'कूड़े वाले हम हैं, वो तो सफ़ाईकर हैं' कहने वाला यह स्टार्टअप बदल रहा है हमारे पर्यटन स्थलों को

By Prerna Bhardwaj
May 20, 2022, Updated on : Wed Jul 06 2022 13:33:34 GMT+0000
'कूड़े वाले हम हैं, वो तो सफ़ाईकर हैं' कहने वाला यह स्टार्टअप बदल रहा है हमारे पर्यटन स्थलों को
“प्लास्टिक पर्यावरण से बाहर, लेकिन इकॉनमी के अन्दर” के संकल्प पर चलने वाले Recity के को-फाउंडर मेहा और सूरज शहर, उसके कचरा प्रबंधन और कूड़ा बीनने वालों की ज़िंदगी को एक नये नज़रिये से बदल रहे हैं.
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Founders की बैकस्टोरी

सूरज नंदकुमार ने इटली और अमेरिका से नगर प्रबंधन [Urban Planning] की पढ़ाई की और उसके बाद HCP Design के साथ बतौर एक Urban Planner दो साल तक काम किया. उनके दिमाग़ में शहरों को जैसे प्लान किया जाता है, बसाया जाता है और उसमें संसाधनों को जैसे इस्तेमाल किया जाता है उसे लेकर कुछ नये आइडियाज़ आते रहते थे. उन्हें लगता था उन आइडियाज़ को लागू करने के लिये उन्हें खुद अपनी कोई संस्था या कम्पनी बनानी पड़ेगी. यह 2015 की बात है जब उन्होंने अपनी जॉब छोड़ी.


उधर मेहा लाहिड़ी ने फ़ायनेंस में एमबीए किया. उसके बाद ब्रांड मैनेजर और हेड ऑफ़ मार्केटिंग के तौर पर लगभग नौ साल काम किया. उनके दिमाग़ में भी शहर और उसकी बसावट को लेकर कुछ ख़याल आते थे और इस बारे में भी कि उन्हें कुछ अपना करना है. उन्होंने ब्रांड और मार्केटिंग सर्विसेज़ की एक कम्पनी शुरू की. उससे अपना कुछ करने वाला इरादा तो पूरा हो गया लेकिन वो जो ख़याल आते थे उन्हें अभी भी एक ठिकाने की ज़रूरत थी. उन्होंने खुद के शुरू की हुई वह कम्पनी छोड़ दी. यह 2017 की बात है.


उसी दौरान सूरज और मेहा ने अपने आइडियाज़ एक दूसरे से शेयर करने, एक विजन बनाने और उस पर आधारित एक कम्पनी बनाने की बातें करना शुरू की.


दो अनुभवी प्रोफेसनल. एक Urban Planner. दूसरा Marketing और Finance को जानने वाला. और दोनों के कॉमन आइडियाज़ शहरों को लेकर. 2017 में दोनों ने मिलकर Recity बनाई. एक ऐसी कम्पनी जिसनें शहरों में कचरा प्रबंधन को एक नयी सोच से देखना और करना शुरू किया.

Recity का सफ़र

मेहा और सूरज ने तय किया कि वो चार चीजों पर अपनी कम्पनी की बुनियाद रखेंगे.

  • कचरा प्रबंधन मूलतः लोगों की सोच में बदलाव लाने का काम है.
  • वेस्ट वर्कर्स के सशक्तिकरण का असली रास्ता उनको प्रोफेशनल बनाना है, उन्हें आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर करना है
  • प्लास्टिक को पर्यावरण से बाहर करना इसलिए मुश्किल है कि उसे इकॉनमी से बाहर करना बेहद मुश्किल है
  • पर्यावरण के क्षेत्र में भी for-profit कम्पनियों के काम करने की बड़ी गुंजाइश है.


2017 में अंबाला में एक प्रोजेक्ट से शुरू हुआ काम अब कई शहरों तक फैल गया है. Recity अब 175 लोगों की टीम है. उनको कई अवार्डस मिले हैं. YourStory हिंदी के लिए हमने मेहा और सूरज से बात की और उनसे समझना चाहा कि Recity शुरू होने के पाँच साल बाद वे शहरों को लेकर क्या सोचते हैं, वेस्ट वर्कर्स के साथ काम करने का उनका अनुभव क्या रहा है और अपने काम के इम्पैक्ट को वे कैसे देखते हैं.

Recity
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प्लास्टिक पर्यावरण से बाहर, लेकिन इकॉनमी के अन्दर: शहर और सम्भावनाएँ

“प्लास्टिक पर्यावरण से बाहर, लेकिन इकॉनमी के अन्दर” के संकल्प पर चलने वाले मेहा और सूरज जैसा हमें देखा शहर को शुरू से एक अलग नज़रिए से देखते रहे हैं.


कोई शहर से इश्क़ करता है, किसी को शहर इतिहास में ले जा जाता है तो किसी के लिए दुःख और अकेलेपन का कारण बन जाता है. इस सब के बावजूद हम सब के लिए शहर एक संभावना की तरह होता है.. इसी संभावना की तलाश को आगे बढाते हुए, मेहा और सूरज ने शहर के कूड़े और कचरे को भी संसाधन में परिवर्तित करने का सोचा, और Recity वुज़ूद में आई. यह एक खूबसूरत विचार है. खासकर तब, जब हम यह जानते हैं कि हमारे बहुत सारे संसाधन सीमित हैं.

Recity

हम जानते हैं कि Central Pollution Control Board के मुताबिक हम, भारत के लोग, हर दिन 26,940 टन प्लास्टिक वेस्ट पैदा करते हैं, जिसमें से सिर्फ लग्भग 15000 टन ही होकर रीसायकल हो पाता है,.बाकी लगभग 10,500 टन कचरा हमारे आस-पास, गली-मोहल्ले, नदी, तालाब, कूड़े का ढेर बनकर हमारे पर्यावरण में ही बना रहता है. प्लास्टिक को हमारे पर्यावरण से बाहर रखते हुए, उसे रीसायकल करके सम्भावन में तब्दील करते हए इकॉनमी में रखने की कहानी आज हम मेहा और सूरज से जानने की कोशिश करेंगें:


प्रेरणा: प्लास्टिक ही क्यूँ?

सूरज: रोज़मर्रा की ज़िन्दगी में प्लास्टिक का इस्तेमाल सबसे ज्यादा है, इसलिए इसके वेस्ट्स भी ज्यादा हैं. इसे ज़्यादा से ज्यादा मात्रा में रीसायकल करके इसकी कीमत भी निकाली जा सकती है.


प्रेरणा: अक्सर ये होता है कि पर्यावरण, सस्टेनेबिलिटी, प्लास्टिक मुक्त शहर; इन सारे मुद्दों के बीच वह अहम् कड़ी गायब हो जाती है जो हमारे घर, दुकानों से कूड़ा उठाकर, उन्हें बीन कर, उन्हें रीसायकल करने की प्रक्रिया के लायक बनाते हैं. यानि वेस्ट वर्कर्स. वेस्ट-वर्कर्स को लेकर आपकी क्या पॉलिसी है?

मेहा: हम कूड़ा उठाने, बीनने को एक पब्लिक सर्विस मानते हैं. वेस्ट वर्कर्स ये काम साल के 365 दिन करते हैंऔर हमारे घर, दुकान, पार्क, बाज़ार आदि हर जगह को साफ़ करके हमारे रहने लायक बनाते हैं. हम इनके काम की अहमियत समझते हैं और इसलिए इनके सशक्तिकरण के लिए ‘कैपेसिटी- बिल्डिंग’ से लेकर इनके ‘सेफ्टी-गियर्स’ के इंतज़ाम करते हैं.


हमारा एक मुख्य उद्देश्य उनको आर्थिक रूप से मजबूत करना है जिसके अंतर्गत हम उनको स्किल डवलपमेंट की ट्रेनिंग देते हैं. उनसे साझा करते हैं कि सरकार की योजनाओं का लाभ कैसे लिया जाय या वित्तीय समझ कैसे बढ़ाई जाय. वे खुद को आर्थिक रूप से आत्म-निर्भर कैसे बनाएँ इसके कदम कदम पर हम इनके साथ होते हैं. हमारा मानना है कि आर्थिक मजबूती ही आपको किसी भी तरह की स्वंत्रता दे सकती है. यह बात उनके संदर्भ में और भी जरुरी हो जाती है क्यूंकि वेस्ट-वर्कर्स इनफॉर्मल सेक्टर में आते हैं जिनकी भविष्य की कोई गारंटी नहीं होती है.

Recity

प्रेरणा: जितना ज़रूरी इनकी आर्थिक स्वंत्रता है, उतनी ही ज़रूरी कूड़ा-बीनने वालों को लेकर या उनके काम को लेकर हमारी समझ बदलने की भी ज़रूरत है. इसके लिए Recity क्या करती है?

मेहा: बहुत कुछ. खासकर कोविड महामारी के दौरान उनके काम के वैल्यू को नहीं आँका जा सकता. हम अपने संगठन में वेस्ट-वर्कर्स को ‘सफाईकर’, ‘पर्यवारणमित्र’ कह कर संबोधित करते हैं, और यह कहते है कि कूड़े-वाले वो नहीं हम हैं क्यूंकि कूड़ा तो हम उत्पन्न करते हैं, वो तो सफ़ाई करते हैं. इसलिए कूड़े वाले वो नहीं, हम हैं.


अलग अलग जगहों पर जागरूकता अभियान चलते रहे हैं. इसके पीछे हमारी यह सोच है कि कूड़ा-साफ़ करना किसी भी अन्य तरह की सर्विस की तरह ही है और इसलिए उनकी पहचान नकारात्मक शब्दों से नहीं की जानी चाहिए. इसी दिशा में सोचते हुए, Recity ने नैनीताल और गोवा में वेस्ट वर्कर्स के बड़े पोट्रेट्स शहर की पॉपुलर जगहों पर लगाये जिससे उस शहर के लोग उन लोगों को देखें और जानें जो उनके शहरों को साफ़-सुथरा रखने में एक अहम् भूमिका निभाते हैं.


प्रेरणा: Recity किन-किन शहरों में काम कर रही है?

सूरज: मसूरी, नैनीताल, डलहोजी, महाबलेश्वर, मुन्नार, गोवा, पांडिचेरी, विशाखापट्टनम शहरों में हमारा काम है. इनमें से अधिकतर जगह पर्यटक केंद्र भी है जिसकी वजह से यहाँ वेस्ट् मैनेजमेंट की काफी ज्यादा ज़रूरत है. Recity इन शहरों में सर्कुलर वेस्ट मैनेजमेंट के मॉडल पर काम करते हुए शहर के प्लास्टिक कचरे को रीसायकल करके उन्हें दुबारा प्रयोग में लाये जाने लायक बनती है. मसलन, पांडिचेरी में, Godrej के साथ सहयोग करके Recity वहां के प्लास्टिक वेस्ट को जमा करने से लेकर सुखा-गीला, रंग के अनुसार उन्हें बीनकर रीसायकल करती है, जिसे प्रोजेक्ट कीप का नाम दिया गया है. इसके अलावा Recity, Nestle India के साथ मसूरी, नैनीताल, डलहोजी में हिलदारी (hilldaari) मूवमेंट भी चला रहा है. हाल ही में Pepsico Foundation के साथ सहयोग करके Recity ने मथुरा में "पूर्ण" नामक प्रोजेक्ट चलाया है। इनके अधिकतर अभियानों में स्त्री-मुक्ति संगठन बतौर भागीदार काम करता रहा है।


हमारा मानना है कि अगर शहर साफ़-सुथरा दीखता है तो उस जगह के लोग उसे साफ़ सुथरा बनाये रखने में रूचि दिखाते हैं. हम Recity के माध्यम से इन शहरों को साफ़ रखने की कोशिश करते हैं, और साथ ही साथ वहां के कचरे को रीसायकल करके उनकी वैल्यू में भी इज़ाफा करते हैं.