मिलें 19 वर्षीय हर्ष सिंह से, जो धनबाद में पढ़ा रहे हैं कोयला श्रमिकों के 200 बच्चों को और दे रहे हैं भोजन भी

हर्ष सिंह अपने एनजीओ सहदेव फाउंडेशन के माध्यम से झारखंड के झरिया-धनबाद बेल्ट में कोयला श्रमिकों के बच्चों को शिक्षित कर रहे हैं।

Anju Ann Mathew

रविकांत पारीक

मिलें 19 वर्षीय हर्ष सिंह से, जो धनबाद में पढ़ा रहे हैं कोयला श्रमिकों के 200 बच्चों को और दे रहे हैं भोजन भी

Monday June 28, 2021,

5 min Read

"धनबाद के रहने वाले 19 वर्षीय हर्ष सिंह ने सालों से कोयला मजदूरों और उनके संघर्षों को अपनी अल्प दैनिक मजदूरी या कोयले की बोरियों को बेचकर पूरा करते देखा है। हर्ष योरस्टोरी को बताते हैं, कि अपने बच्चों को भी इन बैगों को ले जाते हुए देखना और भी दिल दहला देने वाला था। और फिर यहीं से शुरुआत हुई 30 स्वयंसेवकों की एक टीम के साथ 'सहदेव फाउंडेशन (Sahadeva Foundation)' की"

हर्ष सिंह

हर्ष सिंह

भारत की कोयला राजधानी के रूप में, धनबाद शहर कई कोयला श्रमिकों और उनके परिवारों का घर है। लेकिन, झारखंड के झरिया-धनबाद बेल्ट में इनमें से ज्यादातर परिवार गरीबी से जूझ रहे हैं। धनबाद के रहने वाले 19 साल के हर्ष सिंह ने सालों से इन मजदूरों और उनके संघर्षों को अपनी अल्प दैनिक मजदूरी या कोयले की बोरियों को बेचकर पूरा करते देखा है। हर्ष योरस्टोरी को बताते हैं, कि अपने बच्चों को भी इन बैगों को ले जाते हुए देखना और भी दिल दहला देने वाला था।


वे याद करते हुए कहते हैं,

"उन्होंने मुझे बताया कि वे स्कूल जाना चाहते हैं, लेकिन उन्हें अपने परिवार की देखभाल के लिए पैसे कमाने की भी जरूरत है।"


इनमें से अधिकांश बच्चे न केवल आर्थिक तंगी के कारण स्कूल जाने में असमर्थ हैं, बल्कि उन्हें यह विश्वास दिलाने के लिए भी पाला जाता है कि यह उनका भविष्य है। हर्ष ने उन बच्चों के माता-पिता से संपर्क करने और उन्हें अपने बच्चों को स्कूल जाने देने के लिए मनाने का फैसला किया। वह यह भी सुनिश्चित करना चाहते थे कि उन्हें हर दिन उचित भोजन मिले और इन्हीं सबके चलते 2019 में, उन्होंने लगभग 30 स्वयंसेवकों की एक टीम के साथ सहदेव फाउंडेशन (Sahadeva Foundation) की शुरुआत की।

क्या है सहदेव फाउंडेशन?

फाउंडेशन में 12 शिक्षक हैं - 8 स्वयंसेवक और 4 वेतन भोगी। यह नर्सरी से कक्षा 6 तक 200 से अधिक बच्चों को पढ़ाता है, लेकिन कक्षा 10 तक विस्तार करने की योजना है।


हर्ष कहते हैं, "हमने एक निजी स्कूल के साथ करार किया है, जो हमारे छात्रों को CBSE के साथ उनकी कक्षा 10 की बोर्ड परीक्षा के लिए रजिस्टर करने में मदद करेगा।" शिक्षक अधिकांश बुनियादी विषयों जैसे गणित, विज्ञान, अंग्रेजी और कुछ आर्ट और क्राफ्ट विषयों को भी कवर करते हैं। इसका उद्देश्य शिक्षा की एक ऐसी प्रणाली विकसित करना है जहां छात्र अपनी सोच और तर्क कौशल को सुधारने के लिए अपनी समस्याओं का विश्लेषण स्वयं कर सकें।

सहदेव फाउंडेशन के स्वयंसेवकों में से एक महामारी से पहले छात्रों के लिए कक्षा लेते हुए।

सहदेव फाउंडेशन के स्वयंसेवकों में से एक महामारी से पहले छात्रों के लिए कक्षा लेते हुए।

हर्ष कहते हैं, “हम इनमें से प्रत्येक बच्चे को हर दिन भोजन भी उपलब्ध कराते हैं ताकि उनके पोषण से समझौता न हो। उचित भोजन से ही वे ठीक से अध्ययन कर पाएंगे।” एनजीओ को उनके कॉलेज के सीनियर, पूर्व छात्रों और अन्य शुभचिंतकों के दान से सहायता मिलती है।


गर्मियों के महीनों के दौरान, ग्रामीणों (बच्चों सहित) को अक्सर दूषित नदियों से पानी इकट्ठा करने के लिए लंबी दूरी तय करनी पड़ती है। नतीजतन, वे अक्सर जल जनित बीमारियों और संक्रमण जैसे पीलिया, दस्त और गैस्ट्रोएंटेराइटिस से पीड़ित होते हैं। सायम फाउंडेशन (Saayam Foundation) के साथ साझेदारी में, हर्ष और टीम खरीकाबाद गांव में रहने वाले 200 परिवारों के लिए स्वच्छ पेयजल भी उपलब्ध कराती है।

महामारी में सहायता

महामारी ने कोयला श्रमिकों और विक्रेताओं को बेरोजगार कर दिया है, जो कि गुजारा करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।


हर्ष कहते हैं, “दिहाड़ी मजदूर और कोयला विक्रेता होने के कारण उनका काम बंद कर दिया गया है। वे भीख मांगने के कगार पर हैं, बच्चे बिना खाने के दिन बिता रहे हैं।”


सहदेव के स्वयंसेवक, अन्य गैर सरकारी संगठनों की मदद से, इन 4,000+ परिवारों तक राशन किट वितरित करने के लिए पहुंचे, और DonateKart के माध्यम से धन जुटा रहे हैं।

बिहार बाढ़ के दौरान परिवारों को राहत किट बांटे गए।

बिहार बाढ़ के दौरान परिवारों को राहत किट बांटे गए।

वे कहते हैं, "लगभग 3-4 महीने तक, हमने बच्चों को दिन में दो बार प्रोटीन से भरपूर गर्म भोजन भी दिया।"


कक्षाओं में निरंतरता सुनिश्चित करने के लिए, स्थानीय स्वयंसेवक अपने क्षेत्र के बच्चों तक पहुँचते हैं और अपने ग्रेड और संख्या के आधार पर भीड़ से बचने के लिए एक बार में लगभग चार बच्चों को पढ़ाते हैं। ये स्थानीय स्वयंसेवक समुदाय के अन्य बच्चे हैं, जो निचली कक्षा के छात्रों को पढ़ाते हैं। हर्ष कहते हैं, “महामारी के दौरान, हमने बच्चों को लगभग एक महीने तक दूध भी वितरित किया।”

चुनौतियां और आगे का रास्ता

हर्ष का कहना है कि मुश्किल हिस्सा माता-पिता को एनजीओ में बच्चों को सीखने की अनुमति देना था क्योंकि उनमें से ज्यादातर चाहते थे कि वे काम करें या शादी करें।


वे कहते हैं, “हमने उनसे कहा कि उनके बच्चे शिक्षित होने पर बेहतर नौकरी और अवसर प्राप्त कर सकेंगे। इसके अलावा, बच्चों को एक साथ लाना भी मुश्किल था क्योंकि उनमें से हर एक, एक ही समय में कुछ अलग कर रहा होगा - एक काम कर रहा होगा, दूसरा पढ़ रहा होगा।”

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धन की कमी के कारण दूध वितरण जैसी कुछ पहल रुक गई। इसलिए आगे की राह के लिए, हर्ष कक्षाओं का विस्तार करने और नर्सरी से लेकर पोस्ट ग्रेजुएशन तक, और यहां तक कि उन्हें नौकरी पाने में मदद करने के लिए और अधिक पाठ्यक्रमों तक पहुंचने की उम्मीद करते हैं।


इसके अलावा, वह इन बच्चों के लिए मानसिक स्वास्थ्य सहायता प्राप्त करने का प्रयास कर रहे है।


हर्ष कहते हैं, “कुछ महीने पहले, हमें अपने बच्चों को सलाह देने के लिए मनोवैज्ञानिक मिले थे। हम अपने बच्चों को रोजमर्रा के आघात से निपटने में मदद करने के लिए उन्हें और अधिक बार बुलाने की योजना बना रहे हैं।”


Edited by Ranjana Tripathi