कहानी 100 वर्ष से ज्यादा पुराने मैसूर सैंडल सोप की, प्रथम विश्व युद्ध से उपजे हालात ने रखी थी नींव

मैसूर सैंडल सोप की नींव मैसूर के शाही घराने की सोच से पड़ी थी. लेकिन बाद में यह कर्नाटक सरकार का ब्रांड हो गया.

कहानी 100 वर्ष से ज्यादा पुराने मैसूर सैंडल सोप की, प्रथम विश्व युद्ध से उपजे हालात ने रखी थी नींव

Tuesday February 14, 2023,

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साबुन का नाम सुनते ही न जाने कितने नाम जेहन में आ जाते हैं. ऐसा ही एक नाम है मैसूर सैंडल सोप (Mysore Sandal Soap). साल 1916 में अ​स्तित्व में आए इस साबुन के चाहने वाले और खरीदार आज भी हैं. इन 107 वर्षों में न जाने कितने ब्रांड आए और गए लेकिन मैसूर सैंडल सोप की बिक्री आज भी हो रही है. मैसूर सैंडल सोप, वर्तमान में कर्नाटक सरकार का ब्रांड है और इसे Karnataka Soaps & Detergents Ltd. बेचती है. कंपनी ने KSDL eStore के माध्यम से एक ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म भी उपलब्ध कराया हुआ है.

लेकिन शुरुआत में ऐसा नहीं था. मैसूर सैंडल सोप की नींव मैसूर के शाही घराने की सोच से पड़ी थी. लेकिन बाद में यह कर्नाटक सरकार का ब्रांड हो गया. आइए जानते हैं क्या है इस साबुन की कहानी...

प्रथम विश्व युद्ध का दौर

भारत में ब्रिटिश राज था और मैसूर पर वोडियार राजाओं का राज था. 20वीं शताब्दी की शुरुआत में मैसूर, पूरी दुनिया में चंदन की लकड़ी के सबसे बड़े उत्पादकों में से एक था. उस वक्त मैसूर पर नलवाडी कृष्ण राजा वोडियार चतुर्थ राज कर रहे थे. उनके दीवान थे मोक्षगुंडम विश्वेश्वैरया. यह भारत रत्न प्राप्त वही एम विश्वेश्वरैया हैं, जिन्हें भारत के प्रख्यात सिविल इंजीनियर, एडमिनिस्ट्रेटर, स्टेट्समैन के तौर पर भी जाना जाता है. वह 1912-1918 तक मैसूर के 19वें दीवान रहे.

उस वक्त मैसूर से चंदन की लकड़ी के बड़े ब्लॉक्स को जर्मनी और फ्रांस समेत यूरोप में बड़े पैमाने पर एक्सपोर्ट किया जाता था. वहां चंदन का तेल निकाला जाता था. लेकिन जब प्रथम विश्व युद्ध शुरू हुआ तो इन देशों के साथ बिजनेस डीलिंग्स रुक गईं और मैसूर में अनयूज्ड चंदन लकड़ी का ढेर लगने लगा.

तब तत्कालीन मैसूर महाराज ने भारत के अंदर ही चंदन का तेल निकालने का फैसला किया. चंदन लकड़ी से तेल निकालने वाली मशीनों का विदेश से आयात किया गया और 1916 में बेंगलुरु में सैन्की टैंक के पास एक छोटी फैसिलिटी के मालिकों को दो टन चंदन की लकड़ी के एक छोटे कन्साइनमेंट से चंदन तेल निकालने का काम सौंपा गया. उस फैसिलिटी ने यह काम सफलतापूर्वक किया और इस तरह चंदन का तेल निकाला जाना शुरू हुआ, जिसे लिक्विड गोल्ड के नाम से भी जाना जाता है.

पहले केवल महाराज के इस्तेमाल के लिए था

मैसूर में चंदन तेल का इस्तेमाल सबसे पहले महाराज के नहाने में किया गया. महाराज के नहाने की व्यवस्था में चंदन का तेल रोज इस्तेमाल होने लगा. कुछ वक्त बाद मैसूर के महाराज से मिलने फ्रांस से दो अतिथि आए. वे अपने साथ चंदन के तेल से बने दो साबुन लेकर आए थे. उन्हें देखकर महाराज को आइडिया आया कि अगर देश के अंदर चंदन का तेल निकाला जा सकता है तो उससे साबुन क्यों नहीं बनाए जा सकते.

उन्होंने एम विश्वेश्वरैया के साथ यह विचार साझा किया और साबुन तैयार करने की कवायद शुरू हो गई. एम विश्वेश्वरैया ने बॉम्बे के तकनीकी विशेषज्ञों को बुलाकर आईआईएससी के परिसर में साबुन के निर्माण के लिए प्रयोगों की व्यवस्था की. इसके बाद मैसूर के महाराज ने जाने-माने इंडस्ट्रियल केमिस्ट एसजी शास्त्री को लंदन भेजा ताकि वह साबुन और परफ्यूमरी टेक्नोलॉजी को लेकर स्टडी कर सकें. शास्त्री ने भारत वापस आने के बाद सैंडलवुड परफ्यूम विकसित किया. यही परफ्यूम मैसूर सैंडल सोप का बेस बना.

मैसूर सैंडल सोप को पहली बार साल 1918 में बेंगलुरु में कबन पार्क के निकट फैक्ट्री में प्रॉड्यूस किया गया. जब चंदन के साबुन को पहली बार तैयार किया गया, तब इसे भी महाराज के नहाने के लिए रखा जाने लगा. कुछ वक्त बाद महाराज को ख्याल आया कि उनकी प्रजा भी तो इसका इस्तेमाल कर सकती है. उन्होंने यह विचार अपने दीवान एम विश्वेश्वरैया के साथ शेयर किया और फिर शुरू हुआ मैसूर सैंडल सोप को जनता के लिए भी बनाने का काम.

1980 में सरकार ने किया ​टेकओवर और KSDL बनी

1980 में कर्नाटक सरकार ने मैसूर के महाराज से मैन्युफैक्चरिंग फैसिलिटी को टेकओवर कर लिया. साल 1980 में शिमोगा और मैसूर में चंदन तेल कारखानों के साथ गवर्मेंट सोप फैक्ट्री का विलय करके एक कंपनी Karnataka Soaps and Detergents Limited (KSDL) बनाई गई. KSDL बैनर के तहत वास्तविक प्रॉडक्शन 1982 में शुरू हुआ, जब चंदन का तेल बनाना शुरू कर चुकीं कुछ अन्य छोटी फैसिलिटीज को मर्ज कर दिया गया. चंदन के साबुन को शुद्ध चंदन तेल के अलावा वेटीवर्ट, पचौली, जेरेनियम, पाम रोसा, ऑरेंज, पेटिटग्रेन समेत अन्य प्राकृतिक एसेंशियल ऑयल्स का इस्तेमाल कर बनाया जाता था. ओरिजिनल मैसूर सैंडल सोप के अलावा KSDL की फैसिलिटी ने धीरे-धीरे गुलाब, जैस्मीन और हर्बल जैसी कुछ अन्य फ्रैगरेंस के साबुन बनाना भी शुरू कर दिया.

साबुन बनाने में इस्तेमाल होने वाले प्राइमरी कच्चे माल में पाम तेल, कास्टिक सोडा और सॉल्ट वॉटर शामिल थे. इन कच्चे माल के सैपोनिफिकेशन से गुजरने के बाद, एक गूंधा हुआ साबुन बनता है, और नमी को बाहर निकाल दिया जाता है; इस स्तर पर, विशिष्ट सुगंधित चंदन का तेल ऐड किया जाता है. इसके बाद रेडी हुए प्रॉडक्ट को पैक करके डिस्ट्रीब्यूशन के लिए पूरे भारत में डिपो में भेजा जाता है.

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वक्त के साथ किया विस्तार

केएसडीएल ने बढ़ती डिमांड को पूरा करने के लिए शिमोगा जिले में भी एक मैन्युफैक्चरिंग फैसिलिटी शुरू की, जो कि पहली फैसिलिटी की तुलना में बड़ी थी. कुछ वर्ष पहले यशवंतपुर में भी एक प्रॉडक्शन फैसिलिटी लगाई गई थी. कच्चा माल शिमोगा के अलावा चित्रादुर्गा से भी खरीदा जाता था. तमिलनाडु जैसे पड़ोसी राज्यों से भी कच्चा माल खरीदा जाता है. कंपनी कर्नाटक के अंदर मैसूर के अलावा कुछ अन्य जिलों से भी चंदन खरीदती है.

गलतियां भी हुईं

मैसूर सैंडल सोप ने तेजी से ग्रो करना और पॉपुलैरिटी बटोरना शुरू किया. डिमांड के साथ तालमेल रखने की कोशिश में केएसडीएल के मैनेजमेंट से कुछ मिसकैलकुलेशंस हो गईं और कुछ फैसले जल्दबाजी में ले लिए गए. जब कंपनी ने पहली बार प्रॉडक्शन शुरू किया तो सालाना 4000 टन साबुन बनते थे.

लेकिन साबुन के पॉपुलर होने पर और डिमांड बढ़ने की संभावना को देखते हुए प्रॉडक्शन कैपेसिटी को बढ़ाकर 26000 टन कर दिया गया. यह कंपनी की एक बड़ी गलती साबित हुई क्योंकि बिक्री केवल लगभग 5000 टन रही. प्रॉडक्शन के लिए इटली से मंगाई गई अत्याधुनिक मशीनरी पर आए मोटे खर्च ने नुकसान ही कराया. अनुमान के मुताबिक, बिक्री कम रहने से गोदामों में मैसूर सैंडल सोप का एक बड़ा स्टॉक बच गया और नुकसान की वजह से शटडाउन की संकट खड़ा हो गया. लेकिन केएसडीएल मैनेजमेंट ने हार नहीं मानी और इस संकट से निकलने में कामयाब रही.

YourStory की एक पुरानी रिपोर्ट में KSDL चेयरमैन Veronica Cornelio के हवाले से कहा गया, 'केएसडीएल किसी भी अन्य प्राइवेट लिमिटेड कंपनी की तरह फंक्शन करती है और कंपनीज एक्ट का कड़ाई से पालन करती है. सरकार का दखल मामूली है और ज्यादातर फैसले कंपनी का मैनेजमेंट लेता है. सरकार की ओर से मिली आजादी ही सफलता का राज है.' उन्होंने यह भी कहा था कि केएसडीएल दुनिया की एकमात्र कंपनी है, जो साबुन में नेचुरल चंदन तेल का इस्तेमाल करती है.

जब 100 साल किए पूरे...

30 जुलाई 2016 को मैसूर सैंडल सोप के 100 वर्ष पूरे हुए थे. इस मौके पर कंपनी ने स्पेशल एडिशन Mysore Sandal Centennial को लॉन्च किया था जो कंपनी के बेहद ज्यादा सक्सेसफुल मैसूर सैंडल मिलेनियम और मैसूर सैंडल गोल्ड का सक्सेसर था. Mysore Sandal Centennial में ओरिजिनल साबुन के सभी स्पेशल वेरिएंट्स के साथ—साथ मॉइश्चराइजर, बादाम तेल, स्किन सॉफ्टनर जैसे स्पेशल कंपोनेंट भी थे. मैसूर सैंडल गोल्ड को 1988 में लॉन्च किया गया था. उस वक्त 125 ग्राम के साबुन का दाम 15 रुपये था, जो उस वक्त के हिसाब से थोड़ा ज्यादा था. इसके बावजूद यह साबुन बेहद हिट रहा.

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यूं की मार्केटिंग

जैसे ही मैसूर सैंडल सोप बाजार में आया, हाथों हाथ बिकने लगा. देखते ही देखते यह इतना पॉपुलर हुआ कि कर्नाटक से निकलकर पूरे भारत में जाने लगा. इसमें असली चंदन तेल के इस्तेमाल, उसकी खुशबू और शाही घराने से साबुन के संबंध जैसे फैक्टर ने मदद की. मार्केटिंग के लिए मैसूर के शाही घराने ने देशभर में इस साबुन के साइनबोर्ड लगवाने का फैसला किया. इस दौरान ट्राम टिकट से लेकर माचिस की डिब्बियों पर भी इस साबुन का प्रचार किया गया. इतना ही नहीं आजादी से पहले कराची में इस साबुन के प्रचार के लिए ‘ऊंट का जुलूस’ भी निकाला गया था. देश के अन्य शाही घरानों ने भी इस साबुन को हाथों हाथ लिया.

डिस्ट्रीब्यूशन और मार्केटिंग स्ट्रैटेजीस की बात करें तो केएसडीएल ने सप्लाई चेन में सभी को खुश रखने के लिए कुछ स्कीम्स की मदद ली. इनमें से सबसे पॉपुलर रही लकी ड्रॉ स्कीम. इस स्कीम के तहत वे डिस्टीब्यूटर्स गोल्ड और सिल्वर कॉइन जीतते थे, जो अपने सेल्स टार्गेट पूरा कर लेते थे.

मैसूर सैंडल सोप और केएसडील से जुड़ी अहम तारीखें

साल 1916: मैसूर में मैसूर सैंडल ऑयल फैक्ट्री शुरू हुई

साल 1918: मैसूर के महाराज ने बेंगलुरु में कबन पार्क के निकट गवर्मेंट सोप फैक्ट्री शुरू की और पहली बार मैसूर सैंडल सोप बना

साल 1932: टॉयलेट सोप प्रॉडक्शन कै​पेसिटी को बढ़ाकर 750 मीट्रिक टन सालाना किया गया.

साल 1944: शिमोगा में चंदन तेल निकालने का दूसरा प्लांट

शुरू हुआ

साल 1954: एम विश्वेश्वरैया ने येलाहांका में नई मैन्युफैक्चरिंग फैसिलिटीज लगाने के लिए फाउंडेशन स्टोन रखा

साल 1957: कबन पार्क वाली फैक्ट्री को दूसरी जगह शिफ्ट किया गया

साल 1965: कंपनी ने साबुन का एक्सपोर्ट शुरू किया

साल 1970: प्रॉडक्शन कैपेसिटी को बढ़ाकर 6000 मीट्रिक टन सालाना किया गया, साथ ही कंपनी ने मशीनरी का आधुनिकीकरण किया

साल 1974: सरकार ने मैसूर सेल्स इंटरनेशनल लिमिटेड (MSIL) को अपने प्रॉडक्ट्स के लिए एकल मार्केटिंग एजेंट नियुक्त किया

साल 1975: इटैलियन टेक्नोलॉजी के साथ सिंथेटिक डिटर्जेंट प्लांट इंस्टॉल किया गया

साल 1980: सरकारी सोप फैक्ट्री को पब्लिक सेक्टर एंटरप्राइज में तब्दील किया गया और इसका नाम कर्नाटक सोप्स एंड डिटर्जेंट्स ​लिमिटेड रखा गया

साल 1981: कंपनी ने फैटी एसिड्स यूनिट लगाई

साल 1987: कंपनी ने MSIL से मार्केटिंग एक्टिविटीज टेकओवर कर लीं और खुद का मार्केटिंग वर्क शुरू किया

साल 1992: उदारीकरण के दौर में कंपनी को कड़ी प्रतिस्पर्धा मिलने लगी और तगड़ा नुकसान हुआ

साल 1996: बीआईएफआर ने केएसडीएल के लिए रिहैबिलिटेशन पैकेज अप्रूव किया और कॉस्ट कंट्रोल के लिए कड़े उपाय किए. इसके बाद कंपनी प्रॉफिट बनाने लगी

साल 2003: कंपनी ने 98 करोड़ रुपये का पूरा कैरी फॉरवर्ड लॉस खत्म किया

साल 2008: कंपनी ने हैंड वॉश लिक्विड्स उतारे

साल 2009: कंपनी ने टैल्कम पाउडर बनाने के लिए आधुनिक फैसिलिटी लगाई

साल 2010: कंपनी ने मैसूर सैंडल धूप लॉन्च की

साल 2012: कंपनी ने मैसूर सैंडल मिलेनियम सोप लॉन्च किया

साल 2015: कर्नाटक सरकार को कंपनी ने 6 करोड़ रुपये डिविडेंट पे किया

GI टैग है मिला हुआ

कंपनी ने गुणवत्ता से कोई समझौता नहीं किया. साल 2003 से साल 2006 के बीच मैसूर सैंडल सोप ने काफी कमाई की. केएसडील ने साल 2006 में पूर्व भारतीय क्रिकेट कप्तान महेंद्र सिंह धोनी को ‘मैसूर सैंडल सोप’ का पहला ब्रांड एंबेसडर नियुक्त किया. KSDL के पास मैसूर सैंडल सोप को लेकर ​प्रोपराइटरी जियोग्राफिकल इंडीकेशन टैग है. यह टैग इसे ब्रांड नाम का उपयोग करने, गुणवत्ता सुनिश्चित करने और पाइरेसी व अन्य निर्माताओं द्वारा इस ब्रांड नेम का अनाधिकृत उपयोग रोकने के लिए बौद्धिक संपदा अधिकार देता है.

लोगो भी है खास

मैसूर सैंडल सोप के लिए लोगो के तौर पर शरभा Sharabha का इस्तेमाल किया गया है. यह एक पौराणिक ​क्रिएचर है, जिसका जिक्र पुराणों में भी है. शरभा क्रिएचर में बॉडी शेर की और सिर हाथी का है. यह क्रिएचर ज्ञान, साहस और शक्ति के संयुक्त गुणों का प्रतिनिधित्व करता है और कंपनी की फिलॉसफी का प्रतीक है.