‘प्रोजेक्ट रोशनी’ कैसे गरीब महिलाओं को हेल्थकेयर, रोजगार कमाने में मदद कर रहा है

Roche Diagnostics के सहयोग से मुंबई स्थित एनजीओ SHED द्वारा 2015 में शुरू किया गया ‘प्रोजेक्ट रोशनी’, महाराष्ट्र के पालघर जिले में वंचित महिलाओं को स्वास्थ्य सेवा और आजीविका सहायता मुहैया कर रहा है.

Simran Sharma

रविकांत पारीक

‘प्रोजेक्ट रोशनी’ कैसे गरीब महिलाओं को हेल्थकेयर, रोजगार कमाने में मदद कर रहा है

Monday April 17, 2023,

6 min Read

महाराष्ट्र के पालघर जिले की रहने वाली 35 वर्षीय भाविका भोपी दो-तीन साल से लगातार थकान और वजन बढ़ने की समस्या से जूझ रही थीं. स्थानीय डॉक्टरों से मदद लेने के बावजूद उनकी हालत में सुधार नहीं हुआ.

2015 में, उन्होंने रोश डायग्नोस्टिक्स (Roche Diagnostics) की सीएसआर पहल 'प्रोजेक्ट रोशनी' (Project Roshni) के तहत अपना इलाज शुरू किया. यह पहल महिलाओं को स्वास्थ्य देखभाल और आजीविका सहायता के लिए समान पहुंच प्रदान करता है. इस पहल के तहत भोपी के हीमोग्लोबिन स्तर का परीक्षण किया गया जो खतरनाक रूप से कम था. आगे की जाँच करने पर पता चला कि उन्हें थायरॉइड है, जिसके बाद उन्हें उचित उपचार मिला. 2019 तक, भोपी कम हीमोग्लोबिन के स्तर और थायरॉयड विकार से पूरी तरह से उबर चुकी थी.

“मैं बहुत परेशान थी, बार बार डॉक्टर के पास जाती थी लेकिन कुछ हो ही नहीं रहा था. जब मुझे पता चला मुझे थायरॉइड है तब इन डॉक्टर्स ने मुझे सही दवाई दी. मुझे सही उपचार दिया,” वह कहती हैं.

रोश डायग्नोस्टिक्स के सहयोग से प्रोजेक्ट रोशनी की शुरुआत 2015 में SHED, मुंबई स्थित एक गैर सरकारी संगठन द्वारा की गई थी. तब से, यह पालघर के दो गांवों में महिलाओं के साथ कम हीमोग्लोबिन के स्तर को प्रबंधित करने के लिए काम कर रहा है. यह परियोजना ग्रामीणों को किचन गार्डन विकसित करने में मदद करते हुए ब्यूटीशियन कोर्स, सिलाई और आधुनिक कृषि प्रथाओं जैसे कौशल में प्रशिक्षण भी प्रदान करती है, जिसके परिणामस्वरूप आजीविका और स्थायी आय के स्रोत में सुधार होता है.

रोश डायग्नोस्टिक्स इंडिया की सीएसआर प्रमुख मंजीरा शर्मा ने YourStory को बताया, "इस प्रोजेक्ट के जरिए हम इन वंचित महिलाओं को स्वास्थ्य सेवा तक समान पहुंच प्रदान करना चाहते थे."

मंजीरा शर्मा, Head of CSR, Roche Diagnostics India

मंजीरा शर्मा, Head of CSR, Roche Diagnostics India

शुरुआत

SHED पिछले 35 वर्षों से पालघर के विभिन्न गांवों में 45,000 शौचालयों का निर्माण करके स्वच्छता को बढ़ावा देने, स्कूल छोड़ने वालों को गैर-औपचारिक शिक्षा प्रदान करने, वाटरशेड प्रबंधन और एचआईवी जागरूकता कार्यक्रम आयोजित करने सहित अन्य पहलों के लिए काम कर रहा है.

इस क्षेत्र में विभिन्न सर्वे करने पर, यह महसूस किया गया कि महिलाओं का एक बड़ा प्रतिशत कुपोषण और हीमोग्लोबिन के निम्न स्तर से पीड़ित है, जिससे खराब प्रतिरक्षा, मासिक धर्म की समस्याएं, थायरॉइड की समस्याएं और बहुत कुछ होता है.

“इसने इन आदिवासी महिलाओं के पुनर्वास की तत्काल आवश्यकता का आह्वान किया. जिले के 200 गांवों में से, हमने शिल्टा और सोनवे पर ध्यान केंद्रित करना चुना, क्योंकि उनके पास के शहरों में परिवहन की पहुंच नहीं थी," शर्मा कहती हैं.

परियोजना के तहत, एचबी परीक्षण के लिए वर्ष में तीन बार चिकित्सा शिविर आयोजित किए जाते हैं, और कम हीमोग्लोबिन स्तर वाली महिलाओं को दवाएं दी जाती हैं.

टीम में चार डॉक्टर हैं जो गाँवों के सभी समूहों में सप्ताह में चार बार महिलाओं से मिलते हैं और उनसे बातचीत करते हैं और यह सुनिश्चित करते हैं कि उन्हें किसी अन्य स्वास्थ्य समस्या का सामना नहीं करना पड़ रहा है.

पालघर जिले में आयोजित स्वास्थ्य जांच शिविर की तस्वीर

पालघर जिले में आयोजित स्वास्थ्य जांच शिविर की तस्वीर

SHED के एग्जीक्यूटिव प्रोग्राम ऑफिसर स्नेहल सालुंके कहती हैं, “हमारे पास दस लोगों की एक ऑन-ग्राउंड टीम है जो हर दिन इन चौदह समूहों का दौरा करती है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि ये महिलाएं समय पर अपनी दवाएँ ले रही हैं और उनके साथ संपर्क में रहें. यदि दवाएं काम नहीं करती हैं या यदि कोई महिला किसी अन्य स्वास्थ्य समस्या जैसे थायराइड, मधुमेह और अन्य का सामना कर रही है, तो हम उन्हें आगे के परीक्षण के लिए ले जाते हैं और उन्हें संबंधित उपचार प्रदान करते हैं.“

18 महीने से अधिक समय तक लाभार्थियों की गहन जांच के बाद, अच्छे हीमोग्लोबिन स्तर वाली महिलाओं को रोशनी एंबेसडर के रूप में नामित किया जाता है, जो स्थानीय आशा कार्यकर्ताओं के साथ मिलकर अन्य महिलाओं के बीच एचबी परीक्षण के महत्व के बारे में जागरूकता फैलाती हैं.

2022-23 से, 480 सक्रिय महिला प्रतिभागियों में से 280 को एंबेसडर के रूप में पदोन्नत किया गया, जबकि 60 नए लाभार्थियों को महिला स्वास्थ्य कार्यक्रम में जोड़ा गया.

सालुंके याद करती हैं कि महिलाओं को जांच कराने और दवा लेने के लिए राजी करने में उन्हें कितना संघर्ष करना पड़ा था. वह कहती हैं, "वे सोचती थी कि हम उनका खून चुरा रहे हैं और हम इसे बाजार में बेच देंगे."

हालांकि, सालुंके और उनकी टीम इन महिलाओं और उनके परिवारों से बात करने के लिए घर-घर जाती थी और उन्हें जांच कराने और आवश्यक दवाएं लेने के लिए समझाती थी. उन्होंने एचबी परीक्षण के महत्व और कम हीमोग्लोबिन स्तर से जुड़े स्वास्थ्य खतरों को समझाने के लिए कार्यशालाएं भी आयोजित कीं.

वह कहती हैं, “शुरुआत में यह कठिन था, लेकिन अब महिलाएं खुद हमारे शिविर में जांच कराने आती हैं.”

कार्यक्रम के तहत 700 महिलाओं को प्रशिक्षित किया गया है

कार्यक्रम के तहत 700 महिलाओं को प्रशिक्षित किया गया है

स्थायी आजीविका को बढ़ावा देना

2018 में, प्रोजेक्ट रोशनी को इन महिलाओं को ब्यूटीशियन और टेलर के रूप में प्रशिक्षित करने और उन्हें जैविक खेती सिखाने के लिए बढ़ाया गया था.

पालघर की 20 साल की शोभना प्रताप पवार की शादी 15 साल की छोटी उम्र में हो गई थी. वह हमेशा एक कामकाजी महिला बनने का सपना देखती थी. सालुंके याद करते हुए कहती हैं, "वह मुझसे कहा करती थी कि वह रोजी-रोटी कमाने के लिए सजना-संवरना और काम पर जाना चाहती है."

2019 से, प्रोजेक्ट रोशनी के तहत ब्यूटीशियन के रूप में प्रशिक्षित पवार अपने गाँव से 13 किमी दूर एक ब्यूटी पार्लर में काम कर रही हैं. वह अपना सपना जी रही है और कम से कम 10,000 रुपये की मासिक आय अर्जित करती है.

इस परियोजना के तहत अब तक 700 महिलाओं को प्रशिक्षित किया जा चुका है. एनजीओ इन महिलाओं को वित्तीय साक्षरता भी प्रदान करता है कि वे कैसे कमा सकती हैं और अपनी आय कैसे बचा सकती हैं.

सालुंके कहती हैं, "हमने एक स्वयं सहायता समूह भी शुरू किया है जो महिलाओं को विभिन्न सरकारी योजनाओं जैसे जीवन बीमा, बालिका योजनाओं, आदिवासी योजनाओं आदि के बारे में शिक्षित करता है और उनकी वित्तीय स्थिरता को बढ़ाने के लिए बचत तकनीकों को भी सिखाता है."

इन महिलाओं को किचन गार्डन उगाने का भी प्रशिक्षण दिया जाता है, जिनमें से कुछ प्रोडक्ट्स बाजार में भी बेचे जाते हैं. अतिरिक्त उपज को बेचकर महिलाएं प्रतिदिन लगभग 500 से 600 रुपये कमाती हैं.

शुरुआत में महिलाओं को टमाटर, खीरा, सहजन आदि पौधों के बीज दिए जाते हैं. हालाँकि, बाद में, वे इन बीजों को स्वयं खरीदने की पहल करती हैं.

परियोजना के हिस्से के रूप में, इन महिलाओं को साल भर पोषण संबंधी सहायता दी जाती है, जिसमें पौष्टिक अनाज, बाजरा और दालों का वितरण शामिल है.

अब तक, प्रोजेक्ट रोशनी ने इस क्षेत्र की 5,000 महिलाओं की सफलतापूर्वक सहायता की है और अब यह एक तीसरे गाँव तक अपनी पहुँच बढ़ा रहा है. टीम ने परियोजना के माध्यम से हर साल कम से कम 500 महिलाओं की मदद करने की योजना बनाई है.

इसके अलावा, यह सर्वाइकल कैंसर टीकाकरण को शामिल करने के लिए महिलाओं के स्वास्थ्य कार्यक्रम को व्यापक बनाने की योजना बना रहा है, जो समुदाय में और भी अधिक महिलाओं के स्वास्थ्य और कल्याण पर सकारात्मक प्रभाव डालेगा.

यह भी पढ़ें
हर वक्त आपके बच्चों की सुरक्षा करने में मदद करता है यह स्टार्टअप, जानिए कैसे?