसिद्ध बयान में कहा था कि इतिहास उन्हें वर्तमान से बेहतर जज करेगा. 


उसके लिए शायद उन्हें और हमें अभी और इंतज़ार करना होगा.