ये हैं 'फॉरेस्टमैन ऑफ इंडिया' जिनकी कहानी अमेरिका के स्कूलों में पढ़ाई जानी है

By शोभित शील
April 13, 2021, Updated on : Tue Apr 13 2021 06:43:59 GMT+0000
ये हैं 'फॉरेस्टमैन ऑफ इंडिया' जिनकी कहानी अमेरिका के स्कूलों में पढ़ाई जानी है
मिलें भारत के उस फॉरेस्टमैन से, जिनकी सफलता और आत्मविश्वास से भरी कहानी पढ़ाई जाएगी अमेरिका के स्कूलों में
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"पद्म श्री पुरस्कार से सम्मानित जादव पायेंग आज देश भर में ‘फॉरेस्ट मैन ऑफ इंडिया’ के नाम से जाने जाते हैं। आसाम के निवासी जादव ने साल 1979 में भयंकर बाढ़ का मंजर देखा था। इस बाढ़ ने पूरी तरह इलाके में तबाही मचा दी थी। बाढ़ के बाद पूरे इलाके में सिर्फ मिट्टी और कीचड़ ही नज़र आ रहा था।"

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कुछ रिपोर्ट्स की मानें तो रोजाना वैश्विक स्तर पर डेढ़ लाख के करीब पेड़ काटे जाते हैं और इतनी ही तेजी से उस जगह कंक्रीट के जंगलों यानी मानवीय बस्तियों का विस्तार हो रहा है। पेड़ों की इतनी तेजी से कटाई न सिर्फ जलवायु पर बुरा प्रभाव डाल रही है, बल्कि इसके बुरे परिणाम हमें बाढ़ और बारिश की कमी के रूप में लगातार नज़र आते रहते हैं।


इस बीच एक शख्स ऐसे भी हैं जो इस दिशा में दशकों से बड़े ही सकारात्मक कदम उठा रहे हैं। वो अकेले ही अपनी लगन के दम पर कुछ ऐसा कर रहे हैं कि उनकी इस सफलता और आत्मविश्वास से भरी हुई कहानी को अमेरिका के स्कूल में पढ़ाया जाना है।


बाढ़ से हुई शुरुआत

पद्म श्री पुरस्कार से सम्मानित जादव पायेंग आज देश भर में ‘फॉरेस्ट मैन ऑफ इंडिया’ के नाम से जाने जाते हैं। आसाम के निवासी जादव ने साल 1979 में भयंकर बाढ़ का मंजर देखा था। इस बाढ़ ने पूरी तरह इलाके में तबाही मचा दी थी। बाढ़ के बाद पूरे इलाके में सिर्फ मिट्टी और कीचड़ ही नज़र आ रहा था।


जादव तब 10वीं के छात्र थे और वह ब्रह्मपुत्र नदी के समीप द्वीप से अपने घर जा रहे थे, तब उन्होने उस जमीन पर साँप समेत कई अन्य जीवों को मरते हुए देखा और वह यह देखकर बेचैन हो उठे। इसके बाद ही जादव ने उस गीली मिट्टी को घने जंगल में बदलने का संकल्प लिया और इस दिशा में आगे बढ़ गए।

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16 साल की उम्र से शुरुआत

1963 में जन्मे जादव ने अपने इस नेक काम की शुरुआत 16 साल की उम्र से कर दी थी और इस दौरान वह उस द्वीप को एक नए सिरे से जंगल में तब्दील करना चाहते थे। शुरुआत में तो जादव के प्रयासों का स्थानीय स्तर पर मज़ाक बनाया गया लेकिन जल्द ही गाँववालों ने भी जादव का समर्थन करते हुए उन्हे कुछ बांस के पौधे और बीज उपलब्ध कराने शुरु कर दिये। इसके बाद से जादव ने लगातार नए पौधे लगाए और उनकी देखरेख करने लगे। 


जादव के अथक प्रयास का नतीजा था कि इतने सालों बाद आज उस जमीन पर एक घने जगल का विकास हो चुका है। जोरहाट स्थित जंगल मोलाई फॉरेस्ट का नाम उन्ही के नाम पर पड़ा है। यह करीब 1360 एकड़ क्षेत्र में फैला हुआ है। यहाँ आज रॉयल बंगाल टाइगर और गेंडे तमाम विभिन्न प्रजातियों के पशु और पक्षी पाये जाते हैं।

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फोटो साभार : TheLogicalIndian

अमेरिका तक पहुंची बात

तड़के सुबह उठ जाने वाले जाधव पाँच बजे से ही पौधों के लिए काम करना शुरू कर देते हैं। जाधव के अथक प्रयास को देखते हुए साल 2015 में भारत सरकार ने उन्हे पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित किया था। जादव को इसी साल फ्रांस में आयोजित हुई ‘ग्लोबल कॉन्फ्रेंस ऑफ सस्टेनेबल डेवलपमेंट’ की मीटिंग में भी सम्मानित किया गया था। अब जादव की इस कहानी को अमेरिका के छात्रों को पढ़ाया जाएगा। 


इतना ही नहीं जादव को उनके योगदान के लिए काजीरंगा विश्वविद्यालय और असम कृषि विश्वविद्यालय से डॉक्टरेट की उपाधि भी हासिल हुई है। जादव पर एक डॉक्युमेंट्री भी बनाई जा चुकी है,जिसे जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में प्रदर्शित किया जा चुका है।


Edited by Ranjana Tripathi

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