Breast Cancer Research: बाल रंगने और हेयर स्‍ट्रेटनिंग करवाने से बढ़ सकता है ब्रेस्‍ट कैंसर का खतरा

By Manisha Pandey
October 15, 2022, Updated on : Sat Oct 15 2022 04:26:39 GMT+0000
Breast Cancer Research: बाल रंगने और हेयर स्‍ट्रेटनिंग करवाने से बढ़ सकता है ब्रेस्‍ट कैंसर का खतरा
इंटरनेशनल जरनल ऑफ कैंसर में प्रकाशित नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ की कैंसर रिसर्च कहती है कि बालों को कलर करने से बढ़ता है ब्रेस्‍ट कैंसर का खतरा.
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हम प्रकृति के खिलाफ जाकर अपने शरीर पर जितने तरह के आर्टिफिशियल केमिकल इस्‍तेमाल करते हैं, उन सबका शरीर पर कोई न कोई नकारात्‍मक प्रभाव तो पड़ता ही है. लेकिन कुछ केमिकल इतने खतरनाक होते हैं कि वो कैंसर जैसी गंभीर जानलेवा बीमारी का कारण भी बन सकते हैं. दुनिया भर में हुई कई कैंसर रिसर्च में यह बात सामने आई है कि बालों को कलर करने और उनकी स्‍ट्रेटनिंग करने के लिए जिन केमिकल्‍स का इस्‍तेमाल किया जाता है, वो ब्रेस्‍ट कैंसर की संभावना को बढ़ा देते हैं.    


मार्केट रिसर्च रिपोर्ट FactMR की साल 2020 की रिपोर्ट में दावा किया गया था कि 2021 तक पूरी दुनिया में हेयर डाई का ग्‍लोबल मार्केट 21.4 अरब डॉलर का हो जाएगा. उम्र के साथ और कई बार आनुवंशिक कारणों से कम उम्र में ही बाल सफेद होने लगते हैं. चिर युवा दिखने की चाहत में आजकल बालों को कलर करने का चलन काफी बढ़ गया है.


ऐसा नहीं है कि लोग सिर्फ सफेद बालों को काला रंगकर ही खुश हैं. कई बार फैशन और स्‍टाइल के नाम पर लोग काले बालों में भी तरह-तरह के लाल, नीले, पीले, हरे रंग लगाते हैं. आधुनिकता और फैशन की ये अंधी दौड़ स्‍वास्‍थ्‍य के लिए बहुत खतरनाक है. इन रंगों के निर्माण में इस्‍तेमाल होने वाले खतरनाक केमिकल ब्रेस्‍ट कैंसर जैसी बीमारी को न्‍यौता देते हैं.     


नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ की इस पर एक महत्‍वपूर्ण स्‍टडी है, जो  साल 2019 में इंटरनेशनल जरनल ऑफ कैंसर में प्रकाशित हुई है. यह कैंसर रिसर्च कहती है कि नियमित रूप से हेयर डाई का इस्तेमाल करने से ब्रेस्‍ट कैंसर का खतरा 9 गुना बढ़ जाता है. इस स्‍टडी में तकरीबन 46,709 विभिन्‍न आयु और एथनिक समूह की महिलाओं को शामिल किया गया.

permanent hair dye and straighteners may increase breast cancer risk

इस स्‍टडी में प्रमुख रूप से दो बातें उभरकर सामने आईं-


1- जो महिलाएं नियमित रूप से हेयर डाई का इस्‍तेमाल कर रही थीं, उनमें ब्रेस्‍ट कैंसर का संभावित खतरा उन महिलाओं के मुकाबले 9 गुना ज्‍यादा पाया गया, जिन्‍होंने कभी हेयर डाई का इस्‍तेमाल नहीं किया था.


2- साल में कभी एकाध बार हेयर डाई का इस्‍तेमाल करने वाली महिलाओं में ब्रेस्‍ट कैंसर के संभावित खतरे में कोई इजाफा नहीं हुआ.


3- इस स्‍टडी में यह भी पाया गया कि विभिन्‍न एथनिक समूह की महिलाओं में ब्रेस्‍ट कैंसर का खतरा अलग-अलग था. जैसेकि डाई का प्रयोग करने वाली अश्‍वेत महिलाओं में ब्रेस्‍ट कैंसर का खतरा व्‍हाइट महिलाओं के मुकाबले 60 गुना ज्‍यादा पाया गया.


(हालांकि इस स्‍टडी को इस लिहाज से चुनौती भी दी गई है कि हेयर डाई या खतरनाक केमिकल के शरीर पर पड़ने वाले असर का नस्‍ल से कोई लेना-देना नहीं है. डॉ. गाबोर माते लिखते हैं कि अश्‍वेत महिलाओं में ब्रेस्‍ट कैंसर का खतरा सामान्‍य स्थिति में भी व्‍हाइट महिलाओं के मुकाबले 52 फीसदी ज्‍यादा ही है, जिसका मुख्‍य कारण बहुत सुनियोजित तरीके से और बड़े पैमाने पर दशकों से होता आ रहा नस्‍लीय भेदभाव है.)


इस स्‍टडी में हेयर डाई के साथ-साथ हेयर स्‍ट्रेटनिंग और बालों पर अन्‍य केमिकल एक्‍सपेरीमेंट करने वाली महिलाओं में भी ब्रेस्‍ट कैंसर की संभावना बढ़ी हुई पाई गई. वैज्ञानिकों ने पाया कि हेयर स्‍ट्रेटनिंग में इस्‍तेमाल होने वाले केमिकल शरीर के भीतर प्रवेश करके मेलिगनेंसी की संभावना को बढ़ा रहे थे. यह स्‍टडी कहती है कि इस अध्‍ययन में शामिल जो महिलाएं हर पांच से आठ हफ्ते में एक बार हेयर स्‍ट्रेटनिंग करवा रही थीं, उनमें ब्रेस्‍ट कैंसर का संभावित खतरा अन्‍य महिलाओं के मुकाबले 30 गुना ज्‍यादा पाया गया.

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डॉ. अलेक्‍जेंड्रा व्‍हाइट नेशनल इंस्‍टीट्यूट ऑफ इनवायरमेंटल हेल्‍थ साइंस (NIEHS) के कैंसर ऐपिडिमिओलॉजी डिपार्टमेंट की हेड हैं और इस कैंसर रिसर्च स्‍टडी को भी उन्‍होंने लीड किया है. डॉ. अलेक्‍जेंड्रा कहती हैं कि हमारे आसपास के जीवन, पर्यावरण और लाइफ-स्‍टाइल में ऐसे बहुत सारे कारण हैं, जो ब्रेस्‍ट कैंसर के खतरे को बढ़ाने का काम करते हैं. शरीर में मेलिगनेंसी किसी भी वजह से हो सकती है. लेकिन इस तथ्‍य की गंभीरता से इनकार नहीं किया जा सकता कि कॉस्‍मैटिक इंडस्‍ट्री के जरिए बहुत सारे खतरनाक केमिकल्‍स हमारे शरीर में प्रवेश कर रहे हैं.


डॉ. अलेक्‍जेंड्रा कहती हैं कि तकरीबन पचास हजार महिलाओं पर पांच साल तक किए गए इस अध्‍ययन से साफ है कि हेयर डाई और हेयर स्‍ट्रेटनिंग में इस्‍तेमाल होने वाले केमिकल शरीर के लिए खतरनाक हैं और मेलिगनेंसी की संभावना को बढ़ा देते हैं. यह बहुत बड़ा भ्रम है कि बाल एक डेड सेल है और बालों में लगने वाले किसी केमिकल का शरीर पर सीधा प्रभाव नहीं पड़ेगा.


नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ (National Institutes of Health-NIH) के बारे में-

NIH अमेरिका की मेडिकल रिसर्च एजेंसी है. इसके अंतर्गत अमेरिका के हेल्‍थ और ह्यूमन सर्विस डिपार्टमेंट की 27 रिसर्च इंस्‍टीट्यूट और स्‍टडी सेंटर काम करते हैं. यह एजेंसी मानव स्‍वास्‍थ्‍य, बीमारियों और उनके इलाज से जुड़े हर तरह के क्लिनिकल मेडिकल रिसर्च को सपोर्ट करती है.


नेशनल इंस्‍टीट्यूट ऑफ इनवायरमेंटल हेल्‍थ साइंस (NIEHS) के बारे में

NIEHS अमेरिका के नॉर्थ कैरोलाइना में स्थित एक रिसर्च इंस्‍टीट्यूट है, जो पर्यावरण के मानव स्‍वास्‍थ्‍य पर पड़ने वाले प्रभावों से जुड़ी साइंस रिसर्च को सपोर्ट करता है. यह इंस्‍टीट्यूट नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ की ही एक शाखा है.