प्लास्टिक, प्रदूषण और सावर्जनिक भागीदारी: ये स्टार्टअप्स ला रहे हैं समाज में बदलाव

By Shruti Kedia
January 09, 2019, Updated on : Tue Sep 17 2019 14:01:50 GMT+0000
प्लास्टिक, प्रदूषण और सावर्जनिक भागीदारी: ये स्टार्टअप्स ला रहे हैं समाज में बदलाव
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सांकेतिक तस्वीर


"स्टार्टअप्स में लोगों की सक्रिय भागीदारी से कृषि संकट, बढ़ते प्रदूषण को रोकने के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण में भी मदद मिल रही है, ऐसे में योरस्टोरी ने कुछ ऐसे स्टार्टअप्स की लिस्ट बनाई है जो समाज को बदलने में निभा रहे हैं बड़ी भूमिका।"


जैसे ही हम नए साल में आते हैं तो हमारे पास उन चुनौतियों को समझने और हल निकालने का मौका होता है जो भारत ने बीते साल में झेली हैं। अब नागरिक कई सामाजिक क्रियाकलाप में भाग लेकर और हाशिए पर रखे गए समुदायों को समर्थन कर सामाजिक प्रभाव के निर्माण करने में सहयोग दे सकते हैं।


उदाहरण के तौर पर, कॉटन, सिल्क (रेशम) और नाइलन से बने नए कपड़ों के बजाय रिसाइकिल (पुर्ननिर्मित) किए गए फैब्रिक से बने सूट का प्रयोग करके एक व्यक्ति 5 किलो कार्बनडाइऑक्साइड उत्सर्जित होने से बचा सकता है। इसके अलावा वह 5000 लीटर पानी भी बचा सकता है। आज शहरों में रहने वाले लोग शहरी और ग्रामीण जीवनशैली में अंतर को कम करने के लिए काम करने वाले स्टार्टअप्स के साथ मिलकर किसानों की वित्तीय मदद कर सकते हैं। यहां तक कि छुट्टियां भी जनजातीय समुदायों को सशक्त बनाने में मददगार हथियार बन सकती हैं। जब कोई अपनी छुट्टियों में इकोफ्रेंडली यात्रा करना चुनता है तो यह कार्बन फुटप्रिंट कम करने में मदद करता है। स्टार्टअप्स में लोगों की सक्रिय भागीदारी से कृषि संकट, बढ़ते प्रदूषण को रोकने के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण में भी मदद मिलती है। योर स्टोरी ने ऐसे ही कुछ स्टार्टअप्स की लिस्ट बनाई है।  


1. किसानों और कृषक समुदाय के सहायक स्टार्टअप्स


सांकेतिक तस्वीर

कृषि समुदाय के सामने संकट की खबरें कोई नई नहीं हैं। पिछले साल किसानों ने कई समस्याएं झेलीं जिनके कारण उन्हें कई बार प्रदर्शन में भाग लेने के लिए मजबूर होना पड़ा। जहां सरकार पानी की कमी और फसल के मूल्य निर्धारण जैसी समस्याओं से निपटने के लिए तरीके खोज रही है। आम नागरिक भी इस समुदाय की मदद के लिए अपना योगदान दे सकता है।  


आज कई स्टार्टअप्स आम लोगों को कृषि क्षेत्र में भागीदार बनने के लिए प्रोत्साहित कर रहे हैं। मिसाल के तौर पर, बेंगलुरु आधारित फार्मिजेन लोगों को एक मिनी फार्म में केमिकल फ्री ऑर्गैनिक सब्जियां उगाने की सुविधा देता है। इशके लिए लोगों को प्रतिमाह 2500 रुपये का शुल्क देना होता है। इसमें किसानों को दिया जाने वाला मेहनताना भी शामिल है। शुल्क लेकर व्यक्ति को मिनी फार्म में सब्जियां उगाने के लिए 12 बेड दे दिए जाते हैं। इनमें व्यक्ति अपनी इच्छानुसार सब्जियां उगा सकता है। वे फार्मविले जैसे एक ऐप के जरिए उस मिनी फार्म को कंट्रोल कर सकते हैं। वे फार्म को कभी भी विजिट करके अपनी सब्जियों का उपयोग कर सकते हैं।


इसी तरह चेन्नई स्थित आई सपॉर्ट फार्मिंग नाम का स्टार्टअप शहरी निवासियों और किसानों को एक प्लैटफॉर्म पर लाता है और साझेदारी के जरिए कृषि को बढ़ावा देने के लिए प्रेरित करता है। आई सपॉर्ट फार्मिंग के फाउंडर विजय कुमार कहते हैं, 'किसानों के सामने पूंजी की कमी होना एक बड़ी चुनौती है। इसी का समाधान हम करना चाहते हैं। इसलिए हमने शहरी लोगों और ग्रामीण किसानों की साझेदारी के जरिए एक ऐसी प्रणाली स्थापित की है जहां शहरी निवासी आवश्यक पूंजी देता है और किसान बाकी खेती का काम करता है। बाद में हुआ लाभ तीनों साझेदारों किसानों, शहरी निवासी और आई सपॉर्ट फार्मिंग के बीच बांटा जाता है।'  


2. ज्यादा चलने वाले और पुनर्निमाण होने वाले फैशन सामानों को बढ़ावा देना


सांकेतिक तस्वीर

तेल और गैस उद्योग के बाद टेक्सटाइल यानी कपड़ा उद्योग सबसे ज्यादा प्रदूषण फैलाने वाली इंडस्ट्री है। वैश्विक स्तर पर बात करें तो नए निर्मित हुए कपड़ों का लगभग 40 फीसदी कपड़े फेंक दिए जाते हैं और केवल 1 फीसदी कपड़े ही दोबारा से रीसाइकल या पुनर्निमित किए जाते हैं। पूरी तरह से कपड़ा खराब होने से पहले ही उसे फेंक देने वाले चलन को फास्ट फैशन कल्चर कहा जाता है और इसके कारण पर्यावरण पर काफी दबाव बनता है। चाहे फिर वह पानी की मात्रा हो, कॉटन की उगाई के लिए दिए जाने वाले उर्वरकों की खपत में बढ़ोतरी हो या फिर कॉटन स्क्रैप (बचा हुआ कपड़ा) हो। 


उदाहरण के तौर पर, 2016 में स्थापित किए गए खलूम स्टार्टअप को ले लीजिए। इसका उद्देश्य लोगों के बीच रीसाइकल्ड (पुनर्निमित) कपड़ों के चलन को बढ़ाना और कपास (जो कि खत्म सा होता जा रहा है) के प्रयोग में कमी लाना है। जबकि प्रचलन से बाहर हुए कपड़ों को वापस मेन स्ट्रीम फैशन में लाकर फास्ट फैशन इंडस्ट्री द्वारा की जाने वाली वॉटर फुटप्रिंट में कमी और प्रदूषण में बढ़ोतरी को भी कम किया जा रहा है।  


दिल्ली आधारित डूडलेज नाम का स्टार्टअप पुराने कपड़ों को रीसाइकिल करके 18-45 साल की उम्र की लोगों के लिए फैशन के नए कपड़े बनाता है। डूडलेज में अपसाइक्लिंग प्रक्रिया को दौरान इकठ्ठे किए गए कपड़ों से घर की सजावट के सामान और बैग्स बनाए जाते हैं। कोलकाता में रहने वालीं फैशन डिजाइनर परोमिता बनर्जी इस बात पर जोर देती हैं कि रीसाइकिलिंग को जुगाड़ ना समझा जाए। वह फेंके गए कपड़ों को खादी और अलग-अलग रंगों में मिलाकर नए कपड़े बनाती हैं। सबका मिश्रण अलग-अलग होता है।


3. प्लास्टिक प्रदूषण का खात्मा करना

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यह सच है कि प्लास्टिक हमारे जीवन का अभिन्न अंग बन गया है। प्लास्टिक के टूथब्रश से दिन की शुरुआत होती है और प्लास्टिक के कुछ घटकों से बने तकिए से दिन की समाप्ति होती है। प्लास्टिक से पूरी तरह से दूर होना बहुत मुश्किल काम है खासतौर पर चिकित्सा उपचार और खाद्य संरक्षण के क्षेत्रों में। अभी तक दुनियाभर में केवल 9 फीसदी प्लास्टिक ही रीसाइकिल हो पाया है।

कई देश और राज्य एक बार काम आने वाले प्लास्टिक को बैन कर रहे हैं।  

आज कई स्टार्टअप्स और सोशल एन्टरप्राइजेज प्लास्टिक के प्रयोग में कमी और उसके पुनर्चक्रित करने पर काम कर रहे हैं। इसके अलावा शहरों में रहने वाले लोगों की प्रयोग किए गए प्लास्टिक को दोबारा प्रयोग करने लायक बनाने में मदद कर रहे हैं। दिल्ली आधारित रिवर्स वेंडिंग मशीन(आरएमवी) ना केवल खाली बॉटल और ऐल्युमिनियम कैन को स्मार्ट बिन्स (कचरा मशीन) के जरिए इकठ्ठे करते हैं बल्कि ऐसा करने वाले लोगों को डिस्काउंट और कैशबैक जैसे कई ऑफर्स भी देते हैं।


बेंगलुरु का खाली बॉटल नाम का स्टार्टअप भी प्लास्टिक कचरे को कैश में बदलने पर काम कर रहा है। स्टार्टअप ने एक ऑनलाइन प्लैटफॉर्म बनाया है जहां पर ग्राहक (अकेला या कंपनी) रिसाइकलिंग के लिए अपना कचरा इकठ्ठा करने और उसके बदले भुगतान लेने के लिए खुद को रजिस्टर कर सकता है। कचरे को इकठ्ठा किया जाता है, फिर उसे अलग-अलग श्रेणियों जैसे: सॉफ्ट प्लास्टिक, प्लास्टिक बॉटल, ग्लास, कार्डबोर्ड मैटीरियल और मेटल में बांटा जाता है और फिर कैटिगरी के हिसाब से पैक किया जाता है। इसके बाद पूरा प्लास्टिक को कंपनी के बेंगलुरु, मैसूर और हैदराबाद के आसपास आधारिकारिक रीसाइकलिंग प्लान्ट में रीसाइकल होने के लिए भेजा जाता है।


4. कार्बन फुटप्रिंट्स को कम करना या पर्यावरण के अनुकूल पर्यटन 


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पहले की तुलना में लोग आज अधिक यात्रा करने लगे हैं। यहां तक कि छोटे शहरों से अलग-अलग उम्र समूह के लोग भी अपने निजी विकास और ज्ञान को बढ़ाने के लिए प्रायोगिक यात्राओं को एक निवेश के तौर पर चुनते हैं। चाहे वह हिमालय, स्पीति घाटी, लद्दाख, कर्नाटक या उड़ीसा हो, प्रायोगिक और पर्यावरण अनुकूल यात्राएं सभी उम्र के लोगों के बीच काफी लोकप्रिय विकल्प हैं। कई स्टार्टअप्स ने आगे आकर ज्यादा चलने वाले और विकास आधारित पर्यटन के क्षेत्र में कदम रखा है। उदाहरण के तौर पर स्पीति घाटी आधारित इशिता खन्ना के इकोस्फीयर स्टार्टअप को ले लीजिए। यह संगठन एक दृष्टिकोण के साथ जिम्मेदार और टिकाऊ इकोटूरिज्म को बढ़ावा देता है जो एक साथ संरक्षण और लगातार विकास के साथ आर्थिक सशक्तिकरण की चुनौतियों से निपटता है। इसे 2004 में स्थापित किया गया था।


इसने अपने प्रोजेक्ट तब शुरू किए थे जब होमस्टे (यानी किसी यात्रा पर वहां के स्थानीय निवासी के घर पर रुकना) नाम की अवधारणा महज सपना थी। हैदराबाद स्थित ऑफबीट ट्रैक्स नाम का स्टार्टअप संपूर्ण भारत में टिकाऊ और प्रयोगात्मक यात्रा पर फोकस करता है। इसकी स्थापना अप्रैल 2016 में की गई थी। यह कई ग्रामीण समुदायों और स्थानीय निवासियों के साथ मिलकर काम करता है। स्टार्टअप का लक्ष्य हिमालय के स्थानीय लोगों के बीच इको टूरिज्म को बढ़ावा देना, टिकाऊ और अनुभव आधारित पर्यटन को अधिक एडवांस करना और होम स्टे और स्थानीय अनुभवों की अवधारणाओं के जरिए ग्रामीण सूक्ष्म उद्यमियों को विकसित करना है।  


5. कचरे को स्रोत पर ही अलग करना


शहरों में घरों से हर साल 6 करोड़ टन से अधिक कचरा निकलता है। इसमें से लगभग 85 फीसदी रीसाइकलिंग के लायक होता है। दुर्भाग्य से इसमें से अधिकतर कचरा भराव क्षेत्रों में जाकर मिट्टी, हवा और पानी को दूषित करता है। जब वेस्ट मैनेजमेंट (खराब चीजों का प्रबंधन) एक बड़ी समस्या है। ऐसे में यह भारत में एक बड़ा अवसर है। मार्केट रिसर्च कंपनी नोवोनॉस की एक रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2025 तक भारत का वेस्ट मैनेजमेंट बाजार लगभग 13.62 बिलियन डॉलर (लगभग 9.5 खरब रुपये) का हो जाएगा। जहां स्वच्छ भारत अभियान सार्वजनिक और निजी साझेदारी पर ध्यान दे रहा है।


GEM की टीम

वहीं कई स्टार्टअप्स और एनजीओ वेस्ट (कचरे) को उसकी उत्पत्ति पर ही खत्म करने पर काम कर रहे हैं। बेंगलुरु आधारित हसिरू डाला शहर के 25,000 से अधिक घरों से कचरा इकठ्ठा करने का काम करते हैं और हर महीने 700 टन से अधिक कचरे का प्रबंध करते हैं। यह गैर लाभकारी संगठन इवेंट्स, अपार्टमेंट और ऑफिस को कचरा प्रबंधन के उपाय देता है। साथ ही शहरी उद्यानों के प्रबंधन में मदद करता है।


दिल्ली आधारित जीईएम एनवाइर मैनेजमेंट फैक्ट्री, ऑफिस, होटेल और संस्थानों से प्लास्टिक के सामान (पॉलीथिन) पॉलीथीन टेरेफ्थेलेट (पीईटी) कचरा इकठ्ठा करता है। बाद में इससे टी-शर्ट, कैप और बैग जैसे उत्पाद बनाता है। बिल्कुल इसी तरह, चेन्नई स्थित पेपरमैन पूरे शहर में 250 से अधिक वेस्ट पेपर मार्ट्स चलाता है ताकि निवासियों को उनके दरवाजे पर कचरा साफ करने में मदद मिल सके।


6. हरियाली के साथ वायु प्रदूषण से जंग





दिल्ली में हवा की खराब गुणवत्ता केवल सर्दियों या धूल भरी आंधियों तक ही सीमित नहीं रह गई है। वर्ल्ड एयर क्वॉलिटी इंडेक्स के मुताबिक, जून 2018 में दिल्ली में हवा गुणवत्ता खतरनाक स्तर को छू गई। दिल्ली और आसपास के इलाकों में एयर क्वॉलिटी वैल्यू 999 पॉइंट रही जो कि बहुत खतरनाक है। विशेषज्ञों का कहना है कि इतनी जहरीली हवा के संपर्क में आने से सांस संक्रमण, हृदय रोग, स्ट्रोक, फेफड़ों के कैंसर और कई अन्य स्वास्थ्य हालात का खतरा बढ़ जाता है।  

पवन कुमार राघवेंद्रन

हालांकि, भारत में चेतावनी भरा प्रदूषण लेवल दुनिया के बड़े ब्रैंड्स के लिए एक मार्केट अवसर बनकर उभरा। हनीवेल, हैवेल्स, डाइकिन्स, पैनासोनिक जैसे बड़े ब्रैंड्स ने प्रदूषण से बचाव के कई प्रॉडक्ट्स भारतीय बाजार में उतार दिए। कई स्टार्टअप्स भी अपने मेड इन इंडिया और किफायती एयर क्वॉलिटी मोनिटर, मास्क, प्यूरिफायर और बाकी प्रॉडक्ट्स के साथ भारत के एयर प्यूरिफिकेशन मार्केट में उतर गए।


चेन्नै आधारित पीकेआर ग्रीन ऐंड कन्सलटेंट्स कई तरह के मनी प्लान्ट, इंग्लिश इवी और ऐरेका पाम जैसे कई एयर प्यूरिफाइंग प्लान्ट होम डिलिवरी करते हैं। ये सभी प्लान्ट्स अलग-अलग तरीकों से वातावरण को शुद्ध रखते हैं। स्टार्टअप का पहला लक्ष्य है कि घरों, ऑफिसों, कॉम्पलेक्सों, स्टडी सेंटर्स और माल्स में अधिक पौधे हों।

एक गैरलाभकारी अंतरराष्ट्रीय संस्थान इनक्ट्स के लिए काम कर रहे IIT दिल्ली के छात्रों ने घरों में चूल्हे से होने वाले प्रदूषण को कम करने के लिए एक कम धुआं छोड़ने वाला स्टोव बनाया है। इस प्रोजेक्ट का नाम आंच है। इस स्टोव को फिलिप्स ने डिजाइन किया है। यह स्टोव पारंपरिक चूल्हे की तुलना में एक तिहाई लकड़ियों उपयोग करता है।


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