सुप्रीम कोर्ट को BCCI में Moonlighting पर पाबंदी लगाने के लिए क्यों मजबूर होना पड़ा था?

Moonlighting का सबसे रोचक मामला भारतीय क्रिकेट का संचालन करने वाली और खुद को एक निजी संस्था बताने वाली भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (BCCI) से जुड़ा है.

सुप्रीम कोर्ट को BCCI में Moonlighting पर पाबंदी लगाने के लिए क्यों मजबूर होना पड़ा था?

Sunday September 18, 2022,

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पिछले महीने पारंपरिक वर्क कल्चर में विवादित मानी जाने वाली 'Moonlighting' (एक कंपनी के फुल टाइम कर्मचारी रहते हुए पार्ट टाइम काम करने की आजादी) को ऑफिशियली मंजूरी देकर दिग्गज फूड डिलीवरी प्लेटफॉर्म Swiggyस्विगी ने पारंपरिक और खासकर आईटी कंपनियों की तीखी प्रतिक्रिया को न्यौता दे दिया.

पिछले एक महीने के दौरान Wipro Ltd, Infosys, टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (TCS) और IBM ने मूनलाटिंग के खिलाफ बयान देते हुए उसे धोखाधड़ी करार दिया है और कहा है कि यह नैतिकता से जुड़ा मामला है. हालांकि, ऐसा नहीं है कि मूनलाइटिंग की समस्या केवल प्राइवेट कंपनियों तक ही सीमित है. सरकारी नौकरियों में तो मूनलाइटिंग पर पूरी तरह से पाबंदी है तो वहीं संवैधानिक पदों पर बैठे नेताओं को भी लाभ का पद लेने पर पाबंदी लगाई गई है.

लेकिन, मूनलाइटिंग का सबसे रोचक मामला भारतीय क्रिकेट का संचालन करने वाली और खुद को एक निजी संस्था बताने वाली भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (BCCI) से जुड़ा है.

बीसीसीआई द्वारा आयोजित कराई जाने वाली इंडियन प्रीमियर लीग (IPL) में साल 2013 स्पॉट फिक्सिंग मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने 2016 में सबसे पहले तो देशभर में क्रिकेट से जुड़ी संस्थाओं में 'एक व्यक्ति-एक पोस्ट' की नीति लागू करते हुए मूनलाइटिंग पर पाबंदी लगा दी थी. इससे पहले कई पदाधिकारी बीसीसीाई और राज्य क्रिकेट एसोसिएशन दोनों में बने रहते थे और अपने राज्य को फायदा पहुंचाते थे.

यही नहीं, बीसीसीआई को राजनेताओं और नौकरशाहों के चंगुल से मुक्त कराने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने किसी भी लोक सेवक (Public Servants) यानि विधायक, सांसद या फिर सरकार में किसी भी पद पर बैठे व्यक्ति के बीसीसीआई में कोई पोस्ट लेने पर रोक लगा दी थी.

इसके साथ ही 70 साल की उम्र सीमा, एक राज्य क्रिकेट एसोसिएशन का एक वोट, पदाधिकारियों के तीन साल के कूलिंग ऑफ पीरियड के साथ 9 साल तक ही बीसीसीआई में पदाधिकारी बनने के भी नियम लागू किए.

क्या था मामला?

दरअसल, बीसीसीआई द्वारा आयोजित कराई जाने वाली इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) में साल 2013 स्पॉट फिक्सिंग का मामला सामने आया था. स्पॉट फिक्सिंग में राजस्थान रायल्स के साथ न सिर्फ तत्कालीन बीसीसीआई प्रमुख एन. श्रीनिवासन की फ्रेंचाइज टीम चेन्नई सुपरकिंग्स भी फंसी थी बल्कि उनके दामाद गुरुनाथ मैयप्पन इस मामले के आरोपियों में से एक थे, जिससे यह हितों के टकराव का मामला भी बन गया था.

मामला सुप्रीम कोर्ट में पहुंचा तो रिटायर्ड जस्टिस मुकुल मुद्गल की जांच के आधार पर सबसे पहले तत्कालीन बीसीसीआई प्रमुख एन. श्रीनिवासन को उनके पद से हटा दिया गया. वहीं, मामले को बेहद गंभीरता से लेते हुए कोर्ट ने बीसीसीआई में फैली गंदगी को साफ करने का जिम्मा पूर्व सीजेआई आरएम लोढ़ा की समिति को सौंप दिया.

लोढ़ा समिति ने बीसीसीआई में आमूलचूल बदलाव लाने के लिए जनवरी, 2016 में सुप्रीम कोर्ट को अपनी सिफारिशें सौंपी थीं. ये सिफारिशें ऐसी थीं जिनसे बीसीसीआई में शीर्ष पदों पर बैठे लोगों का बोर्ड पर कंट्रोल पूरी खत्म होने वाला था. सुप्रीम कोर्ट ने 'एक व्यक्ति-एक पद' की नीति लागू करने के साथ ही किसी भी लोक सेवक (Public Servants) यानि विधायक, सांसद या फिर सरकार में किसी भी पद पर बैठे व्यक्ति के बीसीसीआई में कोई पोस्ट लेने पर रोक लगा दी थी.

हालांकि, खुद को निजी संस्था मानने वाली बीसीसीआई सुप्रीम कोर्ट के आदेशों को मानने से इनकार करती रही जिसके बाद कोर्ट ने सख्त रवैया अपनाते हुए जनवरी, 2017 में तत्कालीन बीसीसीआई अध्यक्ष और भाजपा सांसद अनुराग ठाकुर (Anurag Thakur) और बीसीसीआई सचिव अजय शिर्के को उनके पदों से हटा दिया था.

इसके बाद ही सुप्रीम कोर्ट द्वारा बीसीसीआई का कामकाज देखने के लिए जनवरी 2017 में पूर्व सीएजी विनोद राय की अध्यक्षता में गठित चार सदस्यीय प्रशासकों की समिति (सीओए) की निगरानी में साल 2019 में बोर्ड के चुनाव हुए और भारतीय क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान सौरव गांगुली (Sourav Ganguly) के बीसीसीआई अध्यक्ष बनने और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह (Amit Shah) के बेटे और 2013 से गुजरात क्रिकेट एसोसिएशन के सचिव रहे जय शाह (Jay Shah) बीसीसीआई के सचिव बने.

सुप्रीम कोर्ट ने लोढ़ा समिति की सिफारिश पर ही राज्य इकाईयों या बीसीसीआई में किसी पदाधिकारी के 6 साल (3+3) से अधिक समय तक पद पर रहने पर पाबंदी लगा दी थी, जिसमें दोनों कार्यकाल के बीच तीन साल का कूलिंग ऑफ पीरियड अनिवार्य था. हालांकि, 2018 में इसमें बदलाव कर इसे 9 साल (6+3) कर दिया गया था.

इसके साथ ही पदाधिकारियों के लिए 70 साल की उम्र सीमा, एक राज्य क्रिकेट एसोसिएशन का एक वोट के भी नियम लागू किए. बीसीसीआई के संविधान में बदलाव के लिए सुप्रीम कोर्ट की अनुमति को भी अनिवार्य बना दिया गया.

पुराने ढर्रे पर लौटती बीसीसीआई

हालांकि, बीते बुधवार को ही सुप्रीम कोर्ट ने बीसीसीआई के संविधान में संशोधन की अनुमति दी जिससे इसके अध्यक्ष सौरव गांगुली और सचिव जय शाह के अनिवार्य ब्रेक (कूलिंग ऑफ पीरियड) पर जाए बगैर पद पर बने रहने का रास्ता साफ हो गया. कोर्ट ने कहा कि एक पदाधिकारी का लगातार 12 साल का कार्यकाल हो सकता है जिसमें राज्य संघ में छह साल और बीसीसीआई में छह साल शामिल हैं लेकिन इसके बाद तीन साल के ब्रेक पर जाना होगा।

वहीं, लोक सेवक (Public Servants) शब्द में भी बदलाव कर उसे केवल मंत्री और सरकारी कर्मचारी (आईएएस अधिकारी) तक सीमित कर दिया गया है. इसका मतलब है कि अब कोई भी विधायक या सांसद राज्य क्रिकेट एसोसिएशन और बीसीसीआई पदाधिकारी पद के लिए चुनाव लड़ सकता है.

मूनलाइटिंग पर कानून क्या कहता है?

अधिकतर पारंपरिक कंपनियां कमर्शियल टर्म्स पर बाहरी काम करने की इजाजत नहीं देती हैं. एचआर प्रोफेशनल्स और लीगल एक्सपर्ट्स का मानना है कि मूनलाइटिंग करते पाए जाने पर कोर्ट्स ने कंपनियों को कर्मचारी को टर्मिनेट करने की मंजूरी दी है.

फैक्टरिज एक्ट के तहत दोहरी नौकरी करने पर पाबंदी है लेकिन कई राज्यों की आईटी कंपनियों पर यह कानून लागू नहीं होता है. कई कंपनियों का मानना है कि दूसरी जॉब और पार्ट टाइम जॉब में अंतर करना जरूरी होता है.

सोशल मीडिया पर कंपनियों के खिलाफ लोगों ने खोला मोर्चा

देश की आईटी कंपनियों द्वारा मूनलाइटिंग के खिलाफ मोर्चा खोले जाने के बाद इन कंपनियों, उनके शीर्ष अधिकारियों और मालिकों के खिलाफ सोशल मीडिया पर मोर्चा खुल चुका है. लोग कंपनी मालिकों के एक से अधिक कंपनी के बोर्ड में बने रहने, शीर्ष अधिकारियों और कर्मचारियों की सैलरी में भारी अंतर, कर्मचारियों से 9 घंटे से ज्यादा काम कराने, वीकेंड वर्क आदि का मुद्दा उठा रहे हैं.

राहुल देब अरु नाम के यूजर अपनी सोशल मीडिया पोस्ट में लिखते हैं कि सबसे पहले इंफोसिस और बाकी कंपनियों को अपने कर्मचारियों से 9 घंटे से ज्यादा काम कराने और वीकेंड वर्क पर रोक लगानी चाहिए. इसके बाद ही उन्हें मूनलाइटिंग के बारे में बात करनी चाहिए. इसके साथ सीईओ और डायरेक्टरों को अपना स्टार्टअप शुरू करने पर भी रोक लगानी चाहिए.

वहीं, विवेक भगेरिया नाम के यूजर लिखते हैं कि कंपनियों को अपने कर्मचारियों से 20 घंटे काम कराने में समस्या नहीं होती है लेकिन अगर वे दिन में 8 घंटे की दो शिफ्ट करेंगे तो इससे उनकी हेल्थ और फोकस पर फर्क पड़ेगा.

वह एक मीडिया रिपोर्ट के हवाले से कंपनी के शीर्ष अधिकारियों और कर्मचारियों की सैलरी में भारी अंतर का चार्ट भी शेयर करते हैं. रिपोर्ट के अनुसार, कंपनी के सीईओ की सैलरी 2012 में 80 लाख रुपये से बढ़कर 2022 में 80 करोड़ रुपये हो गई जबकि किसी फ्रेशर की सैलरी इस अवधि में 2.75 लाख से बढ़कर केवल 3.6 लाख तक पहुंच पाई.


Edited by Vishal Jaiswal