3 साल पूरा होने के बाद ‘वन नेशन, वन राशन कार्ड’ कितना सफल रहा?

By Vishal Jaiswal
August 09, 2022, Updated on : Tue Aug 09 2022 06:36:40 GMT+0000
3 साल पूरा होने के बाद ‘वन नेशन, वन राशन कार्ड’ कितना सफल रहा?
ONORC योजना को सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) के तहत लागू किया गया है. PDS में राज्यों की 40 फीसदी हिस्सेदारी होती है. टेक्नोलॉजी बेस्ड ONORC योजना को केंद्र द्वारा राष्ट्रीय स्तर पर राशन कार्ड ‘पोर्टेबिलिटी’ के लिए लागू किया गया है.
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देश में कहीं से भी खाद्यान्न हासिल करने के लिए लागू की गई ‘एक देश, एक राशन कार्ड’ (ONORC) योजना तीन साल पूरे हो गये हैं. यह योजना अब पूरे देश में लागू कर दी गई है. ONORC को 9 अगस्त, 2019 को चार राज्यों में एक प्रायोगिक परियोजना के रूप में शुरू किया गया था. इसमें असम जून, 2022 में शामिल होने वाला नवीनतम राज्य है.


बता दें कि, ONORC योजना को सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) के तहत लागू किया गया है. PDS में राज्यों की 40 फीसदी हिस्सेदारी होती है. टेक्नोलॉजी बेस्ड ONORC योजना को केंद्र द्वारा राष्ट्रीय स्तर पर राशन कार्ड ‘पोर्टेबिलिटी’ के लिए लागू किया गया है.


यह प्रणाली सभी एनएफएसए लाभार्थियों, विशेष रूप से प्रवासी लाभार्थियों को, बायोमीट्रिक / आधार प्रमाणीकरण के साथ मौजूदा राशन कार्ड के माध्यम से देश में किसी भी उचित मूल्य की दुकान (FPS) से अपने हक के खाद्यान्न का पूरा भाग या कुछ हिस्सा प्राप्त करने की अनुमति देती है.


यह व्यवस्था उनके परिवार के सदस्यों को, यदि कोई हो, उसी राशन कार्ड पर शेष खाद्यान्न प्राप्त करने की अनुमति देती है. इस समय योजना के तहत प्रति माह औसतन लगभग तीन करोड़ लेनदेन दर्ज किए जा रहे हैं. अगस्त, 2019 में स्थापना के बाद से, योजना के तहत लगभग 77.88 करोड़ लेनदेन हुए हैं.


एनएफएसए के तहत, केंद्र लगभग 80 करोड़ पात्र लाभार्थियों को हर महीने प्रति व्यक्ति पांच किलोग्राम खाद्यान्न 2-3 रुपये प्रति किलो की सस्ती दर पर प्रदान कर रहा है. इसके अलावा, केंद्र गरीबों को राहत देने के लिए 80 करोड़ लोगों को हर महीने प्रति व्यक्ति पांच किलो अतिरिक्त खाद्यान्न ‘मुफ्त’ प्रदान कर रहा है.

चुनौतियां:

ONORC योजना की सफलता की बात करने के बीच एक सच्चाई यह भी है कि देश का हर पांचवां परिवार को योजना के लाभों के बारे में जानकारी नहीं है. सोशल इम्पैक्ट एडवाइजरी ग्रुप डलबर्ग ने ओमीद्यार नेटवर्क इंडिया के साथ मिलकर किए गए एक अध्ययन में इसका दावा किया है.


इस अध्ययन में आंध्र प्रदेश, झारखंड, कर्नाटक, राजस्थान और उत्तर प्रदेश में 6700 कम आय वाले घरों औऱ 1500 PDS डीलर्स को शामिल किया गया. अध्ययन में कहा गया है कि ONORC को विशेष रूप से प्रवासियों को लाभ पहुंचाने के लिए डिज़ाइन किया गया था. हालांकि, खाद्यान्न हासिल करने के मामले में वंचित तबके की महिलाओं को इससे ज्यादा फायदा नहीं हुआ है.


1. उत्तर प्रदेश समेत पांचों राज्यों में सिर्फ 48 प्रतिशत लाभार्थी ही राशन कार्ड ‘पोर्टेबिलिटी’ के बारे में जागरूक हैं.


2. पांच राज्यों में 31 फीसदी लाभार्थी आंशिक रूप से ONORC योजना के बारे जागरूक हैं जबकि 20 प्रतिशत लाभार्थी इस योजना के बारे में बहुत ही कम जानते हैं.


3. पोर्टेबिलिटी का उपयोग करने वाले लगभग 88 प्रतिशत परिवार अपना राशन लेने में सफल रहे, जबकि चार प्रतिशत राशन नहीं ले सकें.


4. लेनदेन के विफल होने के कारण 12 प्रतिशत लाभार्थी इस योजना के तहत खाद्यान नहीं खरीद सके.


5. 20 फीसदी प्रवासी परिवारों ने पोर्टेबिलिटी सुविधा का लाभ उठाया जबकि 14 फीसदी परिवारों ने भविष्य में उसका इस्तेमाल करने की बात की.


6. केवल दो फीसदी लाभार्थियों ने अपना आधार, राशन कार्ड से जोड़ा है.


7. राशन कार्ड अपडेट कराने में विधवा और तलाकशुदा महिलाओं को अधिक परेशानी का सामना करना पड़ रहा है.


8. 97 फीसदी पीडीएस डीलर्स राशन पोर्टेबिलिटी के बारे में जानते हैं लेकिन केवल 74 फीसदी इंटरस्टेट पोर्टेबिलिटी फैसिलिटी के बारे में जानते हैं.


9. मांग बढ़ने और स्टॉक खत्म होने के डर से 32 फीसदी पीडीएस डीलर्स इसे अच्छा नहीं मानते हैं.


10. सरकार ने ट्रांजैक्शन फेल हो जाने के बाद भी राशन देने का आदेश दिया है. हालांकि, अधिकतर पीडीएस डीलर्स को यह भी नहीं पता है कि ट्रांजैक्शन फेल हो जाने के बाद उन्हें क्या करना है.