हम साथ मिलकर डिप्रेशन को हरा सकते हैं, हम अपनों को ऐसे ही जाने नहीं देंगे

By प्रियांशु द्विवेदी
June 15, 2020, Updated on : Tue Jun 16 2020 05:37:22 GMT+0000
हम साथ मिलकर डिप्रेशन को हरा सकते हैं, हम अपनों को ऐसे ही जाने नहीं देंगे
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अवसाद एक ऐसी बीमारी है जिसे बतौर एक समाज हमने गंभीरता से लेना नहीं सीखा है और इसकी खामियाजा हमें समय-समय पर इससे पीड़ित लोगों को खोकर भुगतना पड़ता है।

सांकेतिक चित्र

सांकेतिक चित्र



बॉलीवुड अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत अब इस दुनिया में नहीं रहे। कल यानी 14 जून को उन्होने मुंबई के बांद्रा स्थित अपने घर में आत्महत्या कर ली, जिसका कारण उनके अवसाद यानी डिप्रेशन में होना बताया गया है। ऐसा नहीं है कि सुशांत का फिल्मी करियर लंबे समय से डूबा हुआ था या उन्हे बॉलीवुड में कोई मुकाम हासिल नहीं था। उन्होने लंबे समय तक टेलीविज़न पर राज किया और फिर कई बड़ी फिल्मों में मुख्य भूमिका निभाते हुए भी नज़र आए। पीके, एमएस धोनी और छिछोरे, ये उन फिल्मों के नाम हैं जिनमें उनके काम को खूब सराहा गया और इन फिल्मों ने हर एंगल से अच्छा प्रदर्शन किया।


हमने ऊपर अवसाद का जिक्र किया था, जिसकी वजह से सुशांत ने यह कदम उठाया, लेकिन क्या इस तरह परिस्थिति में पड़ने वाले सुशांत ही अकेले हैं? उन लोगों की तादाद काफी अधिक है तो अवसाद के चलते जिंदगी से हार जाते हैं और उनके लिए सब कुछ खत्म सा हो जाता है, लेकिन इस दौरान क्या होता है और असल में इसका समाधान क्या है? कहाँ पर चूक हो जाती है और कहाँ बतौर समाज हम देरी कर देते हैं?


अनेकों कारणों से हमारे भीतर पनपने वाला अवसाद धीरे-धीरे हमारे दिमाग में घर करने लगता है। यही वो समय होता है जब वो पीड़ित व्यक्ति खुद को बेहद अकेला पाता है। अवसाद के शुरू होने के कारण अलग-अलग हो सकते हैं, लेकिन इसके परिणाम गंभीर हैं। अवसाद के बारे में बात करना अभी तक हमारे घर और समाज में सामान्य नहीं हो सका है, जिसके विनाशकारी परिणाम समय-समय पर हमारे सामने आते रहते हैं।


जब हम किसी चीज़/ परिस्थिति से खुद को हताश महसूस करते हैं और अपने आप को उस लड़ाई को जीतने के काबिल नहीं मानते हैं या हम अकेले पड़ने लगते हैं, यहीं से हमारे दिमाग में एक थकान जन्म लेनी शुरू कर देती है, एक ऐसी थकान को लंबे समय तक नहीं जाती और यहीं से हमारे भीतर अवसाद के बीज पनपने शुरू हो जाते हैं।।


दुर्भाग्य है कि हमारा समाज अभी इतना भी काबिल नहीं हो सका है, जो अवसाद को एक गंभीर बीमारी के तौर पर खुले तौर पर स्वीकार करे और इससे पीड़ित शख्स का ख्याल रखने की चेष्टा करे।

बजाय इसके समाज में अवसाद को सामान्य दिमागी परेशानी जैसे उलझन और तमाम तरह के मानसिक साइडइफेक्ट से साथ जोड़कर देखना शुरू कर दिया जाता है। एक इंसान जहां इतनी गंभीर बीमारी में जकड़ा हुआ होता है, जहां वो हर चीज़ से हार मान चुका होता है, वहीं ठीक उसी समय लोग कई तरह के घटिया समाधान उसके सामने रखने में लगे हुए होते हैं, बजाय इसके कि वो उसकी परेशानी की गहराई को समझ सकें और उसे बतौर एक गंभीर मरीज ट्रीट कर सकें।


अवसाद के लक्षणों की बात करें तो पीड़ित व्यक्ति हर काम में अपनी रुचि खो चुका होता है, वो गम महसूस करना या खुश रहना कम कर देता है या बिल्कुल ही नहीं करता है, इसी के साथ पीड़ित व्यक्ति हर समय नकारात्मक सोच रखने लग जाता है। शारीरिक लक्षण के तौर ओर पीड़ित व्यक्ति या तो बहुत अधिक सोना शुरू कर देता है या फिर वो बिल्कुल ही सोना कम कर देता है। ये खाने के साथ भी होता है, पीड़ित व्यक्ति सामान्य से अधिक (बार-बार) या फिर बहुत कम खाना खाना शुरू कर देता है।

अवसाद से पीड़ित व्यक्ति जब अपने जीवन को खत्म करने की ओर बढ़ता है, तो उसका उद्देश्य सिर्फ उन परेशानियों से छुटकारा पाना होता है जिन्होने उसके दिमाग में घर कर लिया है, लेकिन उनके जाने के बाद उनके परिजनों और अपनों को जिस कष्ट से गुजरना पड़ेगा, इसका उसे अंदाजा भी नहीं होता। अवसाद पीड़ित व्यक्ति को बुरी तरह हताश कर सकता है, लेकिन उस कठिन समय में अगर उसे सही साथ मिल जाए तो इससे मजबूती के साथ बाहर भी आया जा सकता है।

अगर बतौर समाज अवसाद से ग्रसित व्यक्ति को हम यह भरोसा दिलाने में कामयाब हो सकें कि जिन मुश्किलों का सामना वो कर रहा है उससे उबरने के लिए उसे अपने को खत्म करना कोई समाधान नहीं है, बल्कि हम साथ मिलकर उन मुश्किलों से पार पा सकते हैं और जिंदगी के साथ आगे बढ़ सकते हैं, तो इससे बेहतर और कुछ नहीं होगा।

हमें यह समझना होगा कि अवसाद से घिरा हुआ व्यक्ति आमतौर पर अपने आप में ही खुद को अकेला घोषित कर चुका होता है, ऐसे में अगर आप उससे यह उम्मीद लगाकर बैठें हैं कि वो खुद आकर आपके सामने अपनी सारी परेशानियों का बखान करेगा तो ये सिर्फ आपकी बचकानी सोच है और कुछ भी नहीं। हो सकता है पीड़ित व्यक्ति से कई बार आपको हिंट दिया हो या सीधे तौर पर भी आपको बताने की कोशिश की हो, लेकिन आपने ही उन संकेतों को इग्नोर कर दिया हो।


ऐसी परिस्थिति में आपकी सतर्कता रामबाण का काम कर सकती है। अगर आपके किसी परिचित में इस तरह के कोई लक्षण नज़र आ रहे हैं, तो आप उनके पास बैठें, उन्हे समय दें, उनसे धीरे से बात करें और समस्या की जड़ तक जाकर उन्हे सबसे उपयुक्त सुझाव दें, इसी के साथ उन्हे किसी मनोचिकित्सक या काउंसलर या इस क्षेत्र में काम करने वाले एनजीओ तक खुद लेकर जाएँ।

आप जितना उन्हे समझने की कोशिश करेंगे उनके साथ यह समस्या उतनी जल्दी सुलझाई जा सकेगी। अवसाद से निपटने के लिए आज विस्तृत मेडिकेशन मौजूद है। अवसाद का कोई एक मुख्य कारण नहीं है, लेकिन इससे बाहर आने में कितना भी समय लग सकता है, ऐसे में अगर आप सब कुछ जानते हुए भी परिस्थितियों से अंजान बने रहेंगे तो ये परिणाम हम सब के लिए बुरे साबित हो सकते हैं।