सुप्रीम कोर्ट ने नोटबंदी के पक्ष में दिया फैसला, 5 में से एक 1 जज ने जताई आपत्ति, जानिए क्या कहा

By yourstory हिन्दी
January 02, 2023, Updated on : Mon Jan 02 2023 08:24:40 GMT+0000
सुप्रीम कोर्ट ने नोटबंदी के पक्ष में दिया फैसला, 5 में से एक 1 जज ने जताई आपत्ति, जानिए क्या कहा
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आठ नवंबर 2016 को जारी अधिसूचना वैध व प्रक्रिया के तहत थी. हालांकि रिज़र्व बैंक कानून की धारा 26(2) के तहत केंद्र के अधिकारों के मुद्दे पर जस्टिस बीवी नागरत्ना की राय जस्टिस बीआर गवई से अलग है.
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सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को कहा कि केंद्र सरकार के 2016 में 500 और 1000 रुपये की श्रृंखला वाले नोटबंद करने के फैसले को अनुचित नहीं ठहराया जा सकता. शीर्ष अदालत ने केंद्र के नोटबंदी के फैसले को चुनौती देने वाली 58 याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए, 4:1 के बहुमत के साथ फैसले को सही ठहराया.


जस्टिस एसए नज़ीर की अध्यक्षता वाली पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने कहा कि इस संबंध में फैसला भारतीय रिज़र्व बैंक (आरबीआई) और सरकार के बीच विचार-विमर्श के बाद किया गया.


न्यायालय ने कहा कि आठ नवंबर 2016 की अधिसूचना को अनुचित नहीं ठहराया जा सकता और फैसला करने की प्रक्रिया के आधार पर इसे रद्द नहीं किया जा सकता. अधिसूचना में 500 और 1000 रुपये की श्रृंखला वाले नोट बंद करने के फैसले की घोषणा की गई थी.

पीठ में जस्टिस नज़ीर के अलावा जस्टिस बीआर गवई , जस्टिस बीवी नागरत्ना, जस्टिस एएस बोपन्ना और जस्टिस वी. रामासुब्रमण्यन भी शामिल हैं.

एक जज ने सरकार के फैसले को गलत ठहराया

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आठ नवंबर 2016 को जारी अधिसूचना वैध व प्रक्रिया के तहत थी. हालांकि रिज़र्व बैंक कानून की धारा 26(2) के तहत केंद्र के अधिकारों के मुद्दे पर जस्टिस बीवी नागरत्ना की राय जस्टिस बीआर गवई से अलग है.


जस्टिस बीवी नागरत्ना ने कहा कि 500 और 1000 रुपये की श्रृंखला के नोट कानून बनाकर ही रद्द किए जा सकते थे, अधिसूचना के जरिए नहीं. उन्होंने कहा कि संसद को नोटबंदी के मामले में कानून पर चर्चा करनी चाहिए थी, यह प्रक्रिया गजट अधिसूचना के जरिए नहीं होनी चाहिए थी. उनके अनुसार, देश के लिए इतने महत्वपूर्ण मामले में संसद को अलग नहीं रखा जा सकता.

पिछले महीने कोर्ट ने मांगा था रिकॉर्ड

बता दें कि, सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) को सात दिसंबर को निर्देश दिया था कि वे सरकार के 2016 में 1000 रुपये और 500 रुपये के नोट को बंद करने के फैसले से संबंधित प्रासंगिक रिकॉर्ड पेश करें.


पीठ ने केंद्र के 2016 के फैसले को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमणी, आरबीआई के वकील और वरिष्ठ अधिवक्ता पी चिदम्बरम तथा श्याम दीवान समेत याचिकाकर्ताओं के वकीलों की दलीलें सुनी थीं और अपना फैसला सुरक्षित रखा था.


1000 और 500 रुपये के नोटों को बंद करने के फैसले को ‘गंभीर रूप से दोषपूर्ण’ बताते हुए चिदंबरम ने दलील दी थी कि केंद्र सरकार कानूनी निविदा से संबंधित किसी भी प्रस्ताव को अपने दम पर शुरू नहीं कर सकती है और यह केवल आरबीआई के केंद्रीय बोर्ड की सिफारिश पर किया जा सकता है.


हालांकि, वर्ष 2016 की नोटबंदी की कवायद पर फिर से विचार करने के सर्वोच्च न्यायालय के प्रयास का विरोध करते हुए सरकार ने कहा था कि अदालत ऐसे मामले का फैसला नहीं कर सकती है, जब ‘बीते वक्त में लौट कर’ कोई ठोस राहत नहीं दी जा सकती है.

8 नवंबर, 2016 को हुई थी नोटबंदी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आठ नवंबर, 2016 को अर्थव्यवस्था में भ्रष्टाचार और काले धन की समस्या को दूर करने के उद्देश्य से 500 और 1,000 रुपये के नोटों को चलन से बाहर कर दिया था.


इस कदम का उद्देश्य भारत को 'कम नकदी' वाली अर्थव्यवस्था बनाना था. यह भी कहा गया कि इससे काले धन पर अंकुश लगाने तथा आतंकवाद के वित्तपोषण को खत्म करने में मदद मिलेगी.

17.7 लाख करोड़ से बढ़कर 30.88 करोड़ हो गई नकदी

भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की तरफ से पखवाड़े के आधार पर शुक्रवार को जारी धन आपूर्ति आंकड़ों के अनुसार, इस साल 21 अक्टूबर तक जनता के बीच चलन में मौजूद मुद्रा का स्तर बढ़कर 30.88 लाख करोड़ रुपये हो गया. यह आंकड़ा चार नवंबर, 2016 को समाप्त पखवाड़े में 17.7 लाख करोड़ रुपये था.


एसबीआई के अर्थशास्त्रियों की रिपोर्ट में कहा गया है कि इस साल दिवाली वाले सप्ताह में प्रणाली में नकदी या मुद्रा (सीआईसी) में 7,600 करोड़ रुपये की कमी हुई. लोगों के बीच डिजिटल भुगतान के लोकप्रिय होने के कारण ऐसा हुआ.

सरकार और आरबीआई ने कई महत्वपूर्ण जानकारियां छिपाई

28 दिसंबर, 2022 को इंडियन एक्सप्रेस ने अपनी रिपोर्ट में बताया था कि केंद्र सरकार और आरबीआई ने सुप्रीम कोर्ट में जमा किए गए अपने-अपने हलफनामे में से नोटबंदी से संबंधित कुछ सिफारिशों की जानकारी नहीं दी थी.


जबकि सरकार ने अपने हलफनामे में कहा था कि यह एक "सुविचारित" निर्णय था और आरबीआई के साथ परामर्श प्रक्रिया फरवरी 2016 में शुरू हुई थी, केंद्रीय बैंक ने भी कहा कि उचित प्रक्रिया का पालन किया गया था और यह वही था, जो नोटबंदी की सिफारिश थी.


सरकार और आरबीआई के हलफनामों में जिस बात का उल्लेख नहीं था, वह यह तथ्य था कि नोटबंदी के लिए आरबीआई की सिफारिश केंद्रीय बैंक द्वारा सरकार के कई औचित्य की आलोचना करने के बाद आई थी. आरबीआई के केंद्रीय बोर्ड की बैठक के कार्यवृत्त के रूप में निर्णय की घोषणा के कुछ घंटे पहले इन्हें रिकॉर्ड में रखा गया था.


Edited by Vishal Jaiswal